‘देव डी’, ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा’, ‘हैप्पी एंडिंग’ सहित कई फिल्मों में अभिनय कर बौलीवुड में बतौर अभिनेत्री व्यावसायिक सफलता हासिल करने के बाद अभिनेत्री कल्कि केकला (अब तक इन का नाम कल्की कोचलीन लिखा जाता रहा है, मगर अब वे चाहती हैं कि हिंदी में उन का नाम ‘कल्कि केकला’ लिखा जाए.) हमेशा अलग तरह के किरदारों में नजर आई हैं. इस की वजह उन का गैर परंपरागत लुक भी है. वे आम हीरोइनों की तरह न तो ग्लैमरस हैं और न ही बदन उघाड़ू किरदारों में फिट बैठेंगी. लिहाजा वे अपने लुक्स और टैलेंट का सटीक इस्तेमाल करते हुए हमेशा हार्डकोर किरदारों को तरजीह देंगी तो अच्छा रहेगा. लेकिन बौलीवुड में लगभग सभी हीरोइनों को कमर्शियल व ग्लैमरस फिल्मों के मापदंड पर खरा उतर कर ही कामयाब कैरियर हासिल हुआ है. ऐसे में कल्कि की राह में न सिर्फ रोड़े हैं बल्कि फिल्मी दुनिया में लंबी पारी खेलने के लिए उन्हें कड़ा संघर्ष करना पड़ेगा.

हालिया प्रदर्शित फिल्म ‘मार्गरीटा विद अ स्ट्रा’ में वे ‘सेरेब्रा पाल्सी’ ग्रसित विकलांग लड़की लैला के किरदार में नजर आईं, जिसे सैक्स की चाहत है और एक दिन लैला एक अंधी व ‘लैस्बियन’ लड़की खानुम से शारीरिक संबंध बनाती है. इस फिल्म को टोरंटो सहित कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्मोत्सवों में सराहा व पुरस्कृत किया जा चुका है. दूसरी तरफ वे कोमा के मरीजों पर बन रही फिल्म ‘वेटिंग’ में नसीरुद्दीन शाह के साथ अभिनय कर रही हैं. वहीं, निजी जिंदगी में अनुराग कश्यप से उन का अलगाव हो चुका है. दोनों ने तलाक के लिए अर्जी दायर कर दी है. ‘मार्गरीटा विद अ स्ट्रा’ करने की मूल वजह वे इस प्रतिनिधि को बताते हुए कहती हैं कि जब उन के पास इस फिल्म का औफर आया था तो स्क्रिप्ट पढ़नी शुरू करने के 10 मिनट बाद वे लैला के ‘सेरेब्रा पाल्सी’ से पीडि़त यानी विकलांग होने के बारे में सोच ही नहीं रही थीं, वे सिर्फ उस की जिंदगी की कहानी के बारे में सोच रही थीं. उन्हें लगा कि लैला की यह कहानी लोगों को पता चलनी चाहिए.

फिल्म साइन करने से पहले वे सेरेब्रा पाल्सी के बारे में एक अंगरेजी फिल्म ‘माई लैफ्ट फुट’ के जरिए जानती थीं लेकिन इस फिल्म में काम करने के बाद वे फिल्म की निर्देशक शोनाली बोस की कजिन मालिनी से मिलीं, तो इस बीमारी के बारे में विस्तार से पता चला. मालिनी के फिजियोथैरेपिस्ट व स्पीच थैरेपिस्ट से बात हुई, तो पता चला कि इंसान किस तरह सांस लेता है और किस तरह मसल्स अपना काम करती हैं. कल्कि के मुताबिक, ‘‘मैं मालिनी के साथ बाहर निकली, मैं ने देखा कि दूसरे लोग किस तरह उसे घूरते हैं. अकसर हम शारीरिक या मानसिक तौर पर अपंग व्यक्तियों के प्रति ऐसा रवैया अपनाते हुए देखते हैं. लेकिन ऐसा करना सही नहीं है. वे भी चाहते हैं कि समाज उन्हें सामान्य नजरों से देखे ताकि बारबार उन्हें अपनी शारीरिक या मानसिक कमतरी का आभास न हो. लोगों को यह समझना चाहिए कि हमारा बदला नजरिया उन की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव ला सकता है.’’उन के हिसाब से लैला के किरदार को होमो सैक्सुअलिटी के साथ जोड़ना जरूरी था. वे कहती हैं कि आखिर वह एक लड़की है, उस के अंदर भी हमारी जैसी भावनाएं हैं. उस के हार्मोंस भी विकसित हो रहे हैं. सभी ने फिल्म में देखा होगा कि लैला भी किसी लड़के को ‘किस’ करना चाहती है.

एक दिन लैला को अंधी लड़की खानुम मिलती है. वह खानुम से शारीरिक संबंध बनाती है. आखिर लैला के अंदर भी सैक्स की चाहत है. खानुम खुद को विकलांग नहीं मानती. वह ‘लैस्बियन’ है और इस बात को स्वीकार भी करती है. वह ऐक्टिविस्ट है. वह सामाजिक मुद्दों को ले कर लड़ाई करना जानती है. बता दें कि अब तक विश्व के कई फिल्म फैस्टिवल के अलावा भारत में भी जो ‘गे’ व ‘लैस्बियन’ समुदाय के विरोधी हैं उन्हें भी यह फिल्म अच्छी लगी  वैसे लैला की अपंगता को सिर्फ सैक्सुअलिटी के आईने से दिखाने के बजाय इस तरह की बीमारी से पीडि़तों की अन्य उलझनों, जरूरतों व मजबूरियों पर भी रोशनी डालनी चाहिए थी. मसलन, चलनेफिरने की दिक्कतों से ले कर पढ़ना, याद रखना, भावनात्मक तारतम्य और मानसिक परिवर्तन आदि. सिर्फ सैक्सुअल चाहत पर फोकस करने से लगता है कि इस तरह के मरीज सिर्फ सैक्स के भूखे होते हैं. जबकि इन की और भी कई चाहतें व मंजिलें होती हैं. सिर्फ सैक्स को ही ध्यान में रख कर फिल्म बनाने से उस की यूनीवर्सल अपील रुक सी जाती है. एक तरह से सिर्फ एक ही मुद्दे को प्रमुखता से दिखाना इस बीमारी की संवेदनशीलता पर हमला करता लगता है.

सैक्स की महत्त्वाकांक्षा को ले कर व दूसरे मुद्दे के दरकिनार हो जाने के बाबत कल्कि का कहना है, ‘‘यह फिल्म ‘सेरेब्रा पाल्सी’ के बारे में डौक्यूमैंट्री नहीं है. हम ने फिल्म में यह नहीं दिखाया है कि विकलांग बच्चे के लिए जिंदगी कितनी मुश्किल है या विकलांग बच्चों की वजह से उन के मातापिता कितना कुछ सहते हैं. यह फिल्म एक टीनएजर की जिंदगी की यात्रा है. यह फिल्म सैक्सुअलिटी के बारे में नहीं है. फिल्म तो इंसानी एहसास व भावनाओं की बात करती है. फिल्म में एक भी हौट सैक्सी सीन नहीं है. यह तो एक टीनएजर लड़की के अपने अंदर की खोज है.’’ फिल्मी किरदारों की असल जिंदगी में होने वाले असर पर कल्कि कहती हैं, ‘‘हर चरित्र मुझ पर प्रभाव छोड़ता है, लेकिन बहुत थोड़े समय के लिए. हम हर चरित्र से कुछ न कुछ सीखते भी हैं क्योंकि चरित्र को निभाते समय हम चरित्र के मानवीय पक्ष को देखते हैं और उस से रिलेट करने का प्रयास करते हैं. यदि हम चरित्र के साथ रिलेट नहीं करेंगे तो उसे सही ढंग से अभिनय से संवार नहीं सकते. लैला का चरित्र निभाते समय मैं ने उस के एटीट्यूड और उस के प्यार की भावना को समझा. लैला बारबार गिरती है, पर खुद ही उठती है. वह रोती नहीं है बल्कि हंसती है. लैला का एटीट्यूड यह है कि उस की विकलांगता बदल नहीं सकती, तो उसे स्वीकार कर ह?ंसते हुए जिंदगी जियो. जब मैं फिल्म की शूटिंग कर रही थी तब यह चरित्र मेरे अंदर ही था. शूटिंग के बीच जब छुट्टी थी, तब हम बाहर होटल में खाना खाने गए, तो वहां भी मैं लैला की ही तरह व्यवहार कर रही थी और लोग बड़ी अजीब सी नजरों से मुझे देख रहे थे. कई घंटों तक व्हीलचेअर पर बैठे रहने की वजह से मेरी कमर में दर्द होने लगता था. मेरी स्पाइन भी ट्विस्ट हो गई थी. इसी तरह फिल्म ‘गर्ल इन यैलो बूट’ के दौरान मेरे साथ हुआ था. तब भी कुछ समय के लिए चरित्र मेरे साथ रह गया था. मेरे अंदर ‘नौन इमोशन’ आ गया था. मैं बहुत इंट्रोवर्ट बन गई थी.’’

विदेशों की तरह भारत में विकलांगों के लिए मौजूदा सुविधाओं को नकारते हुए कल्कि कहती हैं कि भारत में लोग विकलांगों को अजीब नजर से देखते हैं. विदेशों में ऐसा नहीं है. सरकार को विकलांगों के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करना चाहिए. सिनेमाघर व हर मौल में विकलांगों के लिए टौयलेट वगैरह होने चाहिए. विकलांगों को आम लोगों के साथ ही शिक्षा दी जानी चाहिए. रुपहले परदे पर कल्कि जितने जटिल किरदार निभाती हैं उन की असल जिंदगी भी उतनी ही जटिल है. बीते साल उन का निर्देशक अनुराग कश्यप से रिश्ता टूट गया, तलाक की मुहर लगनी बाकी है. निजी जिंदगी को ले कर कल्कि का कहना है, ‘‘मैं ने अपनी निजी जिंदगी के बारे में बात करना बंद कर दिया है. मैं काम करना चाहती हूं. मैं अनुराग कश्यप को ले कर हैडलाइंस नहीं बनाना चाहती. अनुराग मेरे अच्छे दोस्त हैं.’’ वैसे फिल्मी दुनिया से वास्ता रखने वाले जानते हैं कि कल्कि के कैरियर को यहां तक पहुंचाने में अनुराग कश्यप की भूमिका रही है. ज्यादातर फिल्में भी उन्होंने या तो अनुराग के निर्देशन में की हैं या फिर उन के प्रोडक्शन हाउस के लिए. ऐसे में अनुराग से हुए अलगाव का असर उन के फिल्मी कैरियर पर पड़ना तय है.

कल्कि बताती हैं, ‘‘मुझे बचपन से ही लिखने का शौक रहा है. मेरे दिमाग में एक आइडिया आया, तो मैं ने उस पर एक नाटक लिखा, जिस का नाम है – ‘प्ले औन ए डैथ’. यह एक कौमेडी नाटक है. फिर मुझे लगा कि मैं खुद ही इसे निर्देशित करूं. पिछली बार मैं ने ‘क्लेटन ओमन’ नाटक लिखा था, जिसे किसी और ने निर्देशित किया था.’’ हर मुद्दे पर बेबाकी से अपनी राय रखने वाली कल्कि दीपिका के ‘माई चौइस’ वीडियो को ले कर अलग राय रखती हैं. उन का मानना है कि वुमेन इंपावरमैंट की लड़ाई ‘पुरुष बनाम औरत’ नहीं होनी चाहिए, पर वही हो रहा है. यह गलत है. मेरा मानना है कि इस तरह के वीडियो बनाते समय पुरुषों की भी भागीदारी होनी चाहिए. भविष्य में कल्कि कई फिल्मों में नजर आएंगी, जिन में ‘लव अफेयर’ एक है. सोनी राजदान इस को निर्देशित कर रही हैं. यह 1950 की एक पीरियड फिल्म है. नसीरुद्दीन शाह के साथ ‘वेटिंग’ की है. इसे अनु मेनन ने निर्देशित किया है. यह फिल्म उन के बारे में है जो कोमा में चले जाते हैं. रोचक विषय है. एक फिल्म ‘मंत्रा’ है. यह दिल्ली के एक परिवार की कहानी है. इस में ग्लोबलाइजेशन के दौर में खत्म हो रहे छोटे दुकानदारों की कथा है.

इस फिल्म पर उन की प्रतिक्रिया जाननी चाही तो उन का जवाब यों था, ‘‘अपनापन खत्म हो रहा है. मुझे विदेशी कल्चर के आने से परहेज नहीं है. हम भारतीय दूसरे देश में जा कर काम करते हैं. उसी तरह दूसरे देश के लोग भी भारत आ कर काम करें, इस में एतराज नहीं है. लेकिन मौल कल्चर में हमारी निजता और अपनापन खत्म हो रहा है. छोटेछोटे कारीगर खत्म हो रहे हैं. हम तो इन का सपोर्ट करते हैं. बनारस में जो बुनकर हैं, उन का मैं साथ देती हूं. बनारस में एक डिजाइनर ब्रान दत्ता हैं. उस का ब्रैंड है – ‘फादर लैंड’, जोकि बुनकर का ही काम करता है. मैं उन्हीं की डिजाइन की हुई साड़ी पहनना पसंद करती हूं. मेरी राय में यह एक खूबसूरत कला है. हमें इसे मरने नहीं देना चाहिए. पश्चिमी देशों के लोग यहां आते हैं, इस तरह की कारीगरी वाली चीजें खरीद कर ले जाते हैं और फिर उसे अपना ब्रैंड बना कर लंबी कीमत में बेचते हैं. देश की कारीगरी नष्ट नहीं होनी चाहिए. मौल्स तो मध्यवर्गीय परिवारों के लिए काफी महंगे हैं. मेरी राय में तो मौल्स हटा कर उस जगह पर बच्चों के लिए पार्क बनाए जाने चाहिए. मौल्स की जरूरत मेरी समझ से परे है.’’ बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अभियान मेक इन इंडिया और स्मार्ट सिटी की अवधारणा भी कुछ ऐसी है जहां सिर्फ एक संपन्न तबके का हित देखा जाता है, मध्यवर्ग व निम्नवर्ग की परवा किसी को नहीं. मेक इन इंडिया में जहां विदेशी व्यापारी चांदी काटेंगे वहीं स्मार्ट सिटी में चंद अमीर ही आशियाना बना पाएंगे. जिन को दो जून की रोटी नसीब नहीं होती, वे स्मार्ट सिटी का सपना कैसे देख सकते हैं.

वैसे कल्कि ने कैरियर में कई फुजूल किस्म की फिल्में भी की हैं जिन में ‘हैप्पी ऐंडिंग’, ‘ये जवानी है दीवानी’ में उन के किरदार बेहद औसत दरजे के थे. इन के अलावा फिल्म ‘एक थी डायन’ तो सिर्फ अंधविश्वास फैलाने का काम कर रही थी. ऐसी फिल्मों से जुड़ कर वे समाज में नकारात्मक संदेश भी प्रसारित कर रही हैं. कल्कि केकला जैसी गैरपरंपरागत अभिनेत्रियों को ऐसे सामाजिक सरोकारों और गंभीर विमर्श के मुद्दे उठाती फिल्में करते रहना चाहिए जैसा कि 80-90 के दशक में स्मिता पाटिल, शबाना आजमी, इला अरुण, रोहिण्ी हटंगड़ी जैसी अभिनेत्रियों ने किया. चालू मसाला फिल्में तर्क से परे सिनेमा के शौकीनों के लिए हैं. वे बनती रहेंगी लेकिन सब्जैक्टबेस्ड फिल्में व उन से जुड़े कलाकारों को प्रोत्साहन जरूरी है. समय आ गया है कि ऐसी फिल्में अवार्ड समारोहों की गुमनाम व संकरी गलियों से बाहर निकलें और अधिकतम दर्शकों तक पहुंच बनाएं.