लंबे अंतराल के बाद ‘इकबाल’, ‘डोर’ और ‘आशाएं’ जैसी फिल्म बनाने वाले निर्देशक नागेश कुकनूर फिल्म ‘लक्ष्मी’ से वापसी कर रहे हैं. यौन उत्पीड़न और मानव तस्करी के गंभीर मुद्दे पर बनी इस फिल्म से जुड़ी कई अहम बातों पर नागेश कुकनूर से शांतिस्वरूप त्रिपाठी ने बातचीत की. पेश हैं मुख्य अंश.
 
एक एनजीओ से मिले आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में हर साल  44 हजार बच्चे एडौप्ट किए जाते हैं. हर साल 11? हजार से अधिक लड़कियां लापता हो जाती हैं. इन में से तमाम लड़कियों का अपहरण कर या छोटी उम्र में ही उन्हें उन के घर के आसपास से चुरा कर देह व्यापार के धंधे में जबरन धकेल दिया जाता है. उस के बाद देह व्यापार में संलग्न ये लड़कियां डर की वजह से कभी भी कोठे के मालिकों के खिलाफ अदालत में गवाही देने को तैयार नहीं होतीं. हर दिन शारीरिक व मानसिक यातना सहन करना ही इन की नियति बन कर रह जाती है. जबकि कई सामाजिक संस्थाएं कोठे पर मजबूरी में वेश्यावृत्ति कर रही इन लड़कियों के उद्धार के लिए कार्यरत हैं. ऐसी ही लड़कियों की कथा को यथार्थ के धरातल पर पहली बार फिल्म ‘लक्ष्मी’ में पेश किया गया है. इस फिल्म के निर्माता, लेखक व निर्देशक नागेश कुकनूर हैं.
यौन उत्पीड़न और मानव तस्करी के साथ लड़कियों को मिलने वाली यातना जैसे गंभीर विषय पर बनी फिल्म ‘लक्ष्मी’ को हाल ही में अमेरिका के तीसरे नंबर के सब से बड़े अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फैस्टिवल ‘पौम स्प्रिंग इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल’ में काफी सराहा गया. नागेश कुकनूर ने फिल्म ‘लक्ष्मी’ में सब से बड़ा सवाल यह उठाया है कि क्या हमारे अंदर की मानवता खत्म हो चुकी है? क्या हम इंसानियत भूल चुके हैं?
 
सिनेमा के वर्तमान परिदृश्य में आप अपनी ‘लक्ष्मी’ को कहां पाते हैं?
‘लक्ष्मी’ संजीदगी वाली फिल्म है. इसे किसी ढांचे में ढालना बड़ा मुश्किल काम है. लेकिन पिछले 3 वर्षों से बौलीवुड में अलगअलग तरह की फिल्में बनने लगी हैं इसलिए मैं कुछ ज्यादा ही उत्साहित हूं.
 
‘लक्ष्मी’ का बीज कहां से पड़ा?
पिछले 4-5 वर्षों से मैं एक एनजीओ ‘प्लान इंडिया’ के साथ काम कर रहा हूं. इस एनजीओ से कई छोटेछोटे एनजीओ जुड़े हैं. एक एनजीओ आंध्र प्रदेश के समुद्री किनारे पर स्थित अंगोल नामक गांव में काम करता है. यहां पर तमाम लोग यौन उत्पीड़न और मानव तस्करी से पीडि़त हैं. यह संस्था ऐसी लड़कियों को समाज में दोबारा स्थान दिलाने का काम कर रही है. मैं भी इस संस्था में जा कर अपने हिसाब से ऐसी लड़कियों की बेहतरी के लिए काम कर रहा था. 
एक दिन 14 साल की एक लड़की ने बताया कि वह कोर्ट गई थी. ‘कोर्ट’ का शब्द सुनते ही मुझे लगा कि यह कोई नई कहानी है. फिर जब मैं ने एनजीओ के कार्यकर्ताओं से बात की तो पता चला कि एनजीओ लड़कियों को छुड़ा कर लाता है, पर ये लड़कियां अपराधियों के खिलाफ अदालत में बयान देने नहीं जाती हैं. इसलिए किसी को भी सजा नहीं मिल पाती. लेकिन इस लड़की ने यह साहस दिखाया. इस लड़की में बहुत हिम्मत है. इस लड़की ने बाकायदा उन लोगों को पहचाना, जिन्होंने उस का अपहरण कर वेश्यावृत्ति के क्षेत्र में बेचा था. उन के खिलाफ अदालत में बयान दिया. नतीजतन, अपराधियों को सजा मिल सकी.
मैं ने इस एनजीओ ‘शेल्टर होम’ की 25 लड़कियों से अलगअलग बात की. मैं ने उन में मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से प्रताडि़त होने के बावजूद कुछ कर गुजरने का हौसला पाया. रिसर्च के दौरान जब लड़कियों ने अपनी आपबीती सुनाई तो मेरे साथ काम कर रही टीम की लड़कियों को रोना आ गया. 
लक्ष्मी जैसी लड़की के साथ हुआ यह कि एक लड़के ने उस के साथ प्यार किया, शादी करने का झांसा दे कर उसे अपने साथ ले गया. फिर कोठे में बेच दिया. वह वहां से भागने की कोशिश करती है तो उसे बांध कर रखा जाता है. उस रात उस के साथ14 से 16 पुरुषों ने सहवास किया. हमें लगा कि यह कहानी पूरे विश्व को बताई जानी चाहिए.
 
‘लक्ष्मी’ के माध्यम से आप किस बात को उकेरना चाहते हैं?
हम ने एक सच्ची कहानी को परदे पर पेश किया है. पर इस में एक नहीं बल्कि कई कथाओं का मिश्रण है. फिल्म में संदेश है कि इस तरह के कांड को रोकना चाहिए. हम ने ऐसी ही कुछ लड़कियों की व्यथा व उन की यातना को ‘लक्ष्मी’ में चित्रित किया है.
देखिए, मानव तस्करी के व्यवसाय में कोई एक इंसान डौन की तरह काम नहीं कर रहा है. इस व्यवसाय में करोड़ों रुपए नहीं लगे हैं. सब से बड़ा कड़वा सच यह है कि लड़की को 20 रुपए के लिए भी अपने जिस्म को बेचना पड़ता है. मैं ने अपनी फिल्म में उन की बात नहीं की है जो जिस्मफरोशी को व्यापार बना कर लाखों में खेल रही हैं, मैं ने फिल्म में उन की बात की है जो दलालों के नियंत्रण में रहती हैं. हम ने मानवता और मानवीय संवेदनाओं की बात की है.
 
रिसर्च के दौरान आप की समझ में आया कि इस समस्या की जड़ कहां है?
यह समस्या बहुत जटिल है. इस समस्या में इतने ‘लेयर्स’ हैं कि यह समझना मुश्किल है कि कहां से शुरू व कहां खत्म हो रही है. हम ने अपनी फिल्म में कहा है कि जरूरत है कि हम इस तरह की औरतों को संरक्षण दें. पर मेरी समझ में आया कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थितियां इस के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार हैं. यदि देश देशवासियों की देखभाल करे तो यह समस्या पैदा नहीं हो सकती.
 
आप अपनी फिल्मों में नारी समस्याओं को ही हमेशा प्रमुखता देते हैं. इस की कोई खास वजह?
मैं हमेशा यह सोचता हूं कि यदि पुरुष और नारी को समान अधिकार प्राप्त हों तो पूरे विश्व में क्या होगा? इस सवाल का जवाब मुझे नहीं मिलता. पूरे विश्व के 99 प्रतिशत देशों में लिंगभेद की समस्या है. पूरे विश्व के 99 प्रतिशत शासक पुरुष हैं. यदि औरतें शासक हों तो शायद बहुतकुछ बदल जाए इसलिए मैं अपनी हर फिल्म में औरत को सशक्त रूप में ही या निर्णय करने वाली शक्ति के रूप में पेश करना चाहता हूं.
 
क्या ‘लक्ष्मी’ का असर होगा?
असर जरूर होगा? पर कैसे और कब होगा, इस की गारंटी नहीं दे सकता. समस्या के निदान के लिए लोगों की सोच बदलने की जरूरत है. लोग हमारी फिल्म देख कर इस मुद्दे को सोशल मीडिया में चर्चा करेंगे. मेरा मानना है कि यह फिल्म किसी न किसी स्तर पर कुछ बदलाव लाने की दिशा में एक कदम साबित होगी.
 
क्या आप को लगता है कि ‘लक्ष्मी’ के प्रदर्शन के बाद कोई क्रांति आएगी?
बिलकुल नहीं, जिस समस्या की जड़ें हजारों साल पुरानी हों उसे एक फिल्म के माध्यम से नहीं दूर किया जा सकता. पर हम बुराइयों के खिलाफ लड़ाई लड़ने की शुरुआत तो कर सकते हैं. यदि एक शहरी इंसान फिल्म ‘लक्ष्मी’ देख कर यह कह सके कि यह जो कुछ हो रहा है वह गलत है, तो भी बहुत बड़ी बात होगी. हम इसे समाज में बदलाव लाने की कोशिश कह सकते हैं.
 
आप मानते हैं कि फिल्मों से समाज में बदलाव लाया जा सकता है?
मेरा मानना है कि सिनेमा को किसी भी समस्या के लिए दोषी नहीं माना जा सकता. यदि कोई मूर्ख बिना हैल्मेट पहने बाइक स्टंट करता है, उसे चोट लगती है, तो इस के लिए सिनेमा को दोषी ठहराने का कोई औचित्य नहीं बनता. मेरा मानना है कि समाज पर या बच्चों पर जो प्रभाव पड़ता है वह उस के मातापिता का सब से ज्यादा पड़ता है. उस के बाद उस के टीचरों का, उस के बाद उस के अपने चाहने वालों का प्रभाव पड़ता है.
सिनेमा में उन लोगों को बदलने की ताकत है जो वास्तव में बदलाव चाहते हैं या अपनेआप को बदलना चाहते हैं. अब आप देखिए, अमेरिका में क्या हो रहा है. स्कूलों में बच्चे, दूसरे बच्चों पर गोलियां चलाते हैं. लोग अपनी गलती पर गौर करने के बजाय कभी सिनेमा को दोष देते हैं, कभी संगीत को और कभी किताबों को दोषी ठहराते हैं. यह मूर्खता है. सिनेमा तो कहानी सुनाने का सशक्त माध्यम है.