फिल्म कलाकार इरफान खान की पिछली फिल्म ‘मदारी’ भले ही पिट गई हो, लेकिन हमेशा की तरह वे अपनी दिलकश और दमदार अदाकारी से वाहवाही बटोर ले गए. टैलीविजन से ऐक्टिंग कैरियर की शुरुआत करने वाले इरफान खान हिंदी और हौलीवुड की कई फिल्मों में अपनी उम्दा ऐक्टिंग के जलवे दिखा चुके हैं. साल 2012 में फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ के लिए इरफान खान बैस्ट ऐक्टर का नैशनल अवार्ड जीत चुके हैं.  हौलीवुड की फिल्म ‘द अमेजिंग स्पाइडरमैन और ‘जुरासिक वर्ल्ड’ ने उन्हें इंटरनैशनल फिल्मों के फलक पर पहुंचा दिया है. 7 जनवरी, 1967 को जयपुर में जनमे इरफान खान कहते हैं कि उन्हें लीक से हट कर काम करने में काफी मजा आता है. वे हीरो की परिभाषा बदलने की कोशिश में लगे हुए हैं. हीरो की बनीबनाई इमेज से बाहर निकल कर कुछ अलग करने में उन्हें कामयाबी मिलने लगी है और जनता भी उन्हें पसंद करने लगी है.

‘बिल्लू’, ‘मकबूल’, ‘हासिल’, ‘द नेमसेक’,  ‘पान सिंह तोमर’, ‘तलवार’, ‘पीकू’, ‘जज्बा’ जैसी फिल्मों ने उन्हें हीरो की घिसीपिटी इमेज को तोड़ने में काफी मदद की है. इन फिल्मों ने उन्हें कामयाबी के साथसाथ स्टारडम भी दिलाई है.

इरफान खान का मानना है कि ऐक्टर ही नहीं, बल्कि किसी भी प्रोफैशन में काम से ही पहचान और इज्जत मिलती है. जिस काम में आप का मन लगे, उसे ही अपना धर्म बना लेना चाहिए. नाम के चक्कर में नहीं फंसना चाहिए. काम बेहतर और अलहदा होगा, तो नाम खुद ही हो जाएगा. उस के साथ पैसा भी आने लगेगा. कलाकार को पैसे के पीछे भागने के बजाय अच्छे काम की ओर भागने की जरूरत है. उन का मानना है कि फिल्मों का इंटरनैट पर लीक होना गलत बात है. भारत सरकार को फिल्म इंडस्ट्री 4 हजार करोड़ रुपए का सालाना टैक्स देती है. सरकार को इस मामले में सख्ती से निबटना चाहिए. किसी भी फिल्म में करोड़ों रुपए और सैकड़ों लोगों का भविष्य दांव पर लगा होता है, ऐसे में फिल्म के इंटरनैट पर लीक होने से एकसाथ सैकड़ों लोगों को झटका लगता है. साल 1988 में ‘सलाम बौंबे’ से फिल्मों में अपने ऐक्टिंग कैरियर की शुरुआत करने वाले इरफान खान बदलते दौर के सिनेमा के बारे में कहते हैं कि आज फिल्मों में जम कर नए प्रयोग किए जा रहे हैं. नौजवानों को खूब मौका दिया जा रहा है. नईनई कहानियां सामने आने लगी हैं. हार्डकोर ऐक्टर और डायरैक्टर का जमाना है. कामर्शियल और आर्ट फिल्म के बीच का फर्क काफी हद तक खत्म हो चला है. जनता भी इन सारी चीजों को पसंद कर रही है. अब फिल्में केवल डांस और गाने की वजह से नहीं चलती हैं.

इरफान खान बताते हैं कि एक समय ऐसा था कि उन के पास फिल्म ‘जुरासिक पार्क’ देखने के लिए पैसे नहीं थे और आज का समय है कि उन्होंने फिल्म ‘जुरासिक वर्ल्ड’ में ऐक्टिंग की है.  मुंबई फिल्म इंडस्ट्री से निकल कर इरफान खान ने हौलीवुड में भी अपनी एक अलग जगह बना ली है. ‘स्लमडौग मिलिनेयर’, ‘द अमेजिंग स्पाइडरमैन’ और ‘जुरासिक वर्ल्ड’ के जरीए वे हौलीवुड में भी अपनी बेहतरीन ऐक्टिंग की छाप छोड़ चुके हैं. इरफान खान कहते हैं कि किसी फिल्म को चुनने से पहले वे कहानी, पटकथा, डायरैक्टर वगैरह को ठोंकबजा कर देखते हैं और अपनी पसंद के रोल ही चुनते हैं. वे जोर दे कर कहते हैं कि वे आम आदमी के हीरो बनना चाहते हैं. उन की हालिया फिल्म ‘मदारी’ में भी आम आदमी की कहानी बयान की गई थी. आम आदमी जमूरा बन कर पूरा खेल बदल देता है. टैलीविजन से अपने ऐक्टिंग कैरियर की शुरुआत करने वाले इरफान खान बताते हैं कि कई साल तक उन्होंने टैलीविजन के लिए काम किया. ‘भारत एक खोज’, ‘चाणक्य’, ‘चंद्रकांता’ जैसे कई टैलीविजन सीरियलों में काम कर के उन्होंने बड़े फिल्मकारों का ध्यान अपनी ओर खींचा.