सरिता विशेष

मराठी फिल्मों से बौलीवुड का रुख करने वाली अभिनेत्री राधिका आप्टे ने हमेशा लीक से हट कर फिल्में कीं और अपनी अलग पहचान बनाई. कम समय में बड़ी पहचान बनाने वाली राधिका की कई फिल्में काफी हिट रहीं, जिन में हिंदी फिल्म ‘मांझी, द माउंटेन मैन’ बंगला फिल्म ‘अहिल्या’, मराठी फिल्म ‘घो मला असला हवा’ काफी चर्चित रहीं. बचपन से ही अभिनय का शौक रखने वाली राधिका महाराष्ट्र, पुणे से हैं. उन के पिता डा. चारुदत्त आप्टे न्यूरोसर्जन हैं. पढ़ाई पूरी करने के दौरान ही राधिका ने अभिनय शुरू कर दिया था. स्कूलकालेज के हर फंक्शन में वे बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थीं. उन्होंने कत्थक नृत्य के साथसाथ कंटैम्परेरी डांस भी सीखा.

अत्यंत स्पष्टभाषी और बोल्ड स्वभाव की राधिका ने 2013 में अपने परिचित दोस्त ब्रिटिश संगीतकार बेनेडिक्ट टेलर से शादी की. राधिका ने मराठी और हिंदी फिल्मों के अलावा तमिल, तेलुगू और मलयालम फिल्मों में भी काफी नाम कमाया. फिल्म ‘वाह, लाइफ हो तो ऐसी’ उन की पहली हिंदी फिल्म थी. बड़ी फिल्मों के अलावा उन्होंने कई छोटी फिल्में भी की हैं, जो उन की अभिनय कला की बारीकियों को दर्शाती हैं. वे हर फिल्म को चैलेंज की तरह ऐक्सैप्ट करती हैं और उसे पूरा समय भी देती हैं. अपनी फिल्म ‘फोबिया’ के प्रमोशन को ले कर भी वे काफी व्यस्त रहीं. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के कुछ खास अंश :

इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा कहां से मिली?

बचपन से ही अभिनय की इच्छा थी. जिस स्कूल में मैं पढ़ती थी वहां रचनात्मक गतिविधियां खूब होती थीं और मैं और मेरी दोस्त कहानियां लिख कर उन पर परफौर्म करते थे. जब बड़ी हुई तो कालेज में अभिनय करने लगी. ऐक्टिंग के अलावा जैसे मैं ने कभी कुछ और सोचा ही नहीं था.

पहली फिल्म कैसे मिली?

मैं नाटकों में अभिनय करती थी. कालेज में पढ़ते हुए मैं ने ‘आसक्ता कला मंच’ के साथ काफी काम किया. जब मेरा एक शो मुंबई में था तो काफी लोग उसे देखने आए. उन्होंने मेरे अभिनय को काफी पसंद किया और मुझे पहली मराठी फिल्म मिल गई.

क्या परिवार का सहयोग मिला, जबकि आप के पिता डाक्टर हैं?

हमारे परिवार में हर कोई एकदूसरे की इच्छा का सम्मान करता है. कोई भी आपत्ति नहीं जताता. मुझे लगता है कि आप तभी सफल हो सकते हैं जब आप को परिवार का सहयोग मिले. मुझे मेरी फैमिली फुल सपोर्ट करती है.

आप की हाल ही में रिलीज फिल्म ‘फोबिया’ कैसी है और उस में आप की क्या भूमिका है?

यह एक साइको थ्रिलर फिल्म है. यह महक नामक एक युवती की कहानी है जो एग्रोफोबिया की शिकार होती है. कुछ ऐसा होता है कि वह घर से बाहर नहीं निकल सकती. दरअसल, हमारे देश में लोग फोबिया के बारे में कम जानकारी रखते हैं. यह एक प्रकार का डिप्रैशन है जो लोगों की नजरों में पागलपन है. इस में हम ने पैनिक अटैक को भी दिखाने की कोशिश की है.

इस भूमिका के लिए कितनी तैयारी करनी पड़ी?

मैं ने अपनी पहचान के एक मनोवैज्ञानिक से बात की और अपने न्यूरोसर्जन पिता से भी राय ली. पूरी जानकारी हासिल की कि ऐसे रोगी कैसे दिखते हैं. उन का व्यवहार कैसा होता है, इस के अलावा मेरे 2 दोस्त ऐसे भी हैं जो पैनिक अटैक के शिकार हैं, जिन के साथ मैं ने काम किया है. मैं ने उन के व्यवहार को समझा व पैनिक अटैक से संबंधित वीडियोज भी देखे यानी काफी रिसर्च वर्क किया, जो काफी मुश्किल था.

आप हमेशा लीक से हट कर फिल्में करती हैं, इस की वजह क्या है?

मैं हर तरह की फिल्में करना चाहती हूं. मैं खासकर ऐसी फिल्में साइन करती हूं जिन में खुद को फिट कर सकूं. फिर चाहे वे किसी भी भाषा की फिल्में हों. अभी मैं ने दक्षिण के सुपरस्टार रजनीकांत के साथ फिल्म साइन की है. एक मराठी फिल्म भी जल्द साइन करने वाली हूं. मेरे हिसाब से हर वह फिल्म कमर्शियल फिल्म होती है जिस के टिकट बेचे जाते हैं.

आप का ड्रीम प्रोजैक्ट क्या है?

मुझे हमेशा अच्छा काम मिले यही मेरा ड्रीम है. एक बायोपिक करने की इच्छा है जिस की बात चल रही है.

कितना संघर्ष किया?

अच्छी फिल्म के लिए संघर्ष तो हमेशा करना पड़ता है और यह आगे भी जारी रहेगा.

आप के साथ परिवार में कौनकौन हैं?

मैं और मेरे पति. मेरे पति लंदन में ज्यादा रहते हैं.

क्या नाटकों में अभी कुछ कर रही हैं?

अभी तक गिरीश कर्नाड के साथ मराठी प्ले ‘उने पूरे शहर एक’ कर रही थी जो अब बंद हो चुका है पर आगे भी नाटक करती रहूंगी.

अब तक आप कितनी ‘ग्रो’ कर चुकी हैं? आप के दिल के करीब कौन सी फिल्म है?

मैं हर प्रोजैक्ट के साथ नई बातें सीखती हूं और जितना भी नया सीखने को मिले सीखती हूं. जितना अभ्यास होगा आप काम में उतने ही परिपक्व होते जाएंगे. पहली मराठी फिल्म ‘घो मला असला हवा’ मेरी सब से प्रिय फिल्म है.

खाली समय में क्या करती हैं?

फिल्में देखती हूं व खाना बनाती हूं.

किस बात पर गुस्सा आता है?

नियम तोड़ कर गाड़ी चलाने वालों पर गुस्सा आता है. इस के अलावा जो लोग समय पर काम नहीं करते उन पर भी बहुत गुस्सा आता है.

महिलाओं को क्या संदेश देना चाहती हैं?

महिलाओं को परिवार के साथसाथ अपना ध्यान भी रखना चाहिए. जिम्मेदारी सिर्फ पुरुषों की ही नहीं महिलाओं की भी होती है, ऐसे में उन्हें अपनी प्रतिभा, अपनी पसंद को आगे बढ़ाना आवश्यक है. इस के अलावा सभी महिलाएं शिक्षित होनी चाहिए ताकि उन पर अत्याचार और जुल्म न हों, वे खुद ही इस का विरोध कर सकें.

आप को फिल्म ‘फोबिया’ में अभिनय करते वक्त क्याक्या कठिनाइयां आईं?

इस में कठिनाई से अधिक मेकिंग में अपनेआप को फिट बैठाना मुश्किल था. यह बौलीवुड की पहली ऐसी फिल्म है, जिस में वर्चुअल रिएलिटी टैक्नोलौजी का प्रयोग हुआ है. वर्चुअल रिएलिटी एक कंप्यूटर टैक्नोलौजी है जिस के जरिए पर्यावरण की उन चीजों को दोहराया जा सकता है जो वास्तविक और काल्पिनक हों. साथ ही इस का प्रयोग करने वाले को इस बात का एहसास होता है कि वे उस जगह पर है और वहां मौजूद लोगों को छू सकता है, महसूस कर सकता है, सुन सकता है. इसे दिखाने का अर्थ यह है कि एग्रोफोबिया के शिकार व्यक्ति खुद इस बीमारी से कैसे बाहर निकलें.

आप की खूबसूरती का राज क्या है? अपनेआप को फिट रखने के लिए क्या करती हैं?

मैं जंक फूड से अपनेआप को कोसों दूर रखती हूं. इस के अलावा अधिक कार्बोहाइड्रेट और मीठा नहीं लेती. अधिक विटामिन और प्रोटीनयुक्त भोजन लेती हूं. ब्रेकफास्ट में टोस्ट आदि लेती हूं. इस के अलावा दूध और फ्रूट जूस भी ले लेती हूं.

लंच टाइम में सीमित खाना खाती हूं, क्योंकि वह समय काम का होता है. डिनर में फिश या चिकन अवश्य खाती हूं. रात को सोने से पहले ग्रीन टी भी मेरे रूटीन में शामिल है. गरमियों में तरल पदार्थ अधिक लेती हूं.

वर्कआउट मेरे डेली रूटीन में अवश्य शामिल होता है. सप्ताह में 4 दिन जिम जाती हूं, जिस में स्विमिंग और कार्डिया भी शामिल हैं. अगर शूटिंग में व्यस्त हूं तो सुबह उठ कर दौड़ती हूं या स्विमिंग करती हूं.

मेरे हिसाब से खूबसूरती अंदर से आती है, जिस के लिए हमेशा फिट रहना, सही डाइट लेना जरूरी है. हर व्यक्ति अपनेआप में सुंदर है, जरूरत है उसे निखारने की. अपनेआप में आत्मविश्वास की.

राधिका आप्टे का फिल्मी सफरनामा

वर्ष          फिल्म

2005        –       वाह, लाइफ हो तो ऐसी

2006        –       दरमियान

2010        –       द वेटिंग रूम

2011        –       आई एम

2011        –       शोर इन द सिटी

2015        –       बदलापुर

2015        –       मांझी, द माउंटेन मैन

2015        –       कौन कितने पानी में

2016        –       फोबिया

2016