सरिता विशेष

साल 2000 में ‘मिस यूनिवर्स’ बनने वाली खूबसूरत और सैक्सी लारा दत्ता ने फिल्म ‘अंदाज’ से अपने कैरियर की शुरुआत की थी. उन्होंने ‘मस्ती’, ‘काल’, ‘नो ऐंट्री’, ‘पार्टनर’, ‘हाउसफुल’, ‘बिल्लू’, ‘सिंह इज ब्लिंग’ जैसी कई फिल्मों में काम किया और अपनी एक अलग इमेज बनाई.

साल 2011 में लारा दत्ता की शादी लौन टैनिस खिलाड़ी महेश भूपति के साथ हुई. शादी के बाद लारा ने कुछ समय के लिए फिल्मों से ब्रेक ले लिया और एक बेटी की मां बन गईं.

पेश हैं, लारा दत्ता के साथ हुई लंबी बातचीत के खास अंश:

आप का अब तक का फिल्मी सफर कैसा रहा

मैं एक ऐसे परिवार में पैदा हुई, जहां हम 3 बहनें हैं. हम तीनों बहनों को आगे बढ़ने का मौका मिला. मम्मीपापा के सपोर्ट के बिना हम कुछ नहीं कर पातीं. हमारे जो भी सपने थे, उन्हें पूरा करने के लिए उन्होंने हमेशा आगे बढ़ कर साथ दिया. फिल्मी दुनिया का अब तक का सफर मेरे लिए काफी जोश वाला रहा है.

बेटी की देखभाल में आप के पति महेश भूपति कितना साथ देते हैं

वे एक लौन टैनिस खिलाड़ी हैं, इसलिए बहुत मसरूफ रहते हैं. लेकिन जब कभी वे साथ होते हैं, तो अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह से निभाते हैं. जब हमारी बेटी सायरा पैदा हुई थी, तब वे ‘आस्ट्रेलियाई ओपन’ में सानिया मिर्जा के साथ खेल रहे थे. 10 दिन बाद उन्होंने पहली बार अपनी बेटी को देखा था. उन्होंने उसे गोद में उठा लिया था. उस का डायपर भी बदला था. यह देखकर मैं हैरान रह गई थी. मुझे तब भी बहुत अच्छा लगा था, जब हमारी बेटी ने उन्हें सब से अच्छा पिता कहा था.

एक औरत के लिए मां बनना कितना सुखद है

मां बनना मेरे लिए एक अच्छा तजरबा है. मेरी बेटी अब बड़ी हो रही है और समझदार भी. आजकल की मांएं अपने बच्चों की जिंदगी में काफी हद तक शामिल रहती हैं. उन के खानेपीने और सेहत पर वे खास ध्यान देती हैं.

महिला सशक्तीकरण पर आप की राय

हमारे देश में आम लोगों की यह सोच है कि वे बेटों को कैसे भी स्कूल भेजेंगे, पर बेटियों के लिए ऐसा नहीं सोचते हैं. उन्हें लगता है कि लड़कियां शादी कर के किसी और के घर चली जाएंगी, तो उन्हें क्यों पढ़ाया जाए. मेरे हिसाब से पढ़ीलिखी औरत ही पूरे परिवार को पढ़ालिखा सकती है. वह खुद भी आत्मनिर्भर बन सकती है. मैं ने देखा कि लड़कियां स्पोर्ट्स में चैंपियन हैं. वे खेल तो खेलती ही हैं, साथ ही एक अच्छी नौकरी पाने की भी इच्छा रखती हैं, ताकि परिवार को उन का सहयोग मिल सके. अगर औरत समाज को आवाज मिलेगी, तो उसे हिम्मत मिलेगी. हिम्मत होगी, तो वह आगे बढ़ेगी और अगर आगे बढ़ेगी, तो अपना हक पहचान सकेगी. हमारे देश में ऐसी औरतें भी हैं, जो पढ़ीलिखी होने पर भी अच्छी नौकरी नहीं कर पाती हैं, इसलिए पढ़ाई के साथसाथ वोकेशनल ट्रेनिंग का होना बहुत जरूरी है, ताकि वे कामधंधे के बारे में सोच सकें और अपने पैरों पर खड़ी हो सकें. मेरा यह मानना है कि बेटियां किसी पर बोझ नहीं हैं.

आप की आगे की योजनाएं

हमारी प्रोडक्शन कंपनी नई फिल्में बनाने वाली है. हाल ही में मैं ने एक कहानी खोज निकाली है, जिस पर काम चल रहा है.