सरिता विशेष

फिल्म अभिनेता शाहरुख खान अपनी नई फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर’ की सफलता से अतिउत्साहित हैं. उन का दावा है कि उन्होंने फिल्म की रिलीज से पहले ईमानदारी के साथ फिल्म से संबंधित विस्तृत जानकारी दर्शकों को दे दी थी, उन्हें उसी का फायदा मिला.

आप ने अपनी फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर’ को ट्वीटर और फेसबुक सहित डिजिटल मीडिया के हर प्लेटफौर्म पर जम कर प्रमोट किया. इस से बौक्स आफिस कलैक्शन पर असर पड़ा?

मेरी इंटरनैशनल मार्केटिंग अच्छी है, इसलिए मुझे फेसबुक और ट्वीटर पर फिल्म को प्रमोट करने से फायदा मिला. भारत में ट्वीटर व फेसबुक की पहुंच अभी उतनी नहीं है. भारत में दूरदराज के इलाकों में इंटरनैट का चलन अभी ज्यादा नहीं है. फेसबुक व ट्वीटर से भारत में हमें थोड़ा सा ट्रैंड पता चलता है. जब इंटरनैट वगैरह का प्रचलन हिंदी में ज्यादा हो जाएगा, तब हमारी फिल्म को फायदा हो सकता है. बड़े शहरों में औनलाइन टिकटें बिकने लगी हैं पर विदेशों में यह प्रचलन बहुत ज्यादा है.

आप के अंदर तकनीक व बिजनैस की समझ कहां से आई?

मुझे बिजनैस की कोई समझ नहीं है. सच कहूं तो मैं ने जिसजिस बिजनैस की शुरुआत की उस में मैं असफल हुआ हूं. लेकिन आज मेरी सफलता को देख कर लोगों को लगता है कि मैं बिजनैसमैन के रूप में सफल हूं. मेरी कई फिल्में नहीं चलीं. ‘अशोक द ग्रेट’, ‘पहेली’ नहीं चलीं. एक अंगरेजी पत्रिका ने तो मुझे हाशिए पर धकेल दिया था. इन असफलताओं से मैं ने समझा कि बिजनैस सीखने वाली चीज है. खैर, अब मेरे साथ कुछ लोग ऐसे आ गए हैं, जिन्हें लगता है कि मुझे बिजनैस की समझ नहीं है तो मैं ने उन की बात सुननी शुरू कर दी है. मुझे जो चीज पसंद आती है, मैं उसी में बिजनैस करता हूं. मुझे खेल से प्यार है, इसलिए मैं ने आईपीएल क्रिकेट टीम खरीदी.

‘हैप्पी न्यू ईयर’ का ‘की पौइंट’ है- ‘लूजर ऐंड अपार्च्युनिटी’. इसे आप अपनी जिंदगी व कैरियर में कैसे देखते हैं?

कई बार हम सोचते हैं कि हम ने जैसा सोचा, वैसा नहीं हो पाया या हम उस तरह से काम नहीं कर पाए. मेरा मानना है कि इंसान को यथार्थपरक होने के साथसाथ धैर्यवान होना चाहिए. धीरज तभी आता है, जब आप का यकीन सही हो. आप को यकीन होना चाहिए कि जिंदगी में एक मौका जरूर मिलेगा. मेरी क्रिकेट की टीम लगातार 3 साल हारती रही, तो मैं ने किसी एक खिलाड़ी को दोष देने के बजाय पूरी टीम ही बदल दी. मेरे कहने का अर्थ यह है कि यदि आप कहीं हार रहे हैं या नुकसान में हैं, तो आप को सोचना पड़ेगा कि कहां कमियां हैं और उन्हें दूर करने का रास्ता निकालना पड़ेगा.

पिछले दिनों जैकी श्रौफ ने कहा कि शाहरुख खान ने बहुत तामझाम बढ़ा दिया है. फिर भी आप अकेले हैं. इस पर क्या कहेंगे?

देखिए, हम सभी अपनी जिंदगी में उस चीज का चयन करते हैं, जिस से हमें खुशी मिले. मुकाम सिर्फ टैलेंट के आधार पर नहीं मिलता. मुकाम मिलने की कई वजहें होती हैं. मैं दावा नहीं करता कि हर बार मैं सही होता हूं, लेकिन मैं जिस मुकाम से जिंदगी डील कर रहा हूं उस मुकाम पर ज्यादा लोग नहीं हैं. तो वहां खुद को अकेला महसूस करना स्वाभाविक है.

क्या किसी मुसीबत के समय अपने परिवार से भी मदद नहीं लेते?

एक फिल्मस्टार का परिवार होना सब से बड़ी मुसीबत है. इसीलिए मैं ने अपने पूरे परिवार, पत्नी, बच्चे, बहन, भाई सब को दूर रखा हुआ है. अन्यथा शुक्रवार से शुक्रवार उन को भी परेशानी होगी. हम ने अपने घर का माहौल ही अलग बना रखा है. मैं सैट पर घटी किसी भी घटना का जिक्र घर पर नहीं करता. हम ने घर को सिनेमा का सैट नहीं बनाया है. मैं ने घर के अंदर प्रोडक्शन या डिस्ट्रीब्यूशन औफिस भी नहीं बनाया. मेरे घर के अंदर परिवार है. मैं कभी भी डिनर टेबल पर बच्चों से या पत्नी से अपनी दिनभर की समस्याओं का जिक्र नहीं करता. मैं अपने बच्चों की जिंदगी को एक सुपरस्टार की जिंदगी के साथ कभी नहीं मिलाता. घर में मैं बहुत आम इंसान की तरह रहता हूं.

यानी आप यह मानते हैं कि एक सुपरस्टार के परिवार का होना उस के लिए मुसीबत होती है?

जी हां. मैं ने अपनी इंडस्ट्री के 2 बच्चों के साथ काम किया है, जिन के पिता इस इंडस्ट्री में सुपरस्टार हैं. अभिषेक बच्चन के पिता अमिताभ बच्चन और विवान शाह के पिता नसीरुद्दीन शाह इंडस्ट्री में स्टार हैं. इन दोनों बच्चों के ऊपर हमेशा एक प्रैशर बना रहता है. अभिषेक बच्चन को तो मैं बचपन से जानता हूं, जिस क्षेत्र में आप के पिता को ख्याति हासिल है, उस क्षेत्र में यदि आप हैं तो कितना प्रैशर पड़ता है, इस का मुझे एहसास है. इसलिए मैं अपने बेटे पर दबाव नहीं पड़ने देना चाहता. वह पढ़ाई कर रहा है, उसे वही करने दें. मेरी जो समस्याएं हैं, वे मेरी अपनी हैं. मेरी समस्या से उन का क्या लेनादेना? मैं कमा रहा हूं, वह थोड़े ही कमा रहा है? मैं स्टार हूं, लोग मुझ से प्यार करते हैं, मेरे परिवार से नहीं.

जब मेरा बेटा आर्यन ढाई साल का था, तब लोग आतेजाते उस से कहते थे कि ‘तू भी हीरो बनेगा?’ अरे भई, क्यों हीरो बनेगा? जिसे अपना नाम नहीं पता, उसे क्या पता? मेरा बड़ा बेटा अभी 17 साल का है, जब वह 13 साल का था, तभी लोगों ने उस से पूछना शुरू कर दिया था कि बेटा, तुम हीरो बनोगे? एक दिन उस ने मुझ से पूछा कि पापा, क्या मैं हीरो बनूंगा? क्या आप मुझे फिल्म स्टार बनाना चाहते हैं? मैं ने उस से कहा, ‘तुम क्या बनना चाहते हो?’ तो उस ने कहा, ‘मुझे नहीं पता.’

मेरा मानना है कि 12-13 साल के बच्चे को बिलकुल नहीं पता होना चाहिए कि उसे क्या बनना है. उसे सिर्फ पढ़ाई करनी चाहिए. जिंदगी जीनी चाहिए. पढ़ाई पूरी होने के बाद वह सोचेगा कि उसे क्या करना है.

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फिल्म निर्माण कंपनी का विस्तार करते हुए किस तरह की फिल्में बनाने की इच्छा है?

हमारी प्रोडक्शन कंपनी की सोच यह है कि फिल्म छोटी हो या बड़ी, तकनीकी स्तर पर बेहतर होनी चाहिए. हमारे पास एडिटिंग, वीएफएक्स, पोस्ट प्रोडक्शन सहित सारी बेहतरीन तकनीकें उपलब्ध हैं. हम गुणवत्ता को ले कर कहीं कोई समझौता नहीं करते. जहां तक रचनात्मकता का सवाल है तो उस में कुछ हमारी पसंद होगी, कुछ दर्शकों की, तो कुछ दूसरे लोगों की.

भारतीय सिनेमा के सामने हौलीवुड फिल्मों के रूप में नया संकट खड़ा हो गया है. अब मल्टीप्लैक्स में हौलीवुड फिल्में हिंदी, तमिल व मलयालम भाषाओं में डब हो कर रिलीज होने लगी हैं. इस पर क्या कहेंगे आप?

हौलीवुड की फिल्मों को आने से हम रोक नहीं सकते. ऐसे में अब हमारे पास एक ही रास्ता है कि हम भारत के क्षेत्रीय सिनेमा को बढ़ावा दें. जरूरत है कि हम रचनात्मकता के साथसाथ गुणवत्ता के स्तर पर भी बेहतरीन फिल्में बनाएं. इन दिनों हमारा क्षेत्रीय सिनेमा काफी अमेजिंग हो गया है. यह क्षेत्रीय सिनेमा ही हौलीवुड सिनेमा को अच्छी टक्कर दे सकता है.

तो क्या आप क्षेत्रीय सिनेमा बनाएंगे?

जी हां. बातचीत चल रही है. मराठी या बंगाली फिल्म बना सकता हूं. पर हमें मराठी सिनेमा या कोलकाता के सिनेमा का बिजनैस नहीं पता है. उसे भी समझने की कोशिश कर रहे हैं.

आप को नहीं लगता कि विदेशी फिल्मों में तकनीक महत्त्वपूर्ण होती है, जबकि भारतीय सिनेमा में कहानी महत्त्वपूर्ण होती है?

मैं आप की इस बात से सहमत नहीं हूं. मेरा मानना है कि विदेशी फिल्मों में तकनीक के साथ कहानी भी होती है. मेरा मानना है कि हर तकनीक कहानी को समृद्ध करती है. फर्क इतना ही है कि सीन सही ढंग से फिल्माए जाने चाहिए. यदि आप की फिल्म में हीरो 10 लोगों को मारता है और वह हवा में उड़ता है तो उस का हवा में उड़ना सही ढंग से होना चाहिए. यदि आप तकनीक के बारे में दर्शकों को शिक्षा नहीं दे रहे हैं तो आप का सिनेमा आगे कैसे बढ़ेगा? हमें दर्शकों को ग्रांटेड मान कर नहीं चलना चाहिए.

भारतीय सिनेमा का सब से कमजोर पक्ष क्या है?

पटकथा लेखन सब से कमजोर पक्ष है. हमारे यहां कहानी लेखन और पटकथा लेखन का कोई स्कूल ही नहीं है. हमारे यहां होता यह है कि कुछ भी लिख दो. लोग कहते हैं कि यह सीन डालना पड़ेगा, वरना लोगों को बात समझ में नहीं आएगी. आप का कहानी कथन इस ढंग से हो कि वह सुंदर लगे. स्क्रीनप्ले लेखन भी एक विज्ञान है, यह स्वीकार कर काम करना पड़ेगा. मैं ने कई अमेरिकी फिल्में देखी हैं, वैसे वे भी कुछ खराब फिल्में बनाते हैं. पर मैं ने महसूस किया कि उन की फिल्मों का स्क्रीनप्ले बहुत बेहतरीन होता है. मैं अभी 2 दिनों के लिए अमेरिका के ऐसे शहर गया हुआ था. जहां सड़क पर हर चौथी दुकान में मुझे स्क्रीनप्ले राइटिंग स्कूल नजर आया. भारत में ऐसा एक भी स्कूल नहीं है.

आप निर्देशक कब बन रहे हैं?

फिलहाल तो कोई योजना नहीं है. अभी मुझे बतौर निर्माता व कलाकार बहुत कुछ काम करना है. निर्देशक बन गया तो अभिनय नहीं कर पाऊंगा.