अमेरिका में हिलेरी क्लिंटन डैमोक्रेटिक पार्टी से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी हासिल करने के बाद अब पूरी तरह चुनाव प्रचार अभियान में जुट गई हैं. दुनिया के सब से शक्तिशाली देश अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव पर सभी की निगाहें हैं जो हिलेरी रोढम क्लिंटन की उम्मीदवारी से कड़ा और दिलचस्प हो चला है. दिलचस्प इसलिए कि अमेरिकी लोकतंत्र में पहली बार किसी महिला को राष्ट्रपति पद के लिए टिकट मिला है. 227 साल के इतिहास में कोई महिला नेता हिलेरी क्लिंटन जितने मुकाम पर नहीं पहुंची. लेकिन इस का यह मतलब भी नहीं कि अमेरिकी मतदाता पहली बार किसी महिला को राष्ट्रपति बनाने को बहुत उतावला है. हिलेरी को अपने प्रतिद्वंद्वी रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप से कड़ी टक्कर मिल रही है. 8 नवंबर को पता चलेगा कि हिलेरी क्लिंटन अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति बन पाईं या नहीं.

बिलाशक फैशनेबल हिलेरी क्लिंटन खूबसूरत और लोकप्रिय महिला हैं जिन्हें अपने प्रतिद्वंद्वी के मुकाबले राजनीति का खासा तजरबा है. पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी होने के नाते वे 1999 से ले कर 2001 तक अमेरिका की प्रथम महिला होने का ताज पहने रहीं. न्यूयार्क से सीनेटर हिलेरी अमेरिका की विदेश मंत्री हैं. साल 2008 में भी हिलेरी डैमोक्रेटिक पार्टी से राष्ट्रपति पद की तगड़ी दावेदार थीं लेकिन रहस्यमय और हैरतअंगेज तरीके से उन्होंने मौजूदा राष्ट्रपति बराक ओबामा के समर्थन में अपना नाम, नाटकीय अंदाज से ही सही, वापस ले लिया था, यानी हालात देख झुकना उन्हें आता है. अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव किसी ग्रैंड स्लैम टूर्नामैंट के फाइनल मैच सरीखा होता है जिस में दावे से कोई नहीं कह सकता कि फलां खिलाड़ी ही जीतेगा या जीत रहा है. लंबी पर दिलचस्प चुनावी प्रक्रिया से गुजर रहा अमेरिका का व्हाइट हाउस नए राष्ट्रपति का इंतजार कर रहा है. बराक ओबामा की विदाई पार्टियां शुरू हो गई हैं जिन के साथ ही अमेरिकी राजनीति का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय खत्म हो जाएगा. अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा जिन कई वजहों से याद किए जाएंगे उन में से एक भारत के प्रति उन का झुकाव और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अनौपचारिक दोस्ती भी रहेगी.

अपनी खास हेयरस्टाइल के लिए पहचानी जाने वाली हिलेरी क्लिंटन के बारे में यह गलत नहीं कहा जा रहा कि वे अगर जीतीं तो ओबामा की नीतियों पर ही चलेंगी और भारत से प्रगाढ़ हो गए संबंधों को निभाएंगी. 8 नवंबर सुपर ट्यूज्डे का इंतजार पूरी दुनिया के देश इस नजरिए से भी कर रहे हैं कि अगर हिलेरी क्लिंटन राष्ट्रपति बनीं तो उन पर क्या फर्क पड़ेगा और अगर डोनाल्ड ट्रंप बने तो क्या असर पड़ेगा.

हिलेरी और डैमोक्रेटिक पार्टी

हिलेरी क्लिंटन राजनीतिक पृष्ठभूमि वाली महिला नहीं हैं और अपवादस्वरूप अमेरिका परिवारवाद की राजनीति से मुक्त ही रहा है. चूंकि वह प्रवासियों और व्यापारियों का देश है, इस के चलते राष्ट्रपति चुनने में वहां के मूल निवासियों की भूमिका गौण हो चली है. अमेरिका के इलियान प्रांत में जन्मी हिलेरी क्लिंटन एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार से हैं जिन के पिता ह्यूज रोढम कपड़े की दुकान चलाते थे. 1969 में बेलस्ले यूनिवर्सिटी से उन्होंने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि ली थी. फिर 4 साल बाद उन्होंने कानून की भी डिगरी ली और वकालत करने लगीं. 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध में उन का नाम अमेरिका के 100 प्रभावशाली अधिवक्ताओं में शुमार किया जाता था. येल ला स्कूल में कानून की पढ़ाई के दौरान उन का परिचय बिल क्लिंटन से हुआ था. साल 1975 तक दोस्ती प्यार में और प्यार शादी में तबदील हो गई. उस वक्त ये दोनों ही अरकासांस विश्वविद्यालय में प्राध्यापक थे. इन दोनों की इकलौती बेटी 35 वर्षीय चेलसी क्लिंटन है.

महत्त्वाकांक्षी बिल क्लिंटन राजनीति की तरफ मुड़े तो हिलेरी ने उन्हें पर्याप्त प्रोत्साहन और सहयोग दिया. जब मोनिका लेविंस्की से बिल क्लिंटन के नाजायज संबंध उजागर हुए तब भी वे पति के साथ खड़ी रहीं.

डैमोक्रेटिक पार्टी दुनिया की सब से पुरानी पार्टी है जिस का गठन साल 1828 में हुआ था. इस पार्टी ने अब तक 15 राष्ट्रपति दिए हैं जिन में जौन एफ कैनेडी के अलावा जिम्मी कार्टर, बिल क्लिंटन, जौर्ज बुश और फ्रेंकलिन रूजवेल्ट के नाम उल्लेखनीय हैं. यह पार्टी मध्यवर्गीय अमेरिकियों में गहरी पैठ रखती है क्योंकि इस का एजेंडा सामाजिक न्याय और उदारता है. वाम झुकाव वाले इस दल का प्रवासियों में भी खासा प्रभाव है. मौजूदा चुनाव के तमाम सर्वे बता रहे हैं कि 93 फीसदी अश्वेत मतदाताओं का झुकाव डैमोक्रेटिक पार्टी की तरफ है और इस की एक बड़ी वजह बराक ओबामा भी हैं जो खुल कर हिलेरी क्लिंटन का प्रचार कर रहे हैं.

डैमोक्रेटिक पार्टी का रंग नीला और चुनाव चिह्न गधा है. भारत के साथ संबंधों की जो शुरुआत जौन एफ कैनेडी ने की थी वह बराक ओबामा तक न केवल कायम रही बल्कि अमेरिका का झुकाव भारत की तरफ और बढ़ा, कहना न होगा कि इस की एक बड़ी वजह भारत का बाजार है जिस के बारे में हर कोई मानने लगा है कि माल कहीं भी बने, ग्राहक तो भारत में ही मिलेंगे.

उलट इस के, 18 राष्ट्रपति देने वाली रिपब्लिकन पार्टी, जिस ने अब्राहम लिंकन के रूप में अमेरिका को पहला राष्ट्रपति दिया था, की विचारधारा सामाजिक मसलों पर संकीर्ण रही है. यह पार्टी हथियारों की पक्षधर है और चीन व भारत से आउटसोर्सिंग की विरोधी है. पेशे से रियल एस्टेट व्यवसायी डोनाल्ड ट्रंप एक हद तक पार्टी की गाइडलाइन से हट कर भारत के प्रति झुकाव दिखा रहे हैं तो इस की बड़ी वजह अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के लगभग 40 लाख लोग हैं, जिन में से

10 लाख को वोट देने का अधिकार है. अब रिपब्लिकन पार्टी भी मानने लगी है कि पाकिस्तान के मुकाबले भारत कहीं ज्यादा लोकतांत्रिक मित्र साबित हो सकता है. रिपब्लिकन पार्टी पर कारोबारियों की पार्टी होने का ठप्पा लगा है.

भूमिका हिलेरी की

स्वभाव से नम्र हिलेरी क्लिंटन पर डोनाल्ड ट्रंप कम भारी नहीं पड़ रहे जिन के बारे में कहा जाता है कि वे विदेशी नीति के बारे में खास कुछ नहीं जानते और आर्थिक नीतियों पर मतदाता से कह रहे हैं कि चिंता मत करो, मुझे जिताओ और बेफिक्र हो जाओ. मेरे राष्ट्रपति बनते ही चीन सुधर जाएगा और दोस्त बन जाएगा.

3 शादियां कर चुके डोनाल्ड की छवि मुंहफट नेता की है. इस के बाद भी वे हिलेरी के बराबर ही लोकप्रिय हैं और प्रभावी भी हैं. उन्हें एक बड़ी उम्मीद डैमोक्रेटिक सरकार से वोटर की ऊब है जिस के चलते मतदाता सत्ता परिवर्तन की बात सोच सकते हैं. यह बात एक सर्वे में जाहिर हो चुकी है कि मतदाता असमंजस में हैं कि लगातार तीसरी बार डैमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार को जिताएं या नहीं.

चुनावप्रचार में चूंकि नीतियोंरीतियों पर कम, व्यक्तित्व पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है तो आरोपप्रत्यारोप भी खूब लग रहे हैं. ट्रंप और हिलेरी एकदूसरे पर व्यक्तिगत हमले करने से चूक नहीं रहे और इस लड़ाई में भी दोनों बराबरी पर हैं. ट्रंप हिलेरी को विश्वस्तरीय झूठी बताते रहे हैं और साथ ही, यह भी कह रहे हैं कि वे अपने पति बिल क्लिंटन द्वारा शोषित महिलाओं को बरबाद करने वाली हैं.

वाकयुद्ध में माहिर हिलेरी को दरअसल अपनी भूमिका तय करने में परेशानी पेश आ रही है. हालांकि विश्लेषकों की राय में उन की स्थिति तमाम उतारचढ़ावों के बाद भी बेहतर है. पर ऐन वक्त पर क्या कुछ हो जाए, कहा नहीं जा सकता और यही अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव की खूबी है. युवा मतदाता इन दोनों से ही निराश हैं क्योंकि ट्रंप 70 के और हिलेरी 68 साल की हैं. साल 2008 में बराक ओबामा को चुने जाने की एक अहम वजह उन की कम उम्र (तब 54 साल) भी थी.

अप्रिय अनुभव

चुनाव प्रणाली के अंतर के अलावा भारतीय और अमेरिकी चुनाव में कोई खास फर्क अब नहीं रह गया है. हिलेरी क्लिंटन के महिला होने को भारतीय पृष्ठभूमि से देखें तो अगर वे राष्ट्रपति बनीं तो लगता नहीं कि कोई चमत्कार कर पाएंगी या गुल खिला पाएंगी.

भारत में अमेरिका के मुकाबले महिला नेताओं की बड़ी फौज है. देश की पहली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी लोकप्रिय जरूर थीं पर सफल नहीं कही जा सकतीं जिन्हें राजनीति विरासत में और पद बैठेबिठाए मिल गए थे. पंडित जवाहरलाल नेहरू की इस इकलौती वारिस को अब महज आपातकाल लगाने की वजह से याद किया जाता है. वे अच्छा भाषण देती थीं पर भारत को समझने में नाकाम रही थीं. मूलतया इंदिरा गांधी आंशिक तानाशाह भी थीं. 1975 में लगाई गई इमरजैंसी उन की हताशा और कुंठा की देन थी.

एक वक्त में उन के नाम पर वोट झड़ते थे लेकिन मतदाताओं की उम्मीदों पर वे कभी खरी नहीं उतर पाईं. उन का ‘गरीबी हटाओ’ का नारा नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया सरीखा ही लोकप्रिय हुआ था. लेकिन गरीबी नहीं हटी. 70 के दशक में इंदिरा गांधी की निरंकुशता को ले कर देश के चिंतक और बुद्धिजीवी हैरान थे लेकिन कर कुछ नहीं सकते थे क्योंकि इंदिरा गांधी सबकुछ अपने हाथ में रखती थीं, सत्ता भी और संगठन भी. चंद चाटुकारों से घिरी इंदिरा का दबदबा तोड़ने के लिए जयप्रकाश नारायण ने पहल की और देशभर में उन के खिलाफ अभियान छेड़ दिया.

युवाओं को जयप्रकाश नारायण यह बताने में कामयाब रहे कि इंदिरा गांधी देश के लिए कर कुछ नहीं रही हैं. उलटे, अपनी जिद व अहं के चलते उसे गर्त में ले जा रही हैं. तमाम विरोधी दलों को इकट्ठा कर उन्होंने जनता पार्टी बनाई तो 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस के चिथड़े उड़ गए थे. ऐसा लगने लगा था कि कांग्रेस अब खत्म हो गई. लेकिन विभिन्न मतों और विचारधाराओं वाले दल ज्यादा दिन एकजुट नहीं रह पाए और जल्द ही जनता पार्टी कई हिस्सों में बंट गई. इस का फायदा कांग्रेस को मिला और 1980 में इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री बनीं.

यह वह दौर था जब इंदिरा भक्त कांग्रेसी ‘इंदिरा इज इंडिया’ और ‘इंडिया इज इंदिरा’ का नारा लगाने लगे थे. खुशामद और चाटुकारिता की आदी हो गईं इंदिरा गांधी एक बार जो शोबाजी का शिकार हुईं तो फिर उस से उबर नहीं पाईं.

उन की बहू सोनिया गांधी चाहतीं तो प्रधानमंत्री बन सकती थीं पर नहीं बनीं क्योंकि उन के विदेशी होने का घोर विरोध था. भाजपा की 2 महिला नेता सुषमा स्वराज और उमा भारती, जो वर्तमान में मंत्री हैं, ने तो तिलमिलाते हुए ऐलान कर डाला था कि अगर सोनिया प्रधानमंत्री बनीं तो वे सिर मुंडा लेंगी और पूरी जिंदगी जमीन पर सोएंगी. इस विरोध से सोनिया नहीं घबराई थीं. हकीकत में वे सीधे देश की जिम्मेदारी लेने से डर गई थीं, इसलिए सीधेसादे मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना डाला. 10 साल सोनिया ने मनमोहन सिंह के कंधे पर रख कर बंदूक चलाई और खूब घोटाले इस दौरान परवान चढ़े. चूंकि कांग्रेस हमेशा ही नेहरूगांधी परिवार की मुहताज रही है, इसलिए सोनिया गांधी बड़ी मानमनौव्वल के बाद राजनीति में आई थीं और जब आईं तो सास की तरह पार्टी को अपनी मुट्ठी में बंद रखा यानी जिस ने विरोध किया या किसी गलत बात पर एतराज जताया, उसे चलता कर देने में उन्होंने देर नहीं की.

सोनिया गांधी के अप्रत्यक्ष सत्ता में रहते कांग्रेस किस और कितनी दुर्गति का शिकार हुई, यह बात अब किसी सुबूत की मुहताज नहीं रह गई है. नरेंद्र मोदी अगर प्रधानमंत्री बने तो इस बाबत उन्हें बजाय सोनिया गांधी को कोसने के, उन का शुक्रगुजार होना चाहिए जिन्होंने जनता को इतना त्रस्त कर डाला था कि उस ने भगवा ब्रिगेड की दूसरी पंक्ति के नेता को प्रधानमंत्री बनाना मंजूर कर लिया.

कांग्रेस से अलग हो कर अपनी खुद की पार्टी तृणमूल कांग्रेस बना लेने वाली ममता बनर्जी ने दोबारा बंगाल फतह जरूर कर लिया है पर वे भी कोई गुल नहीं खिला पाई हैं. सारदा घोटाला जैसा विवाद उन के कैरियर पर एक ब्लैक सर्टिफिकेट की तरह चिपक गया है. वामपंथियों का गढ़ तोड़ने वाली ममता बनर्जी को अब समझ नहीं आ रहा कि क्या करें, राज्य की समस्याएं ज्यों की त्यों हैं. वहां की कानून व्यवस्था चरमराई हुई है और टीएमसी के नेता भी कांग्रेसियों व भाजपाइयों की तरह बेलगाम हो चले हैं.

ममता दिखने में साधारण हैं और सादगी पसंद हैं लेकिन अपने गुस्से और जबान को काबू में रख पाने का हुनर उन में नहीं है. लोकप्रियता और सफलता में बड़ा फर्क होता है, लोकप्रियता ममता ने भी भुनाई और उन्हें बिखरे विपक्ष का फायदा भी मिला लेकिन इस से आम लोगों का कोई भला नहीं हुआ. जिस पश्चिम बंगाल में नक्सलियों के खौफ के चलते भ्रष्टाचार कभीकभार सुनने में आता था, वह अब वहां रोजमर्रा की बात हो चला है.

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता फिर सत्ता में हैं तो उन गरीबों की वजह से जो उन के पिछले कार्यकाल में भी गरीब थे. अपने जमाने की ये लोकप्रिय अभिनेत्री सलीके से सरकार चलाने से ज्यादा साडि़यों और गहनों के शौक के कारण जानी जाती हैं. तमिलनाडु में पसरा जातिवाद, भेदभाव और छुआछूत किसी सुबूत के मुहताज नहीं पर जयललिता को इन समस्याओं से कोई वास्ता नहीं है. भूखे लोग चिल्लाएं नहीं, इस के लिए वे सस्ते खाने वाली कैंटीन खोल कर समय गुजार रही हैं.

भ्रष्टाचार के कुछ मामलों से घिरीं जयललिता में भी कुछ कर गुजरने का जज्बा नहीं है. वे भी महज भाषणबाजी के दम पर टिकी हैं. मुमकिन है अगली दफा जनता उन्हें चलता कर दे. इस से साबित यही होगा कि महिला नेता कोई खास करिश्मा नहीं कर पातीं जबकि जनता उन्हें हाथोंहाथ लेती है.

शीला दीक्षित ने 15 साल दिल्ली पर राज किया पर जब पिछले चुनाव में जनता ने उन का मूल्यांकन किया तो उन्हें एकएक वोट के लिए तरसा दिया. हैरानी की बात है कि नई दिल्ली सीट से बुरी तरह मुंह की खा चुकीं शीला दीक्षित को कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की भावी मुख्यमंत्री के तौर पर पेश कर दिया है.

क्या है फर्क

अमेरिका और भारत की राजनीति बहुत भिन्न नहीं रह गई है. अमेरिका में भी विज्ञापनबाजी है, भ्रष्टाचार के आरोप हैं, धार्मिक आस्था पर कटाक्ष है, तूतड़ाक है और इस माहौल में हिलेरी क्लिंटन प्रतिद्वंद्वी डोनाल्ड ट्रंप पर उसी तरह के ताने कस रही हैं जैसे सोनिया गांधी और ममता बनर्जी यहां नरेंद्र मोदी पर कसती रहती हैं.

मसलन, हिलेरी कहती हैं कि इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की तारीफ करने वाले डोनाल्ड ट्रंप अगर राष्ट्रपति बने तो कितना बड़ा खतरा साबित होंगे और ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर आने का स्वागत कर रहे हैं तो व्हाइट हाऊस जाने के काबिल ही नहीं है. वहीं, शुरुआती प्रचार में ट्रंप ने हिलेरी के धर्म पर सवाल उठाया तो उसे भी मुद्दा बनाने में हिलेरी चूकी नहीं थीं.

यह राजनीतिक विवशता हो सकती है पर इसे नेतृत्व क्षमता या गुण नहीं कहा जा सकता. हिलेरी अगर जीतीं तो अमेरिका की शक्ल नहीं बदल देंगी क्योंकि वे भी एक मजबूरी की देन होंगी. जब नेताओं के व्यक्तित्व विचारधाराओं पर हावी हो जाते हैं तो मतदाता भी भ्रमित हो जाता है. भारत की तरह अमेरिका में भी यही हो रहा है.

विवादित ईमेल प्रकरण हिलेरी पर भारी पड़ रहा है जिस के चलते अधिकांश मतदाता उन्हें भरोसेमंद नहीं मानते.

ईमेल मामले में ही जांच में यह बात साफ हो गई है कि विदेश मंत्री रहते उन्होंने निजी सर्वर का इस्तेमाल करते न केवल देश की सुरक्षा को खतरे में डाला

बल्कि एक जिम्मेदार पद पर रहते गैर जिम्मेदाराना रवैया अपनाया. जांच एजेंसी एफबीआई की लिस्ट में हिलेरी का नाम आते ही उन की लोकप्रियता में गिरावट दर्ज की गई थी. जुलाई के तीसरे हफ्ते के एक सर्वे में दोनों उम्मीदवारों को कम से कम 40-40 फीसदी मतदाताओं का समर्थन हासिल था.

फर्क सिर्फ इतना भर है कि पहली दफा कोई महिला प्रत्याशी सब से ताकतवर देश के राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार है. हिलेरी क्लिंटन के प्रचार का तरीका बता रहा है कि वे अगर व्हाइट हाउस गईं तो विकासशील देशों के दोहन का सिलसिला जारी रखेंगी. और जोजो बराक ओबामा छोड़ कर जा रहे हैं उसे बनाए रखेंगी. और अगर वे हारीं तो भी उन का कुछ खास नहीं बिगड़ना. हार कर भी वे रिकौर्ड ही बनाएंगी और साबित

यह होगा कि एक कुशल प्रशासक की छवि मतदाताओं को नहीं दिखी.

बैसाखी के सहारे राजनीतिक कैरियर                                 

जिस तरह भारतीय परिवार और समाज की संरचना के मुताबिक महिलाएं पुरुषों की बैसाखी के बिना एक कदम भी नहीं चल सकतीं, उन के निर्णय को अपना फैसला मानती हैं, ठीक उसी तरह भारतीय राजनीति में ज्यादातर महिला राजनेता या तो पारिवारिक पुरुष नेता की बदौलत किसी सियासी मुकाम पर पहुंची हैं या फिर उन की कामयाबी के पीछे कोई न कोई राजनीतिक शख्सीयत रही है. कहने का मतलब यह है कि हमारे यहां ऐसी महिला राजनेता कम हैं जो अपने दम पर, जमीन से संघर्ष कर राजनीति के किसी मुकाम पर पहुंची हैं. अगर महिलाएं राजनीति में आगे आती भी हैं तो इस के पीछे किसी न किसी पुरुष का हाथ होता है वरना अपने बलबूते पर समाज या सियासत में ऊपर आना उन के लिए संभव नहीं हो पाता.

 बसपा सुप्रीमो मायावती की कामयाबी के पीछे जहां कांशीराम का हाथ रहा, वहीं तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता का पौलिटिकल कैरियर भी उस दौर के मशहूर अभिनता और राजनेता एम जी रामचंद्रन की बैसाखी के सहारे आगे बढ़ा. हिलेरी क्लिंटन जहां पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हैं वहीं डिंपल यादव की कामयाबी के पीछे सपा प्रमुख व ससुर मुलायम सिंह यादव और उत्तर प्रदेश के सीएम अखिलेश यादव का सहारा है. यादव परिवार में ऐसी आधा दर्जन महिला नेता हैं. इसी तरह दिवंगत अभिनेता सुनील दत्त के नाम का सहारा ले कर उन की पुत्री प्रिया दत्त सियासत में आईं तो इंदिरा गांधी के पीछे नेहरू परिवार की बैसाखी थी. बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, जिन्हें रबर स्टांप भी कहा जाता था, लालू की छाया

से कभी बाहर न आ सकीं. इसी तरह लालू की बेटी मीसा भारती भी लालू के नाम पर सियासी कैरियर स्टार्ट कर चुकी हैं. फिलहाल सोनिया गांधी, मेनका गांधी, मीरा कुमार, सुप्रिया सुले, वसुंधरा राजे आदि जितनी भी महिलाएं राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय हैं,  उन्हें यह या तो विरासत में मिली है या फिर उन के राजनीतिक कैरियर में किसी न किसी पुरुष का हाथ रहा है. 

दुनियाभर की जिन महिला राजनीतिक हस्तियों को आज कद्दावर नेता माना जाता है उन के पीछे भी सियासी विरासत का पेंच काम करता रहा है. मसलन, पाकिस्तान की पहली महिला प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो को अपने पिता और देश के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो से राजनीति विरासत में मिली थी. जबकि बंगलादेश की वर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना के पिता शेख मुजीबुर्रहमान को बंगलादेश का संस्थापक माना जाता है. श्रीलंका की सिरिमाओ भंडारनायके विश्व की पहली महिला प्रधानमंत्री जरूर थीं लेकिन उन्होंने भी अपने पति और पूर्व प्रधानमंत्री सोलोमन भंडारनायके की विरासत को ही आगे बढ़ाया. इंडोनेशिया की पहली महिला राष्ट्रपति मेगावती सुकर्णोपुत्री के पिता सुकर्णो देश के पहले राष्ट्रपति थे. जबकि खालिदा जिया बंगलादेश की प्रधानमंत्री बनने वाली पहली महिला नेता थीं. खालिदा को राजनीति पारिवारिक विरासत के तौर पर मिली थी.

आंकड़ों में बदहाल महिला राजनीति

वीमेन इन लीडरशिप वैबसाइट के आंकड़े बताते हैं कि फिलहाल विश्व में केवल 24 महिला नेता हैं. यह हाल तब है जब इन में ब्रिटेन की महारानी व डेनमार्क की रानी को भी शुमार किया गया है. अगर भारत की बात करें तो 1991 में लोकसभा में 8.04 प्रतिशत महिलाएं थीं और 2004 में यह संख्या थोड़ी बढ़ कर 8.3 प्रतिशत हो गई. ये आंकडें़ सुबूत हैं इस बात के कि एक दशक से भी ज्यादा वक्त में राजनीति में महिलाओं की जर्जर हालत सुधर नहीं सकी.

वैसे तो कई महिलाएं राजनीति में हैं लेकिन ज्यादातर महिलाएं अहम पदों के बजाय दोयम दरजे के पद संभालती हैं. हमारे यहां हमेशा से ही सियासत में पुरुषों का वर्चस्व रहा है. भले ही महानगरों और मल्टीनैशनल व कौर्पोरेट जगत में महिलाएं ऊंचे ओहदे संभालने लगी हों लेकिन गरीबी, शिक्षा में कमी या फिर पिछड़े समाज की वजह से इन्हें मुख्यधारा की राजनीति में आने का मौका नहीं मिला है.

सितंबर 1996 में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को ले कर एक बिल का प्रस्ताव रखा गया लेकिन उस के बाद किसी भी सियासी दल ने  इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की. यहां तक कि कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्य, जो अपेक्षाकृत विकसित और संपन्न माने जाते हैं, से आने वाली महिला राजनेताओं का आंकड़ा भी दयनीय है, जबकि उत्तर प्रदेश या बिहार में उन की संख्या कहीं ज्यादा है.

पिछले साल की इंटर पार्लियामैंट्री यूनियन यानी आईपीयू की रिपोर्ट में देखा गया कि दुनिया के किन देशों में महिलाओं की सियासी भागीदारी कैसी है. इस मोरचे पर भारत को 103वें नंबर पर रखा गया. इस सूची में पहले 10 नंबर पर रवांडा, बोलिविया, अंडोरा, क्यूबा, सेशेल्स, स्वीडन, सेनेगल, फिनलैंड, इक्वाडोर व दक्षिण अफ्रीका जैसे देश थे. तब भी और आज भी सीरिया, नाइजीरिया, बंगलादेश, नेपाल व पाकिस्तान के अलावा चीन व सिएरा लियोन जैसे देश इस मामले में भारत से आगे हैं. कई यूरोपीय देश भी ऐसे हैं जहां कोई महिला प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं रही. इन में स्पेन, इटली, स्वीडन और हौलैंड के नाम सहसा ध्यान में आते हैं.

महिला नेताओं की सैक्स अपील अजूबा क्यों?

बंगाल की मशहूर अभिनेत्री रूपा गांगुली ने जब सियासी मैदान में उतरते हुए बीजेपी जौइन की तो उन को ले कर तरहतरह की टिप्पणियां सुनने को मिलीं लेकिन सब से ओछी अभिव्यक्ति खुद को स्वतंत्र फिल्मकार मानने वाले पार्थदास गुप्ता की थी. टिप्पणी कुछ यों थी, ‘‘इस उम्र में भी उन की कमर और नाभि का हिस्सा किसी भी पुरुष की कामेच्छा जगाने व दूसरी महिलाओं के उन से ईर्ष्या करने का कारण है.’’

ऐसा क्यों है कि हम महिला राजनेताओं को खूबसूरत और ग्लैमरस देखते ही मर्यादा की तमाम सीमाएं लांघने लगते हैं. अगर वह सिनेमा, कौर्पोरेट जगत, मौडलिंग या एयरहोस्टैस जैसे क्षेत्र में है तो हमें कोई एतराज नहीं, लेकिन जैसे ही कोई महिला राजनीति में ग्लैमरस अवतार में नजर आती है तो उस की काबिलीयत, संघर्ष और मेहनत उस की फिगर, सैक्सी इमेज और क्लीवेज की नीचे दम क्यों तोड़ने लगती है. जब हर क्षेत्र में महिलाओं की देह की सुंदरता को तरजीह दी जाती है तो फिर राजनीति के मैदान में यह भेदभाव क्यों? अभी ज्यादा दिन नहीं  हुए जब असम की नवनिर्वाचित विधायक अंगूर लता डेका की खूबसूरती और पुराने फोटोशूट को ले कर खूब तंज कसे गए.

राजनीति में भला सैक्स अपील क्यों अजूबा सरीखी मानी जाती है. क्या भारतीय समाज में अभी भी महिला एक देह से इतर कुछ नहीं हैं. अभिनेत्री से नेता बनीं हेमा मालिनी के गालों की तुलना चिकनी सड़क से करने वाले लालू प्रसाद यादव हों या फिर महिला नेताओं के पहनावे की तुलना रैंप वाक सा करने वाले अन्य नेता, सब औरत को उस के काम से नहीं, सौंदर्य से ही संबोधित करते हैं. कुछ अरसा पहले एक नेता ने टिप्पणी की कि ये काम करने कहां आती हैं, ये तो मानो रैंप वाक करने आई हों. अभिनेत्री जयाप्रदा हों या गुल पनाग, सब को ले कर पुरुषों के कुछ ऐसे ही पूर्वाग्रह देखने को मिलते हैं.

प्रभावशाली महिला नेता

मारग्रेट थैचर : मारग्रेट थैचर बिटिश राजनीतिज्ञ थीं, जो 20वीं शताब्दी में सब से लंबी अवधि यानी 1979 से 1990 तक यूनाइटेड किंगडम की प्रधानमंत्री रही थीं. मारग्रेट एकमात्र महिला थीं जिन्होंने यह कार्यभार संभाला. 13 अक्तूबर, 1925 को जन्मीं मारग्रेट का निधन  8 अप्रैल, 2013 को हो गया.

एंजेला मार्केल : 60 वर्षीय एंजेला मार्केल दुनिया की सब से ताकतवर महिला में शुमार की जाती हैं. एंजेला  2005 से जरमनी की चांसलर हैं. वे जरमनी की पहली महिला चांसलर हैं. 17 जुलाई, 1954 को हैम्बर्ग में पैदा हुई मार्केल रिसर्च साइंटिस्ट हैं. उन्होंने 1990 में क्रिश्चियन डैमोक्रेटिक यूनियन में शामिल हो कर अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी.

डिलमा रोसेफ : ब्राजील की राष्ट्रपति डिलमा रोसेफ इस पद पर पहुंचने वाली पहली महिला हैं. ब्राजील में आयरन लेडी के नाम से मशहूर डिलमा का जन्म 14 दिसंबर, 1947 को हुआ. रोसेफ ने आर्थिक तौर पर कमजोर लोगों की सामाजिक सुरक्षा को मजबूती प्रदान करने के लिए सामाजिक सुरक्षा खर्च 10 प्रतिशत बढ़ाया. इस से ब्राजील के 3.60 करोड़ लोगों को फायदा हुआ.

आंग सान सू की : 19 जून, 1945 को रंगून में पैदा हुई आंग सान लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई प्रधानमंत्री, प्रमुख विपक्षी नेता और म्यांमार की नैशनल लीग फौर डैमोक्रेसी की नेता हैं. उन्हें 1990 में राफ्तो पुरस्कार व विचारों की स्वतंत्रता के लिए सखारोव पुरस्कार से नवाजा गया. आंग सान ने अपने संघर्ष के दौरान कई साल जेल में गुजारे.

शेख हसीना : बंगलादेश की वर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना बंगलादेश अवामी लीग की नेता हैं. पिता शेख मुजीबुर्रहमान को बंगलादेश का संस्थापक माना जाता है. 28  सितंबर, 1947 में जन्मीं शेख हसीना ने 1996 में चुनाव जीता और कई वर्षों तक देश का शासन चलाया. उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा.

सिरिमाओ भंडारनायके : 20 जुलाई, 1960 को दुनिया में पहली बार एक महिला को किसी देश की प्रधानमंत्री बनते देखा गया और वे श्रीलंका की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं सिरिमाओ भंडारनायके. श्रीलंका की सिरिमाओ भंडारनायके विश्व की पहली महिला प्रधानमंत्री तो थीं ही, साथ में उन्होंने अपने पति और पूर्व प्रधानमंत्री सोलोमन भंडारनायके की विरासत को भी आगे बढाया.

बेनजीर भुट्टो : बेनजीर भुट्टो 2 बार पाकिस्तान की प्रधानमंत्री रह चुकी हैं. पहली दफा 1988 में वे पाकिस्तान की 12वीं प्रधानमंत्री बनीं और दूसरी बार 1993 में उन्होंने यह पद संभाला. रावलपिंडी में एक राजनीतिक रैली के दौरान उन की हत्या कर दी गई. बेनजीर भुट्टो किसी भी मुसलिम देश की पहली महिला प्रधानमंत्री तथा 2 बार चुनी जाने वाली पाकिस्तान की पहली प्रधानमंत्री थीं.

पार्क ग्युन : दक्षिण कोरिया की राष्ट्रपति पार्क ग्युन को दक्षिण कोरिया के इतिहास की सब से प्रभावशाली और शक्तिशाली महिला नेताओं में शुमार किया जाता है. दक्षिण कोरिया की वे पहली महिला राजनेता हैं जिन्हें राष्ट्रपति चुना गया. वे कंजर्वेटिव ग्रांड नैशनल पार्टी की चेयर वीमेन भी रह चुकी हैं.

इजाबेल पेरोन : 1974 में  दुनिया की पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में अर्जेंटीना की इजाबेल पेरोन ने एक इतिहास रच डाला. इजाबेल अर्जेंटीना के पूर्व राष्ट्रपति की तीसरी पत्नी थीं. अपने पति के राष्ट्रपति काल के दौरान इजाबेल ने वाइस प्रैसिडैंट और फर्स्ट लेडी दोनों ही पोजीशन को बखूबी संभाला. पति की मौत के बाद उन्होंने 1 जुलाई, 1974 से 24 मार्च, 1976  तक राष्ट्रपति पद संभाला.

विद्या देवी भंडारी : 54 वर्षीय विद्या देवी भंडारी नेपाल में राजशाही खत्म होने के बाद लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई दूसरी राष्ट्रपति हैं. साथ ही नेपाल की प्रथम महिला राष्ट्रपति होने का गौरव भी इन्हें हासिल है. वे नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी की उपाध्यक्ष भी हैं. ये नेपाल रक्षा मंत्रालय में पूर्व रक्षा मंत्री भी रह चुकी हैं. उन के पति मदन भंडारी विख्यात कम्युनिस्ट नेता थे. 

– साथ में राजेश कुमार