अंतरराष्ट्रीय

2016 का अमेरिकी चुनाव : दुनिया की लोकतांत्रिक प्रणालियों पर धब्बा

अमेरिकी राष्ट्रपति पद पर डोनाल्ड ट्रंप की जीत ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है. सारे चुनावी अनुमान ध्वस्त हो गए हैं. ऐसी जीत की किसी को उम्मीद नहीं थी. ट्रंप के समर्थन में हवा चल रही थी और तमाम विशेषज्ञ इसे समझने में नाकाम रहे. विश्व के सब से पुराने, मजबूत और आदर्श माने गए अमेरिकी लोकतंत्र में जहरीली हवा फैला कर हासिल की गई यह जीत अब डरावनी लगने लगी है. इसलिए अमेरिका के अनेक हिस्सों में ट्रंप की जीत के खिलाफ धरने प्रदर्शन शुरू हो गए. ‘नौट आवर प्रेसिडैंट’ की तख्तियां लिए सड़कों पर उतरे लोग ट्रंप के पुतले फूंक रहे हैं. क्या स्वतंत्रता, बराबरी, न्याय के सिद्धांत पर आधारित लोकतंत्र के लिए यह जीत दुनिया की लोकतंत्र प्रणालियों पर काला धब्बा है?

अमेरिका की नस्लवादी और पुरुषवादी श्वेत व रंगीन आबादी ने ट्रंप को खासे बहुमत से जिता कर यह जाहिर कर दिया है कि उसे अपने राष्ट्रवाद, नस्लवाद और अमीर अर्थतंत्र की चिंता है न कि मानव इतिहास में बदलाव, सामाजिक सुधार और क्रांति की, यानी यह जीत नस्लीय सामाजिक व्यवस्था पर मुहर है.

मीडिया को भले ही यह उम्मीद रही हो कि अमेरिकी राष्ट्रपति के 225 साल के इतिहास में पहली बार एक महिला को राष्ट्रपति बनाने का मौका मिला है और वह हिलेरी क्लिंटन को जिता कर उदारवादी, समानता की सोच पर मुहर लगाएंगे पर इस जीत से स्पष्ट है कि अमेरिका में कट्टर राष्ट्रवाद का जन्म हो रहा है और वास्तविक उदारवाद हार रहा है. यह दृश्य एशिया में भारत से ले कर अब अमेरिका, यूरोप और अरब देशों में भी देखने को मिल रहा है.

खतरे में लोकतंत्र

जो स्थितियां लोकतंत्र को किसी भी देश में सफल बनाती हैं, वे अब गौण हो रही हैं. यह लोकतंत्र के लिए गंभीर समस्या है. अमेरिकी चुनावी नतीजों से वहां के उस समाज की सोच का भी खुलासा हो गया जो उदारवादी लोकतांत्रिक मूल्यों के खोखले दावे करता आया है और दुनिया को लोकतंत्र की सीख देता आ रहा है.

दरअसल 18 महीने लंबा चुनाव अभियान श्वेतों, अश्वेतों, धर्म और नस्ल के आधार पर सब से विभाजनकारी चुनाव था. प्रचार अभियान के दौरान वास्तविक मुद्दे गायब थे. चुनाव प्रचार के दौरान निचले स्तर की बयानबाजी के साथ एकदूसरे के परिवार को भी नहीं बख्शा गया.

रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप ने मुसलमानों, अश्वेतों, अप्रवासियों के खिलाफ जम कर जहर उगला. उन्होंने मसजिदों पर निगरानी रखने, मुसलमानों को देश से बाहर निकालने, आईएस जैसे आतंकी ठिकानों पर बमबारी, अमेरिका-मैक्सिको के बीच दीवार खड़ी करने और अप्रवासियों को रोकने जैसी बातें कहीं. ट्रंप का यह रवैया घृणा से प्रेरित था. कट्टर मानसिकता वाली जनता के बीच उन की यह कारगुजारी काम कर गई.

चुनावी सभाओं में कड़वाहट इस कदर व्याप्त थी कि जगहजगह झड़पें होती रहीं. ट्रंप की सभाओं में अश्वेतों व विरोधियों के साथ मारपीट की गई.

ट्रंप महिला विरोधी बयानों व यौन उत्पीड़न समेत कई विवादों से घिरे रहे. कई सैलिब्रिटी, मौडल्स समेत महिलाओं ने उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए. हौलीवुड अदाकारा लिंडसे लोहान का वीडियो चर्चित रहा जिस में ट्रंप उन पर भद्दी टिप्पणियां कर रहे हैं. और भी कई वीडियो सामने आए जिन में टं्रप अश्लीलता की सीमाएं लांघते दिखे. ट्रंप ने अपनी प्रतिद्वंद्वी हिलेरी क्लिंटन के पति पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और मोनिका लेविंस्की के सैक्स स्कैंडल्स को भी खूब उछाला.

ट्रंप को लगभग सारे सर्वे हरा रहे थे. न्यूयार्क टाइम्स, सीएनएन सहित 80 प्रतिशत अमेरिकी मीडिया व 75 फीसदी बड़े उद्योगपति उन के खिलाफ थे. उन की खुद की रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं ने ट्रंप को हराने की अपील की थी. दुनिया के 27 देशों के मीडिया ने ट्रंप की जीत को खतरनाक बताया था. अखबारों ने उन्हें वोट नहीं देने की अपील तक की थी. इस के बावजूद परिणाम हतोत्साहित करने वाले निकले और ट्रंपबाजी मार ले गए.

मुद्दे नदारद

अमेरिका के मशहूर लेखक डगलस कैनेडी ने ट्रंप के घृणास्पद प्रचार पर यहां तक कह दिया था कि अमेरिकी राष्ट्रपति पद के चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप के जीतने की संभावना नहीं है पर अगर वे जीत जाते हैं तो अमेरिका के मुसोलिनी साबित होंगे. साउथ कैरोलिना की गवर्नर निक्की हेली ने भी कहा कि मैं हर दिन इस बात पर सांस रोक लेती हूं कि अब ट्रंप क्या बोलेंगे यानी वे निचले स्तर की बयानबाजी की तमाम सीमाएं लांघ चुके हैं.

पूरे चुनाव प्रचार के दौरान रोजगार, विकास, विदेश नीति जैसे बुनियादी मुद्दों पर चर्चा न के बराबर हुई. ट्रंप को उन की पार्टी के ही नेता जालसाज बता चुके थे. उन्होंने अमेरिका में मुसलमानों और लैटिन अमेरिका मूल के लोगों के बारे में भेदभाव की वकालत की थी.

मतदान से पहले यह बात सामने आ चुकी थी कि मतदाता अमेरिकी राजनीति से घृणा करने लगे हैं. उन्हें इस बात पर भरोसा नहीं रहा कि ऐतिहासिक रूप से अब तक के सब से गंदे प्रचार के बाद चुना गया राष्ट्रपति क्या देश को एकजुट कर पाएगा. वोटरों को नहीं लगता कि नफरत व नैराश्य से भरे इस चुनावी वातावरण के बाद देश को पुरानी धारा में लौटाना किसी के लिए संभव होगा, क्योंकि 10 में से 8 वोटरों ने कहा था कि इन चुनावों ने उन में उत्साह जगाने के बजाय उन्हें निराशा की ओर धकेल दिया है.

चुनावों के दौरान डोनाल्ड ट्रंप पूरे अमेरिका का चक्कर लगा चुके थे.  सर्वे में 84 प्रतिशत अफ्रीकी मूल के अमेरिकी ट्रंप को नस्लवादी मानते रहे. 89 फीसदी लोगों ने कहा था कि वे हिलेरी को वोट देंगे. इस की वजह उन्होंने ओबामा को बताया था. 52 प्रतिशत युवा चुनाव के दौरान चली बयानबाजी से तनाव में रहे. डोनाल्ड ट्रंप को पूरी दुनिया के लिए खतरा बताया जाता रहा. तमाम नकारात्मक प्रचार के बावजूद ट्रंप 289 वोटों से जीत गए, हिलेरी को अनुमान से बहुत कम 218 मत ही प्राप्त हुए. यह आश्चर्य व अफसोस की बात है.

50 में से 46 राज्यों से ही ट्रंप की जीत पक्की हो गई थी. पिछले 18 महीनों में ऐसा कुछ नहीं बचा जो अमेरिका और बाकी दुनिया ने नहीं देखा. धर्म, नस्ल आधार पर  नफरत फैलाने, विरोधियों के दीवारों पर पोस्टर लगाने, चुनावी सभाओं में समर्थकों का एकदूसरे पर हमला, मतदाताओं को भयभीत करने, लालच देने, निजी बातें उघाड़ने जैसी तमाम हरकतें जाहिर कर रही थीं मानो सभ्य अमेरिकी समाज में नहीं, बिहार, उत्तर प्रदेश में चुनाव हो रहे हैं.

उम्मीद थी कि अमेरिका की जनता आखिर उस उम्मीदवार को नहीं चुनेगी, जो जाहिर तौर पर इस सर्वोच्च पद के लिए पात्र नहीं है और जो लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विपरीत विचार रखता हो. हालांकि अमेरिका अभी नस्ली पूर्वाग्रह और लैंगिक भेदभाव से उबरा तो नहीं था पर अत्यधिक खुला और सहिष्णु दिखने लगा था.

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