मधेशी आंदोलन को नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ जितना दबाने की कोशिश कर रहे हैं, उतनी ही तेजी से उस की आग धधकती जा रही है. 6 मार्च, 2017 को सरकार ने राजविराज में प्रदर्शनकारी मधेशियों पर पुलिस फायरिंग करा कर इस आंदोलन को फिर से हवा दे दी है. इस पुलिस फायरिंग में 7 मधेशी कार्यकर्ताओं की मौत हो गई. उस के बाद भड़के मधेशियों ने नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी (एमाले) के दफ्तर, भूमि सुधार कार्यालय और नेकपा (एमाले) के सांसद सुमन प्याकुरेल के घर में आग लगा दी.

मधेशी मोरचा के कार्यकर्ताओं ने सप्तसरी जिले के राजविराज, रूपनी, कल्याणपुर, भरदह वगैरह इलाकों के चौकचौराहों पर टायरों में आग लगा कर बवाल मचाया.

दरअसल, 6 मार्च, 2017 को नेपाल के प्रधानमंत्री रह चुके केपी शर्मा ओली की अगुआई में नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी (एमाले) की आम सभा थी. उस के बाद मेची से महाकाली तक रथयात्रा निकाली जानी थी.

मधेशी मोरचा रथयात्रा का विरोध कर रहा था. सप्तसरी जिले के राजविराज इलाके में जिस जगह पर आम सभा हो रही थी, उस जगह को मधेशियों ने चारों ओर से घेर लिया. नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी और मधेशी मोरचा के कार्यकर्ता आपस में उलझ गए और तीखी झड़प हो गई. पुलिस ने फायरिंग की, जिस से अफरातफरी पैदा हो गई.

नेपाल के 28 शहरों में मधेशी आंदोलन का पूरा असर दिखने लगा. तमाम स्कूलकालेज, बाजार और कारखाने बंद हो गए. मधेशियों के गुस्से को देखते हुए नेपाल सरकार ने सप्तसरी के कलक्टर उद्धव प्रसाद, एसपी दिवेश लोहानी, सशस्त्र पुलिस बल के एसपी जय बहादुर खड़का और डीएसपी दान बहादुर को आननफानन सस्पैंड कर दिया. इस के बाद भी मधेशियों का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ.

नेपाल में संविधान संशोधन विधेयक पेश होने और 5वां अलग प्रांत बनाने के फैसले के खिलाफ मधेशियों ने 9 मार्च, 2017 को प्रदर्शन किया. नया प्रांत बनाए जाने के विरोध में मधेशियों ने बुटबल, रूपनदेही, भैरावाहा, पाल्पा, कपिलवस्तु, गुल्मी, अधरखांची समेत कई इलाकों में प्रदर्शन किए.

मधेशी मांग कर रहे हैं कि प्रांतों की सीमा फिर से तय की जाए और उन्हें नेपाल की नागरिकता दी जाए. पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ ने पिछले साल अगस्त महीने में प्रधानमंत्री बनने के बाद मधेशियों को उन का हक देने का भरोसा दिया था, उस के बाद मधेशियों ने आंदोलन खत्म किया था. लेकिन अब मधेशियों पर गोलियां बरसा कर ‘प्रचंड’ सरकार ने आंदोलन को फिर गरमा दिया है.

गौरतलब है कि नेपाल में राज्यों के बंटवारे के बाद से ही मधेशी बनाम पहाड़ी का झगड़ा चल रहा है. ओली सरकार के हटने के बाद ‘प्रचंड’ के सत्ता की बागडोर संभालने के बाद हालात धीरेधीरे सामान्य होने लगे थे. इसी बीच ‘प्रचंड’ ने स्थानीय निकायों के चुनाव  का ऐलान कर मधेशियों के गुस्से को भड़का दिया.

मधेशियों की नाराजगी यह है कि उन की मांगों का निबटारा किए बगैर चुनाव कराना जायज नहीं है. मधेशी इसे भेदभाव को बढ़ावा देने वाले संविधान को वैधता दिलाने की साजिश करार दे रहे हैं.

पिछले साल भारत यात्रा के दौरान पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ ने यह भरोसा दिया था कि संविधान संशोधन की प्रक्रिया में मधेशियों की मांगों का पूरा खयाल रखा जाएगा और उन से बातचीत के बाद ही संविधान में संशोधन को अंतिम रूप दिया जाएगा. इस के बाद भी मधेशियों की मांगों पर कोई विचार नहीं किया गया.

नेपाल सरकार ने 3 साल पहले अपने संविधान में नए सिरे से सुधार और बदलाव का काम शुरू किया था. उस के तहत नए भौगोलिक सीमांकन भी किए गए. नेपाल की कुल आबादी में 52 फीसदी मधेशी हैं, जो भारतीय मूल के हैं. बड़ी ही चालाकी के साथ नया सीमांकन इस तरह किया गया कि मतदान में मधेशियों की आबादी कोई खास असर नहीं दिखा सके.

नेपाल के कुल 7 राज्यों में से केवल एक राज्य में मधेशियों को बहुसंख्यक दिखाया गया है. मधेशियों का आरोप है कि उन्हें राजनीतिक तौर पर अलग करने और उन्हें उन के हक से वंचित करने की साजिश के तहत नया सीमांकन किया गया है. ऐसा कर के नेपाल ने देश की एक बड़ी आबादी के साथ नाइंसाफी की है और भारत को भी नाराज करने का काम कर डाला है.

मधेशी मोरचा ने 8 मार्च, 2017 को सरकार से समर्थन वापस लेने का ऐलान कर दिया. यूनाइटेड डैमोक्रेटिक मधेशी फ्रंट ने 6 मार्च, 2017 को बालुवाटर में प्रधानमंत्री के आवास पर पुष्पकमल  दहल ‘प्रचंड’ से मुलाकात कर 5 सूत्री मांगों का मैमोरैंडम सौंपा.

नवंबर, 2013 में हुए चुनाव के बाद नेपाल की 601 सदस्यीय संविधान सभा में मधेशी पार्टियों के कुल 39 सदस्य हैं और वे ‘प्रचंड’ सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे हैं. इन में मधेशी पीपुल्स राइट्स फोरम के 14, तराई मधेशी डैमोक्रेटिक पार्टी के 11, मधेशी जन अधिकार फोरम के 10, राष्ट्रीय मधेश समाजवादी पार्टी के 3 और मधेशी नागरिक फोरम का एक सदस्य था.

साल 2008 के संविधान सभा के चुनाव में मधेशी पार्टियों के सदस्यों की तादाद 83 थी. नेपाल के झापा, मोरंग, सप्तरी, सुनसरी, सिरहा, परसा, बारा, धनुषा, महोतरी, सरलाही, रूटहाट, नवलपरासी, रूपादेही, कपिलवस्तु, चितवन बांके, बदरिया, कंचनपुर, खेलाली जिलों में मधेशियों की भरमार है.

नेपाल के कुल 75 जिलों में से 22 जिलों में मधेशियों की आबादी ज्यादा है. नेपाल के बीरगंज में पिछले 32 सालों से रह रहे मधेशी केशव यादव कहते हैं कि नेपाल सरकार हमेशा मधेशियों को बाहरी मानती रही है.

गौरतलब है कि पिछले तकरीबन 50 सालों से मधेशी ‘एक मधेश एक प्रदेश’ की मांग करते रहे हैं. मधेशियों की आबादी 52 फीसदी है, लेकिन वे नेपाल के कुल क्षेत्रफल में से 17 फीसदी इलाके में ही रहते हैं और उन के बूते ही नेपाल सरकार

को मिलने वाले कुल राजस्व का 80 फीसदी हिस्सा आता है.

नेपाल की कुल आबादी 2 करोड़, 95 लाख है, जिस में से डेढ़ करोड़ मधेशी हैं. नेपाल में कुल 103 जातियां हैं, जिस में 56 जातियां मधेशियों की हैं. इन में यादव, ब्राह्मण, कुर्मी, राजपूत, कुशवाह, वैश्य, कायस्थ, मल्लाह, हलवाई, केवट, लोहार, माली, कुम्हार, तेली, धोबी, हरिजन, पासवान और मुसहर जातियां खास हैं.

इन जातियों में सब से ज्यादा 4 फीसदी यादव हैं. उस के बाद 1.3 फीसदी हरिजन, 1.35 फीसदी तेली, 1.2 फीसदी कुशवाह और एक फीसदी कुर्मी जाति के लोग हैं.

नेपाल के नए संविधान में देश के कुल 75 जिलों में से केवल 7 जिलों को ही एक मधेश प्रदेश बनाने और 7 राज्यों को नए सिरे से बनाने के लिए राजनीतिक समिति बनाने की बात कही गई है. इसी को ले कर मधेशी पार्टियां बिदकी हुई हैं.

मधेशी नेता उपेंद्र यादव कहते हैं कि नेपाल सरकार की मंशा मधेशियों को राजनीतिक हाशिए पर रखने की है, इसी वजह से मधेशियों को उन के हक देने में अड़ंगे लगाती रही है. नेपाल की संसद ने 3 अगस्त, 2016 को माओवादी सुप्रीमो पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ को दूसरी बार नेपाल का प्रधानमंत्री चुन लिया था.

तराई मधेशी राष्ट्रीय अभियान के संयोजक जयप्रकाश प्रसाद गुप्ता बताते हैं कि नेपाल में संविधान सभा का कोई मतलब ही नहीं रह गया है.

नेपाल के नए संविधान में मधेशियों को उन का हक देने के बजाय हाशिए पर डालने की कोशिश की गई है. इस से नेपाल का एक बार फिर से हिंसा की आग में झुलसना तय है.