अंतरराष्ट्रीय

नेपाल में भरोसे का संकट

नेपाल में सरकार द्वारा 29 नवंबर को संसद में पेश किए गए संविधान संशोधन विधेयक ने देश के गहरे राजनीतिक मतभेद को फिर उजागर कर दिया है. जब यह विधेयक संसद में पेश भी नहीं हुआ था, तभी मुख्य विपक्षी पार्टी सीपीएन-यूएमएल ने इस संशोधन का खुलकर विरोध किया था, अब उसने संसद की कार्यवाही में रुकावटें डालनी शुरू कर दी हैं. लेकिन वास्तव में अन्य राजनीतिक ताकतों के विरोध ने इस संशोधन विधेयक के भविष्य और प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल की उस कोशिश पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है, जिसके तहत वह संविधान की व्यापक स्वीकार्यता सुनिश्चित करना चाहते हैं.

यहां तक कि मधेसी पार्टियों ने भी, जिसके दबाव में यह विधेयक पेश किया गया, इसकी जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया है. लेकिन चिंता का एक बड़ा कारण वे विरोध प्रदर्शन हैं, जो इस विधेयक के पेश होने के बाद से शुरू हो गए हैं.

पिछले शुक्रवार को बुटवाल में हजारों लोग राज्य संख्या- पांच के बंटवारे के खिलाफ सड़कों पर उतर आए. देश के दूसरे इलाकों में भी विरोध-प्रदर्शन जारी हैं. आखिर क्यों जिस कदम को राजनीतिक समाधान बताया जा रहा था, वह विपरीत असर डालने वाला बन गया? क्या दाहाल ने सत्ता में आने की हड़बड़ी में संघीय ढांचे से जुड़ी योजना की गंभीरता को कम करके आंका? प्रधानमंत्री चुने जाने के कुछ ही दिनों पहले हमसे बातचीत करते हुए उन्होंने दावा किया था कि उनके पास ‘जादुई फॉर्मूला’ है.

क्या उनके पास वाकई ऐसा कोई फॉर्मूला है, इस संकट को दूर करने के लिए? तीन अगस्त को प्रदर्शनकारी पार्टियों के साथ हुए समझौते ने उनके प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ किया था. तब उस समझौते में दाहाल से अपेक्षा की गई थी कि वह जल्द संविधान संशोधन विधेयक पेश करेंगे. पर उन्होंने इसे प्रस्तुत करने में महीनों का वक्त लगा दिया. मधेसी पार्टियों को अब यह देर से व अधूरा सुधार लग रहा है. दाहाल को तमाम विवादों को पूरी तरह सुलझाए बिना अब चुनाव कराने से बचना चाहिए. मधेसी पार्टियों को भी मतभेद दूर करने के लिए बड़ी पार्टियों के पास आना चाहिए.

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