सरिता विशेष

गृहयुद्ध से जूझ रहे सीरिया पर एक बार फिर दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं. राष्ट्रपति बशर अल असद के नेतृत्व में सीरियाई सेना द्वारा 21 अगस्त को विद्रोहियों के खिलाफ दमिश्क में कथित रासायनिक हमले की वजह से स्थिति और विकट बन गई है. अमेरिका और फ्रांस जैसे पश्चिमी देश जहां सैन्य हस्तक्षेप से सीरियाई संकट का हल ढूंढ़ रहे हैं वहीं सीरिया की जनता को शांति की तलाश है. सड़कों पर जगहजगह सेना और विद्रोहियों में होती झड़पें, बिगड़ती आधारभूत व्यवस्थाओं ने सीरिया के संकट को और गंभीर तथा वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है.
सब से बड़ा सवाल यह है कि इस संकट का हल कैसे निकलेगा, क्या संयुक्त राष्ट्र हस्तक्षेप करेगा या फिर अमेरिका के नेतृत्व में सैन्य कार्यवाही? दरअसल, यहां के नागरिकों के लिए अब सत्ता से ज्यादा शांति महत्त्वपूर्ण है. बहरहाल, युद्ध भले ही इंसानी जानों की कीमत पर लड़े जाते हों लेकिन मुल्क की तरक्की उस की आवाम की खुशहाली से ही होती है और सरकारी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, तानाशाही व प्रभावी संविधान की अनुपस्थिति से त्रस्त सीरियाई लोगों की खुशहाली शायद शांति में हो.