अमेरिका, फ्रांस जैसे देशों में ऐसे कानूनी प्रावधान हैं कि कोई नेता कितने वर्षों तक या कितनी बार सत्ता संभाल सकता है. ब्रिटेन जैसे कुछ मुल्कों में भी यह सीमा अधिकतम दस वर्षों की है. ऐसे में, जर्मनी की चांसलर एंजला मर्केल का चौथी बार पद संभालने की इच्छा जताना इस नजरिये के खिलाफ माना जाएगा.

अगर वह 2017 का चुनाव जीतती हैं और अपना कार्यकाल पूरा करती हैं, तो उनके खाते में 16 वर्षों तक जर्मनी की चांसलर बने रहने की उपलब्धि होगी. इस तरह, वह बिस्मार्क के बाद सबसे ज्यादा दिनों तक पद संभालने वाली नेत्री बन जाएंगी. हालांकि हेल्मुट कोल भी उनके समकक्ष होंगे, जिन्होंने 1982-98 तक जर्मनी का नेतृत्व किया था.

एक मायने में यह समझ में आता है कि मर्केल को क्यों फिर से मैदान में उतरना चाहिए. वह न सिर्फ लोकप्रिय हैं, बल्कि उनके सामने कोई कद्दावर विपक्षी नेता भी नहीं है. वक्त भी उनके अनुकूल है, क्योंकि प्रवासन, ट्रंप का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जीतना, रूस से खतरा, ब्रेग्जिट, यूरोजोन संकट जैसे तमाम मसलों की वजह से फिलहाल जर्मनी की स्थिरता पर, जोकि उसका खजाना है, अनिश्चितता के बादल छाए हुए हैं. इससे ऐतराज नहीं है कि मर्केल कितनी जहीन नेता हैं, मगर आज के दौर में यह संभव नहीं है कि वह तमाम उलझनें सुलझा लेंगी.

मौजूदा दशक के अंत में जिस जर्मनी का वह नेतृत्व कर रही होंगी, वह 2005 के उस दौर से काफी अलग होगा, जब विश्व युद्ध के बाद यूरोप की स्थिरता और विकास की चमक बरकरार थी. अगर यूरोपीय देशों की समृद्धि वापस लानी है, तो उन्हें अपनी बुनियादी मूल्यों को फिर से अपनाना होगा. यानी, यूरोपीय देशों के बीच आपसी सहयोग बनाना होगा, ताकि वे सुरक्षा का अनुभव कर सकें. जाहिर है कि यह काम अकेले जर्मनी से संभव नहीं है. इसी तरह, बढ़ती राष्ट्रवादी लहर के बीच जर्मनी और यूरोपीय संघ को जोड़े रखना भी मर्केल के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होगी. हालांकि इसका यह अर्थ नहीं कि उनके लिए सब कुछ बुरा ही होगा. यदि वह तमाम मसलों पर व्यावहारिक नजरिया परोसती हैं, तो उनके लिए रास्ते आसान हो सकते हैं.

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