सरिता विशेष
 
देशभर में कुकुरमुत्तों सरीखे उग रहे कोचिंग सैंटर भले ही आज शिक्षा व्यवस्था की खामियों का नतीजा हों लेकिन इन के चयन में बच्चे अकसर धोखा खा जाते हैं. ट्यूशन के तौर पर शुरू हो कर कोचिंग में तबदील हुए कोचिंग सैंटर को ले कर अभिभावक व बच्चे कैसे लें सही निर्णय, यह जानने के लिए पढि़ए यह लेख. 
 
बच्चों की पढ़ाई में कोचिंग सैंटरों का योगदान भी होता है. ज्यादातर बच्चे अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए कोचिंग सैंटर जाने लगे हैं. कोचिंग शिक्षा एक कारोबार की तरह हो गई है. बच्चों को अपने यहां लाने की होड़ में कोचिंग सैंटरों का बड़े पैमाने पर प्रचारप्रसार किया जाता है. प्रचार में ऐसा दिखाया जाता है जैसे कोचिंग सैंटर में पढ़ते ही बच्चा टौपर हो जाएगा. अब तो कक्षा 9 या 10 से ही कोचिंग का सिलसिला शुरू हो जाता है. 
सरकार ने कोचिंग पर पाबंदी लगाने के कुछ प्रयास किए पर कोचिंग संस्थान शिक्षा का एक अलग माध्यम बन कर उभरे हैं. देखा जाए तो जो पढ़ाई शुरुआत में ट्यूशन से शुरू होती है वह बड़ी कक्षाओं तक आतेआते कोचिंग में बदल जाती है. अभिभावक और बच्चों के लिए सब से जरूरी यह होता है कि वे सही कोचिंग का चुनाव करें. 
स्टडी मैटेरियल बेहतर हो
गांव, कसबे और शहर हर जगह हर तरह के कोचिंग सैंटर खुल गए हैं. जिस कैरियर में बच्चे ज्यादा जाना चाहते हैं उस की कोचिंग कक्षाएं खूब चल रही हैं. कई कोचिंग संस्थान अपना खुद का स्टडी मैटेरियल बनाते हैं. यह मैटेरियल प्रतियोगी परीक्षाओं में आने वाले प्रश्नों को ले कर तैयार किया जाता है. कोचिंग संस्थानों में बच्चों को प्रतियोगी परीक्षा में आने वाले सिलेबस के आधार पर शिक्षा दी जाती है. इस के लिए सही तरह से प्रैक्टिस भी कराई जाती है. कोचिंग की सफलता वहां पढ़ाने वाले टीचरों के ज्ञान पर निर्भर करती है. इसलिए कोचिंग का चुनाव करते वक्त सब से पहले यह देखें कि वहां पढ़ाने वाले टीचर कैसे हैं. कई बार कोचिंग पढ़ाने वालों में बडे़ नामों का प्रचारप्रसार किया जाता है पर जबकि वे 1-2 क्लास ही कभीकभार लेते हैं. 
रिजल्ट नहीं, गुणवत्ता देखें
कोचिंग संस्थान का प्रचारप्रसार करने में कई बार रिजल्ट को बढ़ाचढ़ा कर दिखाया जाता है. जिन बच्चों को टौपर लिस्ट में शामिल किया जाता है सही माने में वे वहां होते ही नहीं हैं. ऐसे में जरूरी है कि कोचिंग संस्थान के रिजल्ट और टौपर की लिस्ट को पैमाना न मानें. यह देखें कि वहां की पढ़ाई की गुणवत्ता क्या है. कोचिंग में पढ़ने वाले बच्चे अलगअलग तरह के होते हैं, कई बच्चे किसी बात को आसानी से समझ लेते हैं तो कई बच्चे उसे देर से समझते हैं. 
जो कोचिंग संस्थान ऐसे बच्चों को आगे लाने के लिए अपनी पढ़ाई के सिस्टम को बनाता है वह ठीक होता है. सही सिलेबस और स्टडी मैटेरियल के साथ ढंग से पढ़ाई करने से बच्चे को मनचाही सफलता मिल सकती है. 
प्रवेश से पहले पढ़ कर देखें
कोचिंग संस्थान में प्रवेश लेने से पहले छात्र को एक सप्ताह तक वहां पढ़ कर देखना चाहिए. इस के लिए कोचिंग चलाने वाले से बात कर लेनी चाहिए. आमतौर पर कोचिंग संचालक इस के लिए मना नहीं करते हैं. 
इस दौरान छात्र को यह समझ आ जाएगा कि वहां पढ़ाई कैसी हो रही है, वहां का माहौल कैसा है. छात्र ही नहीं, उस के अभिभावकों को भी कोचिंग के संचालक के संपर्क में रहना चाहिए. इस से छात्र के पढ़ने की जानकारी मिलती रहती है. इस से बच्चे के साथसाथ टीचर पर भी एक तरह का मनोवैज्ञानिक दबाव रहता है. 
पढ़ चुके बच्चों से करें बातचीत
कोचिंग के बारे में सब से अच्छी जानकारी वहां के पढ़ने वाले बच्चे दे सकते हैं. ऐसे में उचित यह रहेगा कि कोचिंग का चुनाव करने से पहले वहां पढ़ चुके बच्चों से जानकारी लें. हो सके तो यह देखें कि वहां का स्टडी मैटेरियल कैसा है. वे बच्चों को कैसे प्रैक्टिस कराते हैं. कई बार ज्यादा कमाई के चक्कर में कोचिंग संस्थान वाले एक ही क्लास में बहुत सारे बच्चों का ऐडमिशन ले लेते हैं. 
ऐसे में वे सभी बच्चों पर बराबर ध्यान नहीं दे पाते. आजकल कोचिंग कक्षा में बच्चों को आकर्षित करने के लिए पढ़ाई के आधुनिक साधनों का दिखावा भी किया जाता है. इस में क्लासरूम में एसी लगा होता है. स्पीकर और प्रोजैक्टर से पढ़ाई कराई जाती है. इस को स्मार्ट क्लास का नाम दिया जाता है. ये बातें बहुत महत्त्व नहीं देती हैं. 
अनुशासन से बेहतर माहौल
कोचिंग में हर तरह के बच्चे पढ़ने आते हैं. वे सभी किशोर उम्र के होते हैं. कई बार वे उम्र के नाजुक दौर में प्यार, मोहब्बत, दोस्ती और दुश्मनी जैसे रिश्तों में बंध जाते हैं. किशोर उम्र में ऐसी परेशानियों का प्रभाव सीधा पढ़ाई पर पड़ता है. ऐसे में जरूरी होता है कि कोचिंग कक्षा में अनुशासन पर सही तरह से ध्यान दिया जाता हो. जिस कोचिंग संस्थान में अनुशासन होगा वहां पर बच्चे पढ़ाई के दौरान ऐसी हरकतें नहीं कर पाते. कोचिंग संस्थानों की फीस भी उन के चुनाव में एक बड़ा पैमाना होती है. यह सोचना सही नहीं होता कि जो संस्थान ज्यादा फीस लेगा वह बेहतर पढ़ाई कराएगा. 
सैल्फ प्रैक्टिस दिलाए सफलता
सामान्यतौर पर बच्चा किसी विषय में ही कमजोर होता है. कोचिंग संस्थानों में कई विषय पढ़ाने का पैसा लिया जाता है. ऐसे में यह भी हो सकता है कि जिस विषय में बच्चा कमजोर हो उस विषय की ही कोचिंग उसे कराई जाए. इस में कम पैसे में बच्चे को मदद मिल सकेगी. 
कोचिंग की पढ़ाई का बच्चे को लाभ तभी मिलेगा जब वह कोचिंग में पढ़ाए गए विषयों की पूरी प्रैक्टिस घर में मेहनत से करे. बच्चे को खुद भी अपने लिए बिना हल किए पेपर की मदद से प्रश्नपत्र तैयार करना चाहिए. इस के जरिए कम से कम सप्ताह में 1 बार अपना टैस्ट लेना चाहिए. टैस्ट के लिए तय समय में ही प्रश्नपत्रों को हल करना चाहिए. बाद में प्रश्नों के सही जवाब देख कर पता लगाना चाहिए कि वह कितना सफल रहा है.