सरिता विशेष

राह चलते आटो वाले ने हमें ठोंका सो ठोंका, ऊपर से कम्बख्त हमीं से तूतूमैंमैं पर भी उतारू हो गया. हम ने आव देखा न ताव और पहुंच गए थाने में रपट लिखाने. लेकिन वहां पुलिस की मेहरबानी के पीछे छिपे असली रंग की कहानी तो और भी चौंकाने वाली थी.

मैं और मेरा मित्र पवन दबे कदमों से थाने में पहुंचे. दरअसल, एक आटो वाले ने मुझे टक्कर मार कर गिरा दिया. लेकिन इत्तेफाक से मित्र और आटो वाले के बीच तूतूमैंमैं हुई. आटो वाला मित्र से खूब अकड़ा. वह अपनी गलती मानने को तैयार न था. उन दोनों की तकरार में मैं मूकदर्शक बना खड़ा रहा. आखिर मित्र ने थाने में जाने की धमकी दे कर उस के आटो का नंबर नोट कर लिया.

गुस्से में मित्र और मैं थाने आ गए. थाने के सिपाही ने, जो थानेदार से कम नहीं दिख रहा था, हम दोनों को पहले तो घूरा फिर अकड़ते हुए बोला, ‘‘कहिए.’’

‘‘रपट लिख लीजिए,’’ मित्र बोले.

‘‘किस के खिलाफ?’’ सिपाही ने वही प्रश्न किया जो हर शिकायतकर्ता के साथ करता है. दरअसल, थाने की एक अलग भाषा होती है जो युगों से चली आ रही है.

‘‘उस आटो वाले के खिलाफ, जो इन्हें गिरा कर चला गया. उस से सभ्यता से बात की तो वह बहुत अकड़ा,’’ मित्र ने मेरी तरफ इशारा करते हुए आगे कहा, ‘‘आटो वालों का गुंडाराज हो गया है. ठीक ढंग से चलाते नहीं. कहा था, अपनी गलती कबूल कर लो मगर वह उलटा हमें ही दोषी बताता रहा.’’

मित्र का धाराप्रवाह भाषण सुन सिपाही ने पहले मित्र को कुदृष्टि से देखा. फिर क्रोध से बोला, ‘‘रपट लिखाने के लिए आए हो कि भाषण सुनाने. वह आटो वाला कौन है? उस के आटो का नंबर क्या है?’’

‘‘क्षमा करें, मैं भावुकता में सब कह गया. उस आटो वाले का नंबर नोट कर लिया है,’’ कह कर मित्र ने परचा थमा दिया. फिर क्या था, पुलिस हरकत में आ गई. अब तक जो पुलिस वाला क्रोध में था वह शांत हो चुका था. आटो नंबर उसे क्या मिल गया, जैसे कोई गुप्त खजाना मिल गया हो. खुशी से बोला, ‘‘अब समझो वह आटो वाला बच कर नहीं जाएगा. किधर गया है वह?’’

‘‘चौपाटी की तरफ गया है, सर,’’ मित्र ने जवाब दिया. तब पास खड़े पुलिस वाले से उस ने कहा, ‘‘राम सिंह, यह आटो नंबर नोट करो. अभी पकड़ कर लाओ,’’ फिर मेरी ओर मुखातिब हो कर कहा, ‘‘आप लिखित में शिकायत दीजिए उस के खिलाफ.’’

उस पुलिस वाले ने आटो नंबर नोट किया. उसे भी फुरती आ गई. मोटरसाइकिल पर बैठ कर वह हवा हो चुका था. फिर उस पुलिस वाले ने खुद कागज निकाल कर मुझे दे दिया. मैं शिकायती मजमून लिखने लगा. मित्र ने लिखवाने में पूरापूरा सहयोग दिया. पुलिस वाला फिर हरकत में आया. मुझ से बोला, ‘‘कहां नौकरी करते हो?’’

‘‘शिक्षा विभाग में.’’

‘‘मास्टर हो?’’

‘‘हां, सर,’’ मैं ने गरदन हिला कर जवाब दिया.

‘‘गुरुजी,’’ उस पुलिस वाले ने जब मुझे ‘गुरुजी’ से संबोधित किया तब मुझे लगा उस में शराफत प्रवेश कर गई. वह आगे बोला, ‘‘कहां लगी, गुरुजी?’’

‘‘लगी तो कहीं नहीं,’’ मैं ने जब यह उत्तर दिया तब वह फिर भड़क उठा और बोला, ‘‘तब रपट लिखाने क्यों आ गए?’’

‘‘वह इसलिए आए, सर,’’ मित्र ने जवाब दिया, ‘‘ऐसे उजड्ड और बदतमीज आटो वाले को नसीहत मिले.’’

‘‘अरे गुरुजी, आप चाहें तो उस का पक्का तावीज बना दूं,’’ पुलिस वाला पिघलते हुए बोला.

‘‘वह कैसे?’’ मित्र ने पूछा.

‘‘गुरुजी को अस्पताल ले जा कर चैकअप करा दूंगा. हाथ की हड्डी टूटी बता कर और उस पर पट्टा चढ़वा दूंगा. फिर वह आटो वाला उम्रभर जेल की चक्की पीसेगा.’’

यह कह कर पुलिस वाले ने पूर्णरूप से मुझ पर सहानुभूति दिखा दी. मगर मैं जानता हूं इस सहानुभूति में भी पुलिस वाले की कमाई छिपी है. किस को किस धारा में पकड़ना है, पुलिस वाले को वह धारा मौखिक याद है. निरपराधी पर भी धारा लगा देना, यह कोई पुलिस वाले से सीखे. मैं बोला, ‘‘नहीं सर, मुझे तो उस आटो वाले को सबक सिखाना है.’’

‘‘अरे, ये उजड्ड लोग कभी सबक नहीं सीखेंगे, गुरुजी. इन लोगों को मैं अच्छी तरह से जानता हूं. रातदिन इन के बीच में रहते हैं हम लोग,’’ पुलिस वाला एक बार फिर अपना अधिकार जताते हुए बोला.

तब मित्र ने इनकार करते हुए कहा, ‘‘नहीं, सर. हमें तो उसे सबक सिखाना है. शहर के आटो वाले कम से कम अपनी भाषा में सुधार तो करें.’’

‘‘देखिए, ये आटो वाले, ये टैंपो वाले कभी सुधर नहीं सकते,’’ पुलिस वाला बोला. अब तक मैं अपनी शिकायत लिख चुका था.

हस्ताक्षर कर पुलिस से पावती की डुप्लीकेट कौपी प्राप्त कर ली थी. शिकायती पत्र पा कर पुलिस वाला खुश हो गया. जैसे कोई हथियार मिल गया हो. यह पत्र पुलिस वालों के लिए हथियार से कम नहीं था. फाइल में लगाते हुए बोला, ‘‘गुरुजी, उस बच्चू की खैर नहीं. अभी पकड़ कर लाता है राम सिंह. यदि अभी पकड़ कर नहीं लाया तो बाद में पकड़ा जाएगा. आखिर पुलिस से बच कर कहां जाएगा?’’

हम दोनों हाथ जोड़ कर खड़े हो गए. तभी राम सिंह आ कर बोला, ‘‘चौपाटी पर तो वह आटो वाला नहीं मिला, मगर बच कर नहीं जाएगा.’’

‘‘अरे गुरुजी, आप निश्ंिचत रहें. हम उसे पकड़ लेंगे. उस का आटो जब्त कर लेंगे. फिर वह आप के पास आ कर आप के पांव पड़ेगा,’’ पुलिस वाले ने हमें आश्वस्त करने की कोशिश की. मगर मैं और मेरा मित्र जानते हैं कि पुलिस वालों को बहुत बड़ा हथियार मिल गया है. वे आटो जब्त करेंगे. मैं और मेरा मित्र अंतिम बार हाथ जोड़ कर थाने से बाहर हो गए.

सड़क पर आ कर मित्र बोला, ‘‘अब, आटो वाले की खैर नहीं. जब भी पकड़ा जाएगा, बिना लेदे के छूटेगा नहीं.’’

‘‘सो तो है. मेरा शिकायती पत्र उन के लिए बहुत बड़ा हथियार है. अब वे उस का इस्तेमाल करेंगे,’’ मैं ने अपनी सहमति जताते हुए कहा. फिर रोजनामचे पर कहां एफआईआर दर्ज हुई.

‘‘अरे, ये पुलिस वालों के कमाने के तरीके हैं,’’ मित्र ने कहा, ‘‘मगर आटो वाले का आटो जरूर जब्त करेगी पुलिस. 8-10 दिन आटो को थाने में रखा जाएगा. फिर लेदे के छोड़ दिया जाएगा. अपने लिए यही काफी है…’’

‘‘जब उस का नुकसान होगा तब उसे सबक मिलेगा,’’ मैं ने बीच में ही बात काटते हुए अपनी सहमति दी.

हम सड़क पर चुपचाप चलते रहे. मुझे संतोष यह था कि पुलिस ने दरखास्त ले ली. अब इस से पुलिस उस आटो वाले को ब्लैकमेल करेगी.

5 दिन बाद आटो वाला हमें मिल गया, जब मैं और मेरा मित्र घूमने जा रहे थे. वह आटो को रोकते हुए बोला, ‘‘बाबूजी, आप ने मेरा नुकसान करवा दिया.’’

‘‘नुकसान और मैं ने?’’ मैं ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘आप मेरे आटो से गिर गए. आप को कुछ भी चोट नहीं लगी, फिर भी पुलिस में रपट लिखा दी.’’

अब मेरी समझ में आया. यह वही आटो वाला है जिस नके मुझे गिराया मित्र हरकत में आया और बोला, ‘‘कितनी अकड़ कर बात की थी. गिराने के बाद भी क्षमा मांगने के बजाय हमारी सारी गलती बता रहे थे उस दिन. यदि हम से क्षमा मांग लेते तो हम क्यों रिपोर्ट लिखाते.’’

‘‘हां, बाबूजी, बाद में मैं बहुत पछताया,’’ अफसोस प्रकट करते हुए आटो वाला बोला, ‘‘4 दिन तक पुलिस वाले ने आटो जब्त कर थाने में रखा.’’

‘‘फिर छोड़ा कितने में?’’ मित्र ने पूछा.

‘‘मांग तो वे 10 हजार रुपए रहे थे मगर 5 हजार रुपए दे कर तोड़ कर लिया. तब कहीं जा कर आटो दिया,’’ आटो वाले ने यह कह कर अपनी सारी व्यथा उगल दी और आगे बढ़ गया.