मेरे एक परिचित युवा साहित्यिक हैं. मैं उन्हें सिर्फ परिचित मानता हूं, युवा और साहित्यिक वे अपनेआप को मानते हैं. एक दिन वे मेरे घर पधारे. कहने लगे कि टीवी पर आएदिन अलगअलग विधाओं के रिऐलिटी शो चलते रहते हैं, वैसा ही एक रिऐलिटी शो साहित्य के क्षेत्र का भी होना चाहिए. उन का यह विचार अच्छा था पर कच्चा था. और मैं तो इस क्षेत्र में बिलकुल बच्चा था.

मैं चाह रहा था कि वे किसी तरह विदा हो जाएं, पर वे तो जमने के मूड से आए थे. घर में दाखिल हो कर सोफे पर पसरते हुए बड़े ही अधिकार से टीवी रिमोट ले कर चैनल बदलने लगे. आखिर एक रिऐलिटी शो दिखाने वाला चैनल उन्हें दिखाई दे गया. वे फिर से शुरू हो गए कि हमें किसी चैनल वाले से बातचीत कर के साहित्य के क्षेत्र में भी एक रिऐलिटी शो प्रायोजित करवाने के बारे में सोचना चाहिए.

अब उन्हें टालना असभ्यता के दायरे में आ सकता था, इसलिए बात को आगे बढ़ाते हुए मैं ने कहा, ‘‘आखिर कैसा होगा यह रिऐलिटी शो, क्या विचार पक रहा है आप के दिमाग के प्रैशरकुकर में.’’

मेरे इतना कहते ही वे कुकर की सीटी की तरह बजे. कहने लगे, ‘‘हम रिऐलिटी शो का नाम रख सकते हैं- क ख ग. देश के तमाम छोटेबड़े शहरों में हम साहित्यिकों का औडिशन (लेखन) टैस्ट लेंगे. इस में निर्णायक के तौर पर देश के मशहूर साहित्यिकों, जो हालफिलहाल फुरसत में हैं, को मौका देंगे.

‘‘छोटे शहरों से चुने गए साहित्यिकों को किसी मैट्रो शहर में मेगा औडिशन के लिए आमंत्रित कर उन में से बैस्ट साहित्यिकों को शौर्टलिस्ट करेंगे. इन शौर्टलिस्टेड साहित्यिकों को 2 या 3 या 4 टीमों में बांट देंगे. फिर इन टीमों में कंपीटिशन करवा कर, हर हफ्ते एकएक साहित्यिक को एलिमिनेट करते जाएंगे. यह एलिमिनेशन दर्शकों (पाठकों) द्वारा भेजे गए एसएमएस के आधार पर होगा. अंत में जो एकमात्र साहित्यिक एलिमिनेट होने से बच जाएगा, उसे बैस्ट साहित्यिकार औफ द शो क ख ग घोषित कर शौल व श्रीफल दे देंगे.’

एक ही सांस में उन्होंने पूरे रिऐलिटी शो की दास्तां मुझे सुना डाली.

उन के इस काल्पनिक रिऐलिटी शो के कार्यक्रम की रूपरेखा के बारे में सुन कर मेरे मन में कई शंकाएं उभर आईं. उन में सब से प्रमुख थी कि आखिर साहित्यिक लोग इस रिऐलिटी शो में करेंगे क्या? मेरी इस शंका का समाधान तुरंत उन्होंने यह कह कर किया कि साहित्यिक अपनी मौलिक तथा अप्रकाशित रचनाओं का पाठ (परफौरमैंस) निर्णायकों, दर्शकों, पाठकों के सामने करेंगे.

मेरे मन में और भी कई शंकाएं उठ रही थीं, जैसे, इस प्रकार के कार्यक्रम को प्रसारित करने का जोखिम कौन सा चैनल लेगा. क्या इस शो को प्रायोजक मिलेंगे? क्या दर्शक ऐसे कार्यक्रम को देखने में रुचि लेंगे? क्या विजेता साहित्यिक सिर्फ शौल और श्रीफल में मान जाएंगे (वैसे तो उन्हें इसी की आदत होती है)? इन के अलावा और भी कई सवाल थे.

इस से पहले कि मैं अपनी इन शंकाओं का समाधान उन से पूछता, वे खिसकने की तैयारी करने लगे थे. शायद वे रिऐलिटी शो की रिऐलिटी समझ गए थे.         

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