बिहार में वर्ल्ड लैवल का अकेला मोइनुल हक स्टेडियम कबाड़खाना बन कर रह गया है. साल 1996 में भारत में हुए क्रिकेट वर्ल्ड कप का एक मैच इस स्टेडियम में खेला गया था. उस समय इस स्टेडियम को दोबारा चकाचक बनाया गया था, पर उस के बाद इस ओर झांकने की फुरसत किसी को नहीं है. पटना के राजेंद्र नगर इलाके में 30 एकड़ में बने इस स्टेडियम में 4 क्रिकेट पिच बनी हुई हैं. 2 पवेलियन और 4 ड्रैसिंग रूम हैं. इस की बाउंड्री 70 यार्ड की है. पिचों की हालत इतनी खराब है कि पता ही नहीं चलता है कि कहां पिच है और कहां आउटफील्ड है.

आउटफील्ड में उगी लंबीलंबी घास किसी खेत का भरम पैदा करती हैं. मैदान में चारों और चूहों ने अपने रहने के लिए बिल बना लिए हैं और दिनरात वहां चूहों की ‘घुड़दौड़’ होती रहती है. ड्रेनेज सिस्टम के फेल होने की वजह से मैदान झील में बदल जाता है, मानो नौका दौड़ प्रतियोगिता की तैयारी हुई हो. क्रिकेट वर्ल्ड कप के समय लगे इलैक्ट्रौनिक स्कोर बोर्ड का बस ढांचा बच गया है और पवेलियन की छत विकेट की गिल्ली की तरह उड़ गई है. कुरसियां रन आउट हो चुकी हैं. खेल महकमे के कुछ लोग बताते हैं कि खेल महकमे और राज्य खेल प्राधिकरण के अफसरों की आपसी खींचतान और लापरवाही की वजह से उन्होंने स्टेडियम का कबाड़ा कर के रख दिया है.

टैस्ट क्रिकेटर रह चुके सबा करीम कहते हैं कि पहले इस स्टेडियम में नए क्रिकेटर प्रैक्टिस कर के अपने खेल को निखारते थे, पर अब स्टेडियम की बदहाली की वजह से उन के लिए प्रैक्टिस करने की कोई और जगह नहीं है. भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी इस स्टेडियम को कभी गुलजार किया करते थे. तमाम सुविधाओं के बाद भी इस स्टेडियम की देखरेख सही तरीके से नहीं की गई, जिस का खमियाजा नए क्रिकेटर और क्रिकेट प्रेमी भुगत रहे हैं. इस स्टेडियम में कभीकभार लोकल टूर्नामैंट भी होते रहते हैं. टूर्नामैंट के आयोजकों और खिलाडि़यों को किसी भी तरह की सुविधा देने के नाम पर खेल महकमा अपने हाथ खड़े कर देता है, पर किराया वसूलने में जरा भी कोताही नहीं करता है. स्टेडियम का एक मुलाजिम बताता है कि स्कूल और कालेज के क्रिकेट टूर्नामैंट से किराए के नाम पर वसूली जाने वाली रकम से ही स्टेडियम की हालत काफी हद तक सुधारी जा सकती है, पर स्टेडियम की फिक्र किसे है?

13-14 साल पहले एक प्राइवेट फाइनैंस कंपनी ने पवेलियन को नए सिरे से बनाने के लिए माली मदद की थी और उस कंपनी के नाम पर पवेलियन का नाम भी रख दिया गया, लेकिन देखरेख का कोई ठोस इंतजाम नहीं होने से पवेलियन ‘रन आउट’ हो चुका है. क्रिकेटर राजेश राज कहते हैं कि अगर स्टेडियम को सही रखा जाए, तो इतने बड़े और इंटरनैशनल लैवल के स्टेडियम में प्रैक्टिस कर उन के जैसे कई खिलाड़ी अपने खेल को संवार और निखार सकते हैं, पर क्यूरेटर नहीं होने से पिच की मरम्मत और देखभाल नहीं हो पाती है. राज्य के खेल व युवा मामलों के मंत्री शिवचंद्र राम कहते हैं कि स्टेडियम की बदहाली की चिंता सरकार को है और उसे दुरुस्त करने की तैयारी चल रही है. जल्दी ही स्टेडियम को सभी सुविधाओं से लैस कर दिया जाएगा और उस के इंटरनैशनल रंगरूप को वापस लाया जाएगा. देखते हैं कि मंत्रीजी की इस दलील में कितना दम है.

चरागाह बना संजय गांधी स्टेडियम

पटना का दूसरा स्टेडियम है संजय गांधी स्टेडियम. यहां खिलाडि़यों के बजाय गायभैंस घूमती नजर आती हैं. यह खेल का मैदान कम जानवरों का चरागाह ज्यादा नजर आता है. साल 1980 में गर्दनीबाग इलाके में इस स्टेडियम को फुटबाल मैचों के आयोजन के लिए बनाया गया था, लेकिन सही रखरखाव नहीं होने की वजह से स्टेडियम के मैदान में बड़ेबड़े गड्ढे हो गए हैं और दर्शक स्टैंड की दीवारें ढह चुकी हैं. कभी चंद्रेश्वर प्रसाद, ललन दूबे, जयशंकर प्रसाद जैसे नैशनल लैवल के फुटबाल खिलाडि़यों के बेहतरीन खेल से रोशन हुआ यह स्टेडियम अब रात को अंधेरे में डूबा रहता है. अफसोस की बात है कि पिछले 10-12 सालों से यहां जिला लैवल का भी कोई मैच नहीं हो सका है.