सरिता विशेष

दुनिया में जब हौकी में जरमनी का दबदबा था तब भारत ने ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीता था. भारत को 3 बार स्वर्ण पदक दिलाने में हौकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की अहम भूमिका रही थी. उस दौर में सब की जबां पर ध्यानचंद का नाम था. अब एक बार फिर ध्यानचंद का नाम सब की जबां पर है. केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजुजु ने बताया कि इस वर्ष भारतरत्न के लिए हौकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद के नाम की सिफारिश की गई है.

लंबे समय से यह मांग उठ रही है कि हौकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को देश के शीर्ष नागरिक सम्मान भारतरत्न से नवाजा जाना चाहिए. इस बात को ले कर कई बार लंबी बहस भी हो चुकी है. वर्ष 2011 में सांसदों ने मेजर ध्यानचंद के नाम को खेलरत्न के लिए प्रस्तावित भी किया था लेकिन सरकार ने तब इस की मंजूरी नहीं दी थी. तब हौकी प्रेमियों को काफी निराशा भी हुई थी. फिर वर्ष 2013 में इस पर बहस हुई कि यह रत्न किसे मिले. फिर ऐसा लगने लगा कि भारतरत्न इस बार ध्यानचंद को ही मिलेगा. लेकिन यूपीए सरकार ने मास्टरब्लास्टर सचिन तेंदुलकर की क्रिकेट से विदाई के दौरान यह ऐलान कर दिया कि इस वर्ष भारतरत्न से सचिन रमेश तेंदुलकर को नवाजा जाएगा.

जब यह ऐलान हुआ था तो खेल प्रेमियों को एक तरह से खुशी भी थी और दुख यह था कि सचिन से पहले मेजर ध्यानचंद को यह रत्न मिलना चाहिए.

केंद्रीय राज्यमंत्री के बयान के बाद मेजर ध्यानचंद के बेटे अशोक ध्यानचंद ने कहा कि यह न सिर्फ मेरे परिवार के लिए बल्कि हौकी के लिए भी गर्व की बात है. हालांकि वे थोड़ा दुखी भी हैं कि जिस समय उन्हें यह पुरस्कार मिलना चाहिए था, नहीं मिला.

मेजर ध्यानचंद हौकी के ऐसे खिलाड़ी थे जिन के बारे में कहा जाता है कि बर्लिन में ओलिंपिक के दौरान उन की हौकी स्टिक यह कह कर कई बार बदली गई कि उन की स्टिक में कहीं चुंबक तो नहीं लगा हुआ है. वर्ष 1928 में एम्सटर्डम, वर्ष 1932 में लास एंजिलस, वर्ष 1936 में बर्लिन ओलिंपिक में भारत को हौकी में स्वर्ण पदक हासिल हुए थे जिन में मेजर ध्यानचंद का अतुलनीय योगदान था.

सरकार और खेल प्रशासन ने राष्ट्रीय खेल हौकी की दुर्गति पर कभी ध्यान नहीं दिया और हौकी के साथ हमेशा से भेदभाव की नीति अपनाई. आज हौकी की क्या हालत है, यह सब को पता है. राजनीतिबाजों को इस से ऊपर उठ कर कम से कम ध्यानचंद जैसे महानतम खिलाड़ी को यह सम्मान प्रदान करना ही चाहिए जिस के वे हकदार हैं.