सरिता विशेष
खिलाडि़यों की मंडी 
बेंगलुरु में इंडियन प्रीमियर लीग-7 की नीलामी हुई. हर बार की तरह इस बार भी क्रिकेट खिलाड़ी किसी उद्योगपति, किसी फिल्मी हस्ती या फिर बड़े कारोबारी के हाथों बिके. हालांकि, खिलाडि़यों की इस मंडी में आर्थिक मंदी नहीं दिखी. करोड़ों रुपयों की बोली खिलाडि़यों पर लगी. इस में रौयल चैलेंजर्स के मालिक विजय माल्या ने युवराज सिंह को 14 करोड़ रुपए में खरीद लिया. दिनेश कार्तिक को दिल्ली डेयरडेविल्स ने 12.5 करोड़ रुपए में खरीदा. इस मंडी में इस बार बड़ा उलटफेर हुआ क्योंकि बड़ेबड़े खिलाडि़यों को इस बार खरीदार नहीं मिले. एक बात यह भी रही कि इस बार अमेरिकी डौलरों के बजाय भारतीय रुपयों में बोली लगी. 
दरअसल, आईपीएल ऐसी दुधारू गाय है जिसे हर बड़ी हस्ती दुहना चाहती है. करोड़ों रुपया लगा कर अरबों कमाने की चाह बलवती हो रही है, चाहे खेल का बेड़ा गर्क ही क्यों न हो जाए.
खिलाडि़यों की इस मंडी में सवाल उठना तो लाजिमी है क्योंकि विजय माल्या जैसे उद्योगपति के पास खिलाडि़यों को खरीदने के लिए तो पैसा होता है पर जब कर्ज चुकाने व अपने कर्मचारियों को वेतन आदि देने की बात आती है तो 
वे कहते हैं कि उन के पास पैसा नहीं है. सरकार और प्रशासन इस के लिए मूकदर्शक बने रहते हैं और कुछ भी कहने से कतराते हैं.
वैसे भी खेल का बेड़ा गर्क हो ही चुका है. क्रिकेट जैसे खेल का स्वरूप की अब बिगड़ गया है. देश के लिए खेलने वाले वैसे भी अब खिलाड़ी रहे कहां, वे तो कारोबारियों के सामने कठपुतली बन कर रह गए हैं. वे जो कहते हैं वही खिलाड़ी करते हैं. करना भी उन की मजबूरी है क्योंकि अगर वे मालिक की बात नहीं मानेंगे तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा.
खिलाडि़यों के साथसाथ अब दर्शकों का भी मूड बदल गया है. अब दर्शक चाहते हैं कि फटाफट क्रिकेट में जो मजा है वह भला टैस्ट मैचों या फिर एकदिवसीय मैचों में कहां है. ऊपर से म्यूजिक और सुंदरसुंदर चीअर लीडर्स की थिरकती कमर शायद उन्हें भी भाने लगी है यानी 3 घंटे का एक मजेदार सर्कस. आईपीएल महज पैसों का खेल है.
आईपीएल टीमों के मालिकों को खेल से कोई लेनादेना नहीं है. वे तो मुनाफा कमाने के लिए पैसा लगाते हैं.आईपीएल से एक सुकून की बात यह है कि इस में नएनए खिलाडि़यों को दूसरे देशों में जा कर या फिर बड़ेबड़े खिलाडि़यों के साथ खेलने का मौका मिल जाता है.
 
खेल संघ में सियासत
देश हो या फिर विदेश, खेल संघों को राजनीति का अखाड़ा बना दिया गया है. इस की सब से ताजी मिसाल है कि एन श्रीनिवासन ने विश्व क्रिकेट एसोसिएशन की कमान संभाली और ठीक एक दिन के बाद उन के छोटे भाई एन रामचंद्रन को भारतीय ओलिंपिक संघ का अध्यक्ष बना दिया गया.
वर्ष 2012 में अंतर्राष्ट्रीय ओलिंपिक समिति ने चुनाव प्रक्रिया में ओलिंपिक चार्टर का पालन न करने के आरोप में भारत को निलंबित कर दिया था. इस से भारतीय एथलीटों की चिंता तो बढ़ी ही थी लेकिन उस से अधिक चिंता खेल संघों को राजनीति का अखाड़ा बनाने वाले नेताओं की थी. जबकि आईओसी ने कहा था कि खेल संघों के चुनावों में सरकार दखल देती है और इस वजह से दागी लोगों को आसानी से चुनाव लड़ने की इजाजत मिल जाती है, इसलिए आईओए जिस व्यक्ति को चुने वह साफ छवि के होने चाहिए. लेकिन पैसों के आगे यह कहना बेमानी है क्योंकि एन रामचंद्रन के चुने जाने के बाद आईओसी खुश है जबकि एन रामचंद्रन भी विवादों से घिरे हैं.
दरअसल, खेल संघों में अब खिलाडि़यों का वर्चस्व ही खत्म हो गया. हालांकि खेल प्रशंसकों के लिए एक सुकून की बात यह रही कि रूस के ‘सोची’ शहर में ओलिंपिक के समापन के दौरान अब फिर से भारतीय तिरंगा देखने को मिलेगा. आईओसी के बैन के बाद इस के उद्घाटन समारोह में भारतीय खिलाड़ी तिरंगा नहीं लहरा पाए थे.
 
टैस्ट में धौनी फेल
सब से सफल माने जाने वाले भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धौनी की काबिलीयत पर अब सवाल खड़े होने लगे हैं. ऐसा इसलिए हो रहा है कि महेंद्र सिंह धौनी विदेशी सरजमीं पर सब से ज्यादा हारने वाले कप्तान बन गए हैं. न्यूजीलैंड के खिलाफ पहले टैस्ट में 40 रन से हार के साथ ही धौनी विदेशों में सब से असफल कप्तान बन गए.
धौनी की कप्तानी में विदेशों में 22 टैस्ट मैच खेले गए हैं जिन में 5 जीते और 11 हारे, 6 ड्रा रहे. वर्ष 2010 में धौनी की कप्तानी में भारत ने विदेशों में पहला टैस्ट मैच श्रीलंका के खिलाफ खेला था. पिछले कुछ वर्षों में भारतीय टीम का रिकौर्ड काफी शर्मनाक रहा है. वर्ष 2011 में इंगलैंड में सभी मैच हार गए. इस के बाद आस्ट्रेलिया में 4 मैच हुए जिन में बुरी तरह हार हुई. कुल मिला कर कहें तो भारतीय खिलाड़ी विदेशी पिच पर फिसड्डी हैं. औकलैंड में हार के बाद भारत ने हार का सैकड़ा पूरा कर लिया.
हार के बाद कप्तान साहब रटीरटाई बात कहते रहे कि कभी बल्लेबाजी अच्छी नहीं रही तो कभी बल्लेबाजों का परफौर्मैंस संतोषजनक नहीं रहा तो कभी गेंदबाजी को दोष दिया तो कभी मिडिल और्डर बल्लेबाजों को कोसते रहे.
कप्तान साहब भी जानते हैं भारतीय बल्लेबाजों व गेंदबाजों की क्या परेशानी है. भारतीय खिलाड़ी उछाल व रफ्तार वाली पिचों पर फिसड्डी साबित होते हैं. हर बार सुधरने व सुधारने की बात होती है लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात.
वैसे देखा जाए तो विदेशी जमीं पर किसी भी कप्तान का अच्छा रिकौर्ड नहीं रहा है. मोहम्मद अजहरुद्दीन की कप्तानी में विदेशों में 27 मैच खेले गए जिन में 1 जीता 10 हारे, 16 ड्रा रहे. वहीं सौरव गांगुली की कप्तानी में 28 मैच खेले गए, 11 जीते, 10 हारे, 7 ड्रा रहे. एम ए खान पटौदी की कप्तानी में भारत ने विदेशों में 13 मैच खेले, 3 जीते 10 हारे और बिशन सिंह बेदी की कप्तानी में 14 मैच खेले, 
3 जीते, 8 हारे और 3 ड्रा रहे. इधर महेंद्र सिंह धौनी पर असफलता के बादल छाए तो उधर मैच फिक्ंिसग की एक रिपोर्ट में नाम आने के चलते वे अब मुश्किल में पड़ सकते हैं.