भारत ने 17वें एशियाई खेलों में कुल 57 पदक जीते. इन में 11 स्वर्ण, 10 रजत और 36 कांस्य पदक शामिल हैं. इस बार अच्छी बात यह रही कि 16 वर्ष बाद हौकी ने गोल्ड पदक जीत कर सब का मन खुश कर दिया, क्योंकि राष्ट्रीय खेल हौकी की दुर्दशा से खेल प्रेमियों का दिल इस खेल से हटता जा रहा था और अब रियो ओलिंपिक में हौकी की जगह पक्की हो गई है तो सारा देश झूम उठा.

हौकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद जब खेलते थे तो लोग हौकी के दीवाने थे लेकिन 80 के दशक के बाद हौकी का स्तर गिरता गया. जब वर्ष 1983 में भारत क्रिकेट में कपिलदेव के नेतृत्व में वर्ल्ड चैंपियन बना तो पूरा देश क्रिकेट के प्रति दीवाना होता चला गया और आज क्रिकेट का स्थान वही है जो कभी हौकी का हुआ करता था. बहरहाल, हौकी खिलाडि़यों ने जो कमाल दिखाया है उस से खेल प्रशंसकों में उम्मीद जागी है. पिछले कुछ वर्षों से क्रिकेट की टीआरपी घटी है. लोगों का मन अब क्रिकेट से ऊब रहा है. कहा जाने लगा है कि अब क्रिकेट खेल नहीं रहा, यह खेल सट्टेबाजों का, बड़ेबड़े कारोबारियों और उद्योगपतियों का जमावड़ा बन कर रह गया है.

अब तो क्रिकेट मैच के दौरान विज्ञापनों की दर भी कम हो गई है. पहले विज्ञापन बाजार का 90 फीसदी पैसा क्रिकेट पर जाता था लेकिन अब यह महज 70 फीसदी रह गया है. जाहिर है दूसरे खेलों से क्रिकेट को भारी चुनौती मिल रही है.

प्रो कबड्डी लीग में बड़ेबड़े सितारों ने कबड्डी टीमों को खरीदा और इस का खूब प्रचारप्रसार किया गया. इस का नतीजा यह रहा कि 4.35 करोड़ दर्शकों ने इस लीग को टैलीविजन पर देखा. वहीं अगर पिछले आईपीएल मैच की बात करें तो इसे देखने वाले दर्शकों की संख्या 5.52 करोड़ थी. इसे बहुत ज्यादा अंतर नहीं कहा जा सकता लेकिन इस से साफ है कि इस देश में क्रिकेट को धर्म समझने वाले लोग भी अब धीरेधीरे अन्य खेलों की तरफ रुचि लेने लगे हैं. इस से क्रिकेट के आकाओं की चिंता बढ़नी लाजिमी है.

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