वर्ष 2004 में जब एथेंस ओलिंपिक में राज्यवर्द्धन सिंह राठौर ने डबल ट्रैप शूटिंग में सिल्वर मैडल जीता तो पूरा देश गर्व से खिल उठा था. उस के बाद शूटिंग में हम आगे बढ़ते गए और वर्ष 2008 में उन्होंने देश को बीजिंग ओलिंपिक में गोल्ड मैडल दिलाया. इस मैडल से नए निशानेबाजों के लिए उन्होंने नई उम्मीद जगा दी. अभिनव ने अपनी कामयाबी स्कौटलैंड ग्लास्गो कौमनवैल्थ गेम्स में भी जारी रखी. उन्होंने एक बार फिर देश को गोल्ड मैडल दिलाया. हालांकि इस के साथ ही इस शूटर ने आगे से कौमनवैल्थ गेम्स में हिस्सा न लेने का ऐलान भी कर दिया.

कारण चाहे जो भी रहा हो लेकिन अभिनव ने महज 15 वर्ष की उम्र में ही निशानेबाजी शुरू कर दी थी. अभिनव वर्ष 1998 के कौमनवैल्थ गेम्स में और वर्ष 2000 में सिडनी ओलिंपिक में सब से कम उम्र के निशानेबाज रहे थे. वर्ष 2001 में उन्होंने अनेक अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में कुल 6 मैडल हासिल किए. वर्ष 2006 में मेलबर्न में वे पहली बार अपने खेल के वर्ल्ड चैंपियन बने और उसी वर्ष उन्होंने मेलबर्न कौमनवैल्थ गेम्स में पेयर्स में गोल्ड और व्यक्तिगत स्पर्धा में ब्रौंज मैडल जीता. वर्ष 2010 में दिल्ली में हुए कौमनवैल्थ गेम्स में उन्हें सिल्वर मैडल से संतोष करना पड़ा लेकिन ग्लास्गो में उन्होंने गोल्ड मैडल हासिल कर यह कसर पूरी कर ली. पदक हासिल करने के बाद अभिनव बिंद्रा ने कहा कि यह मेरा अंतिम राष्ट्रमंडल खेल है. 5 राष्ट्रमंडल खेल और 9 पदक मेरे लिए पर्याप्त हैं. यह पदक शानदार है क्योंकि मैं ने कड़ी मेहनत की थी और मुझे खुशी है कि मैं यह लक्ष्य हासिल करने में सफल रहा. उन्हें राजीव गांधी खेलरत्न से भी नवाजा गया है.

अभिनव के लिए वर्ष 2016 में होने वाला रियो ओलिंपिक उन का अंतिम ओलिंपिक  होगा कि नहीं, इस बारे में वे फिलहाल कुछ कहना नहीं चाहते. 31 वर्षीय अभिनव से यह उम्मीद है कि वे रियो ओलिंपिक को अपना अंतिम ओलिंपिक मानें और उस में गोल्ड मैडल जीत कर अलविदा कहें और दुनिया के तमाम युवाओं का आदर्श बनें. बहरहाल, ग्लास्गो कौमनवैल्थ गेम्स में अभिनव के अलावा श्रेयसी सिंह, जीतू राय, गुरुपाल सिंह जैसे नए निशानेबाजों ने देश के लिए मैडल जीत कर यह उम्मीद जगा दी है. राठौर और अभिनव के बाद देश के लिए ये नई उम्मीद बन कर उभरे हैं. इन निशानेबाजों से आने वाले ओलिंपिक गेम्स में पदक की उम्मीद तो की ही जा सकती है.