सरिता विशेष

सरकार शिक्षा ऋण को ले कर कड़ा फैसला करने जा रही है. इस फैसले से कई छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है. अब तक सरकार की योजना युवाओं का कैरियर बनाने के लिए उच्चशिक्षा हासिल करने में ऋण दे कर सहयोग करने की थी लेकिन इधर ऋण की वसूली में दिक्कत की आशंका जताते हुए सरकार ने पढ़ाई के लिए ऋण देने की प्रक्रिया को कड़ा करने की योजना बनाई है. इस के लिए वह पूरी तहकीकात करेगी कि जिस छात्र को ऋण दिया जा रहा है वह लौटाने की स्थिति में होगा अथवा नहीं.

बैंक हालांकि पहले भी अंधेरे में नहीं बल्कि पूरी पड़ताल के बाद ही ऋण देते थे लेकिन अब बैंकों को कहा गया है कि वे पढ़ाई के लिए 20 लाख से अधिक ऋण नहीं देंगे और इस स्तर के ऋण देने पर भी पूरी छानबीन कर के ही विचार करेंगे. इस निर्णय से कई छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है. तर्क दिया जा रहा है कि मंदी की वजह से नौकरियां घट रही हैं और वेतन पैकेज भी कम किए जा रहे हैं जिस से ऋण देने वाला बैंक फंस सकता है.

इस तरह का फैसला ले कर सरकार डराने का काम कर रही है और युवाओं के उत्साह को भंग कर रही है. सरकार का प्रयास युवा पीढ़ी को प्रोत्साहित करने का होना चाहिए लेकिन करोड़ों हजार रुपए के घोटाले करने वाली सरकार पैसा डूबने की आशंका में लाखों युवकों के सपनों पर पानी फेर रही है. जनता की गाढ़ी कमाई पर ऐश करने वाले मंत्रियों और सरकार के दामाद बने बैठे बाबुओं को अरबों रुपए के घोटालों के बीच आम आदमी के पर कतरने का साहस नहीं होना चाहिए था लेकिन इन स्वार्थी तत्त्वों को अपने सिवा किसी की परवा नहीं होती. नैतिकता की कुरसी पर बैठ कर अनैतिक निर्णय लेने में उन्हें संकोच नहीं होता है.

यह ठीक है कि सरकार का पैसा डकारने का हक किसी को नहीं है और बैंकों से लिया गया ऋण वापस होना चाहिए लेकिन आप यह कैसे तय कर सकते हैं कि उच्चशिक्षा हासिल कर अपना बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष कर रहा युवा जीवन में सफल नहीं होगा, इसलिए उस की मदद नहीं की जानी चाहिए.