पिछले साल वालमार्ट यानी दुनिया की सब से बड़ी खुदरा कंपनी को भारत में कारोबार करने की इजाजत देने जैसे मुद्दे पर संसद रिकौर्ड समय तक ठप रही. विपक्ष वालमार्ट पर सरकार की चुप्पी से परेशान हो गया लेकिन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी संप्रग सरकार का कोई नेता या घटक यह बताने को तैयार नहीं कि संसद को किन कारणों से ठप किया जा रहा है.

विपक्ष वालमार्ट को नहीं लाने की जिद पर अड़ा रहा तो संप्रग सरकार हर हाल में इस खुदरा कंपनी को भारत में काम करने की इजाजत देने के लिए कानून बनाने की बात पर अड़ी थी. इस बीच वालमार्ट से जुड़े घोटालों की कहानियां भी परत दर परत खुलती रहीं. अमेरिका में भी उस के घूसकांड की कहानियां गूंजीं लेकिन संप्रग सरकार उस के खिलाफ कुछ भी सुनने को राजी नहीं थी. इस बार फिर वालमार्ट का भूत दोबारा आ गया है.

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई ने कहा है कि वालमार्ट ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई में रिजर्व बैंक व विदेशी विनिमय मेंटिनैंस अधिनियम यानी फेमा कानून का उल्लंघन किया है. शिकायत में कहा गया है कि वालमार्ट ने 2010 के अपने भारतीय सहयोगी भारती को 593.1 करोड़ रुपए खुदरा व्यापार के जरिए भेजे हैं जबकि उस समय तक देश के खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश की इजाजत नहीं थी. सीबीआई के अनुसार, यह आरबीआई के दिशानिर्देशों व फेमा का उल्लंघन है. इस की शिकायत राज्यसभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद एम पी अच्युतन ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी की है. एक शिकायत तो पिछले वर्ष सितंबर में की गई थी लेकिन संप्रग सरकार ने इस शिकायत पर कोई ध्यान नहीं दिया.

राज्यसभा सांसद ने इस सौदे को अवैध करार दिया था लेकिन डा. सिंह ने इस दिशा में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. वालमार्ट रिश्वत दे कर अपना कारोबार बढ़ाने के लिए बदनाम है. उस पर वर्ष 2007 में किसी अन्य देश में कारोबार शुरू करने के लिए लाखों डौलर की रिश्वत देने का आरोप है और इस बारे में उस पर मुकदमा भी चल रहा है.