सरिता विशेष

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ योजना का गर्मजोशी के साथ आगाज किया है. योजना के तहत देश को आर्थिक तरक्की की नई मंजिल तक पहुंचाने का सपना दिखाया गया है. धूमधड़ाके के साथ प्रधानमंत्री ने इस मौके पर मौजूद 30 देशों की 3 हजार से अधिक कंपनियों के प्रतिनिधियों और उन के 500 प्रमुखों को भरोसा दिलाया कि उन का पैसा डूबेगा नहीं, उन्हें यह पैसा विनिर्माण क्षेत्र में लगाना है.

विनिर्माण क्षेत्र में पर्यटन, अतिथि सत्कार, रेलवे, चमड़ा, उड्डयन, बंदरगाह, दवा, कपड़ा, आटोमोबाइल आदि शामिल हैं. इन क्षेत्रों में छोटी से ले कर बड़ी से बड़ी वस्तु के निर्माण की योजना है. प्रधानमंत्री के अनुसार इन सभी क्षेत्रों का निवेश कभी नुकसान देने वाला साबित नहीं हो सकता. यह घरघर की मांग है और भारत जैसे देश में इस तरह के घरेलू उत्पाद बनाने वाली कंपनियां कभी घाटे में नहीं रह सकतीं. शायद यही विश्वास है मोदी का जो निवेशकों को यह भरोसा दिला रहा है कि उन का पैसा डूबने वाला नहीं है. मोदी ने इस काम के लिए बाकायदा एक लोगो भी जारी किया है.

इस महत्त्वाकांक्षी योजना के जरिए सरकार का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी 15 से 25 फीसदी करना है. इस के लिए 25 क्षेत्र चुने गए हैं और हर क्षेत्र को जीडीपी में इस तरह से एक फीसदी का योगदान देना है.

मोदी कहते हैं कि काम करो तो सबकुछ संभव हो जाता है. इस काम के लिए एक टीम ही बना दी गई है जो सातों दिन 24 घंटे इस महत्त्वाकांक्षी योजना को साकार करने के लिए काम करेगी. तर्क यह है कि जब जीरो बैलेंस वालों के बल पर आम आदमी का बैंक बैलेंस 1,500 करोड़ से अधिक पहुंच सकता है तो मेक इन इंडिया के बल पर वह विश्व के कारोबारी देशों में भारत को वर्तमान 134वें स्थान से 50वें स्थान पर लाने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए. ये बातें करने में तो अच्छी लगती हैं लेकिन इन्हें अमलीजामा पहनाना टेढ़ी खीर है. सरकार जितना बोल रही है वह लुभावनी स्थिति है और लोगों को भी लग रहा है कि जितना बोला जा रहा है उतना हासिल करना कठिन है. यदि सचमुच मोदी जो बोल रहे हैं वह सब हो जाता है अथवा उस का आधा भी हासिल कर लिया जाता है तो वह असंभव को संभव बनाने वाली बात होगी.

शायद ऐसे ही किसी एहसास की वजह से मोदी का करिश्मा हाल के उपचुनाव में धीमा पड़ता नजर आया है. उम्मीद की जानी चाहिए, ये सब सपने साकार होंगे.