हाल में दिल्ली के एक प्रमुख अंगरेजी अखबार ने सूचना के अधिकार यानी आरटीआई के तहत खुलासा किया है कि सब से विश्वसनीय माने जाने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में भी 3 साल में 23 हजार करोड़ रुपए का घपला हुआ है. इन पैसों का बैंक के पास कोई हिसाबकिताब नहीं है. इस तरह का घोटाला हर साल हो रहा है लेकिन उस की किसी को खबर नहीं है.

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक जितनी राशि डकार गए हैं उस से सब के लिए शिक्षा के संकल्प की सरकारी योजना ‘सर्व शिक्षा अभियान’ को सुचारु रूप से चलाया जा सकता था. बैंकों में घपले का सब से बड़ा खेल इंडियन ओवरसीज बैंक में हुआ है जिस ने अप्रैल 2010 से सितंबर 2013 के बीच 3,033 करोड़ रुपए डुबोए हैं. मजे की बात यह है कि इस अवधि में बैंक को 2,848 करोड़ रुपए का लाभ हुआ है. इस के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के सब से बड़े स्टेट बैंक औफ इंडिया का स्थान है जिस ने 2,722 करोड़ रुपए गंवाए हैं. हालांकि बैंक ने उस अवधि में करीब 40 हजार करोड़ रुपए का लाभ भी अर्जित किया है. केनरा बैंक को 2,394 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है जबकि यूबीआई ने 1,775 तथा यूसीओ बैंक ने 1,491 करोड़ रुपए डुबोए हैं.

सवाल है कि रुपए कहां गए, तो इस का संकेत मई 2013 में इंडियन बैंक के पूर्व अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक एम गोपालकृष्णन की चेन्नई में हुई गिरफ्तारी से मिल जाता है, उन पर सीबीआई के विशेष जज ने नियमों का उल्लंघन कर के तथा सुरक्षा की पर्याप्त गारंटी के बिना भारी ऋण स्वीकृत करने के आरोप लगाए हैं.

तय है कि प्रबंध निदेशक महोदय ने पैसे खा कर ही नियम तोड़े हैं. इन मामलों की पड़ताल से ही खुलासा हुआ है कि अधिकारियों ने अपनी ताकत का इस्तेमाल कर के ऋण आवंटित किया. खूब पैसे डकारे और ऋण की वसूली नहीं कर सके. कंपनियां भाग गईं और बैंक को चूना लग गया. इस तरह से बड़े स्तर पर सरकारी बैंकों से पैसों का घोटाला हुआ है.

27 सरकारी बैंकों के 6 हजार कर्मचारियों पर सीबीआई इस घोटाले को ले कर कड़ी निगाह रखे हुए है. घोटालों पर लगाम कसने का यही तरीका है कि जो नियम तोड़े, उसे ही तोड़ डालो.

 

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