सड़क पर, कार्यालयों में, बसों और रेलों में तथा मौल आदि में कुछ लोग अकसर कान पर मोबाइल लगा कर जोरजोर से बोलते सुनाई देते हैं. लगभग सभी लोग गुस्से में होते हैं और एक ही बात कहते सुने जाते हैं कि जब सर्विस ही नहीं ली तो मेरे पैसे कैसे काट दिए. इस तरह के संवाद ये लोग मोबाइल फोन सेवा प्रदाता कंपनी के सेवा केंद्र के अधिकारी से कहते सुने जाते हैं. वे चिल्लाते हैं, झल्लाते हैं, चीखचीख कर बोलते हैं लेकिन उन्हें एक ही जवाब मिलता है, आप ने ही सर्विस ली है. एक अन्य परेशान उपभोक्ता कहता है, ‘मेरे पैसे काटे जा रहे हैं जबकि मैं ने मोबाइल फोन का इस्तेमाल ही नहीं किया है.’ कुछ कंपनियों के ग्राहक सेवा अधिकारी को आप ढूंढ़ते रह जाएंगे लेकिन उन से आप बात नहीं कर पाएंगे. सबकुछ रिकौर्डेड सेवा है जो सिर्फ औपचारिकता के लिए तथा अपनी सेवा संबंधी जानकारी देने के लिए है.

शायद भविष्य में उपभोक्ताओं को अपनी शिकायत के लिए इस तरह से परेशान नहीं होना पड़ेगा. संचार मंत्रालय इस दिशा में सख्त कदम उठा रहा है. उपभोक्ता कानून में संशोधन किया जा रहा है जिस के तहत औपरेटर व उपभोक्ता के संबंध पर विशेष ध्यान दिया जाएगा. कानून का मकसद उपभोक्ता को टैलीफोन औपरेटरों के उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करना है. कानून के तहत ग्राहक के पैसे बेवजह काटने वाले सेवा प्रदाताओं पर नकेल कसी जाएगी. बेवजह अथवा बिना सर्विस लिए पैसे काटने पर सेवा प्रदाता को कीमत चुकानी पड़ेगी. इस कानून में बड़ा संशोधन यह है कि जिस दुकान से उपभोक्ता मोबाइल खरीदेगा उस की सर्विस के लिए दुकानदार को जोड़ने का प्रस्ताव है. प्रस्ताव के अनुसार, मोबाइल यदि वारंटी अवधि से पहले खराब होता है तो यह जिम्मेदारी दुकानदार की होगी. उसे अपने ग्राहक को संतुष्ट करना पड़ेगा. मोबाइल उपकरण भी ग्राहक के लिए कई बार संकट खड़ा करता है, इसलिए इस बिंदु को कानून में रखा जा रहा है. सरकार का कहना है कि यह कार्य कठिन जरूर है लेकिन इस से ग्राहकों को फायदा होगा. सरकार को मोबाइल सेवा प्रदाताओं तथा मोबाइल उपकरणों की बिक्री से अच्छा राजस्व हासिल हो सकेगा.

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