सरिता विशेष

हमारे यहां षष्ठिपूर्ति यानी 60 साल की उम्र को जीवन का महत्त्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है. उम्मीद की जाती है कि अब आदमी सांसारिक जीवन से उठ कर अपने अनुभव के आधार पर नई पीढ़ी को उन्नति की राह पर बढ़ने में सलाहमशविरा देगा.

लेकिन हमारी लोकतांत्रिक परंपरा ने इस उम्र को नया स्वरूप दे दिया है. राजनीति में 60 के बाद ऊंचे ओहदे मिलने लगे हैं और 80 साल तक की उम्र आतेआते आदमी को प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसे महत्त्वपूर्ण पदों पर बिठाया जाने लगा है.

सरकारी सेवा में ‘चांदी की चमची’ के साथ शामिल होने वाले नौकरशाह पूरी जिंदगी साहब बन कर राज करते हैं और अपने हकों व सुविधाओं का भरपूर भोग करते हुए जब शीर्ष सरकारी ओहदे से सेवानिवृत्त होते हैं तो निजी कंपनियों से उन के लिए 25 की उम्र के जैसे नौकरियों के प्रस्ताव आने लगते हैं.

हालत यह है कि शीर्ष पदों की नौकरी छोड़ कर नौकरशाह दोगुनी रकम में निजी नौकरियों पर जा रहे हैं. सरकार ने इसे देखते हुए सेवानिवृत्ति के बाद 2 साल तक नौकरशाह के लिए निजी कंपनी की नौकरी करने पर रोक लगाई है लेकिन यह अवधि कम से कम 5 साल किए जाने की जरूरत है. जो नौकरशाह 60 साल की उम्र में सरकार के एक विभाग के शीर्ष पद पर रहते हुए 60 लाख रुपए सालाना पा रहा था वह 62 साल की उम्र में एक निजी कंपनी में 3 करोड़ रुपए सालाना पा रहा है. असली बात यह है कि ये तीरंदाज नहीं हैं बल्कि सरकार से जो लाभ निजी कंपनियों को चाहिए, वह मिलता है, इसलिए कंपनियां उन बूढ़े बाबुओं के साथ करोड़ों में खेलती हैं.