महंगाई की मार से सिक्कों की शामत आ गई है. छोटे सिक्कों का अस्तित्व लगातार खतरे में पड़ रहा है. किस्सों, कहानियों और फिल्मी गानों के जरिए तक लोगों के बीच लोकप्रिय रहे छोटे सिक्के अब किंवदंतियां बन कर रहने के कगार पर पहुंच गए हैं. अगर आप आज की पीढ़ी से कहेंगे कि 1, 2, 3, 5, 10, 20, 25, 50 पैसे के सिक्के प्रचलन में रहे हैं तो शायद ही उन्हें यकीन आएगा.

सरकारी स्तर पर 25 पैसे का सिक्का अगस्त 2011 से प्रचलन से बाहर कर दिया गया था और अब 50 पैसे के सिक्के की बारी है. यह सिक्का व्यावहारिक रूप से प्रचलन से बाहर हो चुका है. कोई 50 पैसे लौटाए या नहीं, इस का किसी पर फर्क नहीं पड़ता है. रिजर्व बैंक के एक आंकड़े के अनुसार पिछले वर्ष मार्च तक 25 और 50 पैसे के प्रचलन के लिए बाजार में मौजूद सिक्कों की संख्या, मार्च 2010 के 54 अरब 73 करोड़ 80 लाख से घट कर सिर्फ 14 अरब 78 करोड़ 80 लाख थी. यानी 3 साल में इन सिक्कों का प्रचलन 52 प्रतिशत से घट कर 2013 मार्च तक 17.5 प्रतिशत ही रह गया.

अब हालत यह है कि 50 पैसे का सिक्का लेने वाला भी कोई नहीं है. हां, 1, 2, 5 और 10 रुपए के सिक्कों की संख्या लगातार बढ़ रही है. 1 रुपए के सिक्के का प्रचलन 2010 मार्च की तुलना में 2011 मार्च में 28 फीसदी से बढ़ कर 42 फीसदी तक पहुंचा है. यानी 2010 में 1 रुपए के 29 अरब 46 करोड़ 10 लाख सिक्के बाजार में थे जो पिछले वर्ष मार्च में बढ़ कर 35 अरब 88 करोड़ 40 लाख तक पहुंच गए थे. लेकिन भरोसा नहीं है कि महंगाई के कारण कमजोर हो रहा 50 पैसे का सिक्का भी कब दम तोड़ दे.

कई सार्वजनिक बैंकों ने तो ऐसा सौफ्टवेयर विकसित कर लिया है जो 50 पैसे की राशि को 1 रुपया मान लेता है. इस तरह से महंगाई की मार आम आदमी के साथ ही सिक्कों पर भी भारी पड़ रही है. और शायद किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि महंगाई के कारण छोटे सिक्के इस तरह से बाजार से गायब हो जाएंगे और उन का अस्तित्व किस्सेकहानी बन कर रह जाएगा.