देश का राजकोषीय घाटा लगातार बढ़ रहा है जो सरकार के लिए नया संकट बना रहा है. सरकार ने हाल ही में खाद्य सुरक्षा विधेयक को पारित करवा कर के वोट मांगने की नैतिकता हासिल कर ली है लेकिन देश के लिए उस का यह निर्णय बड़ा संकट पैदा कर रहा है. खाद्य सुरक्षा योजना के तहत सरकार का लक्ष्य 67 फीसदी आबादी को कम दाम पर भोजन उपलब्ध कराना है लेकिन वहीं, इस से सरकारी खजाने पर हर साल 1.25 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ने वाला है.

चालू वित्त वर्ष में खाद्य सब्सिडी पर 1 लाख 15 करोड़ रुपए खर्च होने की संभावना है. अब तक तो सरकार के पास रोने के लिए सिर्फ चालू खाता घाटा की जर्जर स्थिति ही थी लेकिन अब राजकोषीय घाटे का नया फंडा सामने आ गया है और इस से अर्थव्यवस्था के और चौपट होने की संभावना है.

सरकार का मकसद इस योजना के बहाने हर घर तक पहुंचना है और वोट हासिल करना है. उस ने संदेश देना शुरू कर दिया है कि सब के लिए सस्ते भोजन की व्यवस्था का काम अब तक किसी सरकार ने नहीं किया है. सरकार वोट की राजनीति कर रही है यदि उसे सचमुच गरीब के लिए भोजन उपलब्ध कराने की चिंता है तो देश के गोदामों में सड़ रहे अनाज को बचाने के उपायों पर विचार करना चाहिए.

सरकार को बुनियादी स्तर पर काम करना चाहिए लेकिन वह इस के लिए ईमानदारी से काम करने को तैयार नहीं है. वह सिर्फ वोटबैंक को लक्ष्य कर योजनाएं बना रही है. उस का लक्ष्य राजकोषीय घाटा कम करना नहीं बल्कि लुभावनी नीतियों के जरिए सत्ता हासिल करना है. इस बार यानी 2013-14 में सरकार ने राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 4.8 प्रतिशत निर्धारित किया है लेकिन उस की वोटबैंक की नीति के कारण यह लक्ष्य हासिल होने का सपना भी नहीं देखा जा सकता है.