सरिता विशेष

देश के बहुमुखी आर्थिक विकास के लिए निवेश महत्त्वपूर्ण होता है. यही कारण है कि सरकार निवेश को महत्त्व देती है. यहां तक कि राज्य सरकारें भी अपने राज्यों में निवेश को बढ़ावा देने के लिए लालच दे कर उद्योगों को आमंत्रित करती हैं. इसी तरह विदेशी निवेश के लिए केंद्र सरकार भी निवेशकों को आकर्षित करने की तरहतरह की योजनाएं चलाती है. मोदी सरकार का इस के लिए ‘मेक इन इंडिया’ नारा है और यह कारगर साबित होता हुआ नजर भी आ रहा है, सरकार के आंकड़े तो यही दावा कर रहे हैं. सरकार का यह भी दावा है कि इस वर्ष अब तक उसे विदेशी निवेश के 170 प्रस्ताव मिले हैं, जबकि पिछले वर्ष कुल 150 प्रस्ताव मिले थे. इसी तरह से प्रवासी भारतीयों ने भी देश में निवेश करने में रुचि दिखाई है. आंकड़ों से लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं के दौरान एनआरआई को निवेश करने के लिए दिए जाने वाले निमंत्रण रंग लाते नजर आ रहे हैं. सरकार का दावा है कि केंद्र में नई सरकार आने के बाद से प्रवासी भारतीयों से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 3 गुना बढ़ा है. विदेशी निवेश सर्वाधिक मौरीशस, सिंगापुर और नीदरलैंड से हुआ है. सर्वाधिक निवेश सेवा क्षेत्र में हुआ है जो कुल निवेश का करीब 13 फीसदी है. सेवा क्षेत्र में वित्त निवेश, बैंकिंग, गैरबैंकिंग तथा शोध क्षेत्र प्रमुख रहे हैं. आटोमोबाइल क्षेत्र दूसरे तथा सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में निवेश तीसरे स्थान पर है. यह तुलनात्मक आंकड़ा पिछले 3 वर्षों का है जबकि एनआरआई निवेश का सिर्फ एक साल का है.

सवाल यह है कि सिर्फ आंकड़े दिखा कर आर्थिक तरक्की की राह पर कामयाब नहीं हुआ जा सकता है. इस के लिए जमीनी हकीकत ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. जमीनी हकीकत में मिसाल के तौर पर निवेश करने वाले देशों को देखा जा सकता है. यहां जिन देशों के नाम हैं उन्हें बहुत मजबूत अर्थव्यवस्था वाला देश नहीं कहा जा सकता. यह ठीक है कि सिंगापुर तथा नीदरलैंड की स्थिति अच्छी है लेकिन विकसित देशों से निवेश आकर्षित नहीं किया जा सका है. यहां ‘सौ सुनार की और एक लुहार की’ वाली कहावत को चरितार्थ करने की जरूरत है ताकि मोटी विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सके. ‘बूंदबूंद से घड़ा भरने’ वाली कहावत शीघ्र तरक्की की शैली नहीं है. यह पकाऊ व्यवस्था का हिस्सा है. जरूरत मोटे स्तर पर विदेशी निवेश को आकर्षित करने की है ताकि विश्व की मजबूत अर्थव्यवस्था में हमारे नाम का उल्लेख हो.