मोदी सरकार सत्ता में आई तो इस के प्रमुख कारणों में एक कांगे्रस राज में महंगाई की मार थी. पूरा देश महंगाई से त्रस्त था और नरेंद्र मोदी ने जनता की इस संवेदनशील नब्ज पर हाथ रख कर वोट के लिए इस का सफल इस्तेमाल किया. लोगों को भी लगा कि मोदी पूरा कायाकल्प ही कर देंगे. सभी के पास रोजगार होगा और सभी को सस्ती दर पर भरपेट भोजन मिलेगा लेकिन हुआ इस का ठीक उलट. सभी आवश्यक वस्तुओं के दाम लगातार चढ़ते गए, हालांकि थोक मूल्य सूचकांक का आंकड़ा निरंतर लुढ़क रहा है.

गरीब का भोजन कही जाने वाली दाल गरीब की थाली से अचानक गायब हो गई. दाल की जम कर कालाबाजारी हुई और उस के दाम प्रति किलो 200 रुपए तक पहुंच गए. सरकार ने दिखावे के लिए छापेमारी की लेकिन उस का जमीनी स्तर पर कोई असर देखने को नहीं मिला. दाल आज भी 175 रुपए प्रति किलो तक बिक रही है.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट पेश करते हुए बजट में मूल्य स्थिरीकरण निधि 500 करोड़ रुपए से बढ़ा कर 900 करोड़ रुपए कर दी है. इस निधि से आवश्यक वस्तुओं खासकर दाल की कीमत को नियंत्रित किए जाने का प्रयास किया जाएगा. अलग निधि आवंटित कर सरकार ने मूल्यों को नियंत्रित करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता तो व्यक्त कर दी है लेकिन इस में वह कितना सही साबित होती है, यह समय बताएगा. बहरहाल, जिस रफ्तार से कीमतें बढ़ रही हैं उसे देखते हुए लगता नहीं है कि सरकार आसमान छूती कीमतें रोकने में सफल होगी.