सरिता विशेष

यह एक सीरियस फिल्म है जिस का ट्रीटमैंट जौली अंदाज में किया गया है.
फिल्म में दिखाया गया है कि देश का न्यायिक ढांचा किस तरह से काम करता है. एक वकील की जिंदगी में कैसेकैसे पल आते हैं और अदालतों में कैसे कामकाज होता है. निर्देशक ने अदालतों में 3 करोड़ से ज्यादा पैंडिंग मुकदमों का जिक्र कर जहां अदालती कार्यवाही की कछुआ चाल की बात की है वहीं दूसरी ओर एक जज को यह कमैंट करते हुए दिखाया है कि यह कोर्ट है, यहां जल्दी कुछ नहीं होता.

जिन लोगों का अदालतों से वास्ता पड़ा होगा वे अच्छी तरह जानते होंगे कि अदालती कार्यवाही में कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. किस तरह नामीगिरामी वकील अपने प्रभाव से केस को प्रभावित करने का दमखम रखते हैं. निर्देशक सुभाष कपूर ने अपनी इस फिल्म में अदालती कार्यवाही पर करारा व्यंग्य किया है.

कुछ साल पहले दिल्ली में ‘बीएमडब्लू हिट ऐंड रन’ मामला सुर्खियों में आया?था. इस केस में आरोपी संजीव नंदा पर अदालत में मुकदमा लंबा खिंचा?था. नामीगिरामी वकीलों ने केस की पैरवी की थी. निर्देशक सुभाष कपूर ने उसी केस को फिल्म की कहानी का हिस्सा बनाया है.

फिल्म की कहानी मेरठ से दिल्ली की अदालत में अपनी वकालत चमकाने के लिए आए नएनए वकील जगदीश त्यागी उर्फ जौली (अरशद वारसी) की है. वह अदालत में  एक दिन ‘हिट ऐंड रन’ मामले में अपने मुवक्किल के साथ पेश हुए एक नामी वकील तेजेंद्र राजपाल (बोमन ईरानी) को दलीलें देते देखता है. राजपाल अपने मुवक्किल को बरी करा लेता है.

जौली राजपाल की दलीलों से प्रभावित होता है और उस जैसा बड़ा वकील बनना चाहता है. वह कोर्ट में हिट ऐंड रन मामले को रीओपन करने के लिए पीआईएल लगाता है. अब शुरू होती है राजपाल और जौली के बीच जंग. इस जंग में राजपाल अपने मुवक्किल को फंसा कर उस से करोड़ों रुपए वसूलता है. वह एक व्यक्ति को इस केस का चश्मदीद गवाह बना कर जौली के पास भेजता है जो उस को 20 लाख रुपए की पेशकश करता है. जौली पहले तो रुपए ले लेता है लेकिन फिर उस का जमीर जाग उठता है. वह राजपाल को पैसे लौटा कर न सिर्फ असली चश्मदीद गवाह को ढूंढ़ निकालता है बल्कि उस केस में जांच करने वाले भ्रष्ट पुलिस अफसर की भी अदालत में पोल खोलता है. अदालत जौली की दलीलों को मानते हुए हिट ऐंड रन केस में दोषी को सजा सुनाती है. जौली रातोंरात बड़ा वकील बन जाता है.

शुरू से आखिर तक यह फिल्म  दर्शकों को बांधे रखती है. निर्देशक ने फिल्म में कोर्टरूम का एक सैट लगाया है जहां विटनैस बौक्स की जगह एक लकड़ी का तख्ता रखा गया है. जज विटनैस को उस तख्ते पर खड़े हो कर विटनैस देने को कहता है. कोर्टरूम में एक नामी वकील के साथ जज की एक फ्लैट के खरीदने के बारे में गुफ्तगू दर्शाती है कि आज जज भी दूध के धुले नहीं हैं.

कोर्टरूम में ही नामी वकील के व्यवहार को ले कर जज का आगबबूला होना खासा ह्यूमर पैदा करता है. फैसला देते समय जज यह कहता है कि उसे केस के फैसले के बारे में पहले दिन ही पता होता है लेकिन वह तो गवाह का मुहताज होता है कि गवाह अब आया…अब आया.

फिल्म का निर्देशन अच्छा है, मगर रफ्तार कुछ सुस्त है. अरशद वारसी ने उम्दा काम किया है. सौरभ शुक्ला का काम भी अच्छा है. उस ने दर्शकों को गुदगुदाया है. बोमन ईरानी का रोबदार व्यक्तित्व प्रभावित करता है. अमृता राव न होती तो अच्छा था.

कोर्टकचहरी वाली कहानी के बीच गानों का कोई काम नहीं था, फिर भी डाले गए हैं. दिल्ली की कई लोकेशनों पर शूटिंग की गई है.