फूलों की मांग आज के समय में दिनबदिन बढ़ती ही जा रही है. खुशी के हर मौके पर फूलों का इस्तेमाल बहुत ही जरूरी हो गया है. यही वजह है कि सुबह सब से जल्दी और रात में देर तक फूलों की ही दुकानें खुली मिलती हैं. लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए फूलों का करोबार देश से ले कर विदेशों तक में फैला हुआ है.

फूलों के पौधे कम समय में ही तैयार हो जाते हैं, जिस से फूलों का कारोबार मुनाफे का जरीया बन गया है. आने वाले समय में भी फूलों के बढ़ते कारोबार से फूलों की खेती और इस से जुडे़ दूसरे काम बड़े कारोबार के रूप में निखरेंगे. भारत के अलावा कीनिया, इजराइल, कोलबिंया, फ्रांस, जापान और जर्मनी फूलों के सब से बड़े निर्यातक देश हैं.

भारत के कर्नाटक प्रदेश में फूलों की खेती सब से ज्यादा होती है. देश में फूलों की पैदावार का 75 फीसदी हिस्सा कर्नाटक में ही होता है. फूलों के कारोबार की मांग साल दर साल 25 से 30 फीसदी के हिसाब से बढ़ती जा रही है. फूलों के निर्यात में भारत का हिस्सा बहुत ही कम है. भारत में जमीन, जलवायु और कई तरह के फूलों की पैदावार के चलते फूलों के कारोबार की संभावना बहुत है. इसी वजह से फ्लोरीकल्चर नई विधा के रूप में उभर कर सामने आई है.

फ्लोरीकल्चर का संबंध फूलों की खेती से होता है. इस में फूल और फूलदार पेड़ों की खेती और उस के व्यावसायिक इस्तेमाल के बारे में जानकारी मिलती है. फूलों की खपत ताजे फूलों के साथसाथ परफ्यूम, फार्मा और सौंदर्य सामग्री बनाने वाली कंपनियों में होती है. फूलों के बढ़ते कारोबार ने फ्लोरीकल्चर में कैरियर के नए रास्ते भी खोल दिए हैं. फ्लोरीकल्चर की जानकारी हासिल कर के स्वरोजगार को भी बढ़ाया जा सकता है. फ्लोरीकल्चर में फूलों के कारोबार से जुड़ी हुई हर तरह की जानकारी दी जाती है, जो फूलों से जुड़े हुए कारोबार को बढ़ाने में मदद करती है.

फूलों से रोजगार

फूलों के कारोबार से कैरियर को नया आयाम दिया जा सकता है. फ्लोरीकल्चर से जानकारी हासिल करने के बाद अपना छोटा रोजगार चलाया जा सकता है. फूलों के कच्चे माल को बेचने का कारोबार हो सकता है. फ्लोरीकल्चर से डिगरी लेने के बाद सरकारी और प्राइवेट सेक्टर में नौकरी मिलने की ढेर सारी संभावनाएं हो जाती हैं. इस डिगरी को लेने के बाद लैंडस्कैप डिजाइनर, हार्टिकल्चर थेरेपिस्ट, ग्राउंड कीपर्स और फ्लोरल डिजाइनर के रूप में काम मिलने लगता है. इस के अलावा खेत बागान प्रबंधक, सुपरवाइजर और विशेषज्ञ के रूप में भी नौकरी की जा सकती है.

फूलों की सजावट अलगअलग समय पर अलगअलग तरह से होती है. जिन लोगों को इस की जानकारी होती है, उन की भी अच्छी डिमांड होती है. फूलों की नर्सरी लगाने, खुशबूदार पौधों और लैंडकेपिंग के बारे में जानकारियां देने का काम भी किया जा सकता है. फ्लोरीकल्चर  में फूलों और कलियों का उत्पादन, डिजाइनिंग, बुके बनाना, झालर वाले फूलदार पौधे उगाना जैसी तमाम जानकारियां दी जाती हैं.

इस में फूलों की खेती की पूरी जानकारी दी जाती है. फूलों की चुनाई की जानकारी भी फ्लोरीकल्चर में मिलती है.

बदलते समय में घर व आफिस में हरियाली को अच्छे इंटीरियर के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है. लोग बागबानी में भी रुचि रखने लगे हैं. इस से बागबानी, आफिस, घर, पार्क और कार्यालय वगैरह की सजावट करने के लिए सलाह देने का काम भी किया जा सकता है. कई बड़ी कंपनियां इस तरह के लोगों को नौकरी पर भी रखती हैं.

फ्लोरीकल्चर की पढ़ाई

फ्लोरीकल्चर के क्षेत्र में कैरियर बनाने के लिए ऐसे मेहनती लोगों की जरूरत होती है, जो नेचर के करीब होते हैं और खेती के काम करना चाहते हैं. फ्लोरीकल्चर विषय में डिगरी की उपलब्धता नहीं है. इस के लिए एग्रीकल्चर में गे्रजुएट या बीएससी इन एग्रीकल्चर का चुनाव किया जा सकता है.

बायोटेक्नोलाजी में भी एग्रीकल्चर का दखल बढ़ गया है. जीव विज्ञान से 12वीं कक्षा की परीक्षा पास करने के बाद बीएसएसी और उस के बाद एमएससी इन हार्टीकल्चर परीक्षा पास की जा सकती है. एमएससी हार्टीकल्चर में फूलों, फलों और सब्जियों के बारे में बताया जाता है. कम समय में जानकारी हासिल करने के लिए अलगअलग स्कूलकालेजों के द्वारा डिप्लोमा कोर्स भी किए जा सकते हैं. इलाहाबाद एग्रीकल्चरल विश्वविद्यालय, इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश), चंद्रशेखर आजाद एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय कानपुर (उत्तर प्रदेश), चौधरी चरण सिंह एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय हिसार, इंडियन एग्रीकल्चर रिर्सच इंस्टीट्यूट कृषि अनुसंधान भवन नई दिल्ली, कालेज आफ एग्रीकल्चर पूना और फारेस्टी रिसर्च विश्वविद्यालय देहरादून जैसी तमाम जगहों से एग्रीकल्चर कोर्स कराए जाते हैं. पालीटेकनिक स्कूल आफ हार्टीकल्चर जूनागढ़, एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय जूनागढ़ और डिपार्टमेंट आफ बाटनी हिसलाय कालेज नागपुर जैसी जगहों से डिप्लोमा कोर्स भी किए जा सकते हैं.

40फीसदी बढ़ रहा फूलों का कारोबार 

शादी का मंडप हो या किसी के स्वागत की तैयारी, फूलों की सजावट सब से जरूरी होती है. रोज के कामकाज में फूलों की सजावट का ज्यादा इस्तेमाल होने से तरहतरह के फूलों की मांग बढ़ गई है. अब सजवाट और लाइट के हिसाब से अलगअलग रंगों के फूलों की मांग बढ़ गई है. इसी वजह से तरहतरह के देशी और विदेशी फूलों की खेती करने वालों की तादाद बढ़ गई है. पहले किसान गेंदा और गुलाब की खेती तक ही अपने को सीमित रखते थे, मगर अब नएनए फूलों की मांग बढ़ने से रंगबिरंगे विदेशी फूलों की खेती भी लाभदायक हो गई है. जो फूल लोकल बाजार में नहीं मिलते हैं, वे बडे़ शहरों और विदेशों तक से मंगाए जाते हैं. अपने देश के भी बहुत सारे किसान विदेशों में फूलों को भेजते हैं.  जनवरी से ले कर दिसंबर तक हर महीने में कोई न कोई खास दिन जरूर होता है, जिस में बहुत सारे लोग एकदूसरे को बधाई देते हैं. बधाई देने के लिए फूलों के बुके से अच्छा दूसरा कुछ नहीं होता है. इस के अलावा जन्मदिन या अन्य मौकों पर शुभकामना संदेश देने के लिए भी फूलों के गुलदस्ते बहुत काम के होते हैं.

जिस तरह से फूलों की बाजार में मांग बढ़ी है,उसी के मुताबिक फूलों की खेती का दायरा भी बढ़ गया है. किसानों के लिए फूलों की खेती चमकते सोने के समान हो गई है. देशी फूलों के साथसाथ अब बहुत सारे विदेशी फूलों की खेती भी भारतीय किसानों ने करनी शुरू कर दी है. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और आसपास के जिलों की बात करें, तो रायबरेली, हरदोई, कन्नौज, बाराबंकी और कानपुर में गुलाब, गलोडियस, रजनीगंधा और जरबेरा जैसे फूलों की खेती होती है. इस के अलावा उत्तराखंड से बहुत सारे फूल आते हैं. दिल्ली और बेंगलूरू की फूल मंडियों से बहुत सारे देशी और विदेशी फूल मंगवाए जाते हैं. इन फूलों में तमाम तरह की किस्में होती हैं. फूलों की डिमांड का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शादीविवाह के सीजन में मंडी से फूल गायब हो जाते हैं. फूलों की खेती करने वाले तमाम किसान महसूस कर रहे हैं कि फूलों का बढ़ता कारोबार उन के लिए सुनहरा भविष्य ले कर आया है.