फल और सब्जी के रूप में देश भर में केला काफी पसंद किया जाता है. यह स्वादिष्ठ, आयरन से भरपूर, आसानी से पचने वाला, सस्ता और लोकप्रिय फल है. हरे केले की सब्जी भी काफी लजीज होती है. इस के अलावा आटा और चिप्स बनाने में भी अब इस का इस्तेमाल बढ़ रहा है. देश में फलों के कुल क्षेत्रफल के 20 फीसदी हिस्से में केला उगाया जाता है.

केले की खेती के लिए 6 से 7.5 पीएच मान की अम्लीय मिट्टी काफी अच्छी मानी जाती है. खेतों की मिट्टी की जांच कराने के बाद उस का सही इलाज कर के किसी भी खेत में केले की खेती की जा सकती है. केला उत्पादक किसान बृजनंदन प्रसाद बताते हैं कि कृषि वैज्ञानिकों से सलाह ले कर उन्होंने पहले 2 बीघे खेत में केले की खेती शुरू की. 3-4 महीने में ही केले के पौधे लहलहाने लगे. केले की खेती के लिए सब से अच्छी बात यह है कि इसे साल भर में कभी भी लगाया जा सकता है. इस के पौधों को मजबूत बनाने के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम की जरूरत होती है. प्रति हेक्टेयर केले के 3630 पौधे ही लगाने चाहिए और पौधों के बीच 1.82 मीटर की दूरी रखनी चाहिए.

चीनिया केला बिहार की लोकप्रिय किस्म है. इस के पौधे केले की दूसरी प्रजातियों की तुलना में ज्यादा कोमल, पतले और कम बढ़वार वाले होते हैं. राज्य के वैशाली जिले में चीनिया केले की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है. इस के अलावा समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर जिलों में भी इस की खेती होती है. चीनिया केले का तना लंबा, पतला और हलके हरे रंग का होता है. इस के पत्ते चौड़े और लंबे होते हैं. इस केले की घौद काफी कसी हुई होती है और उस में 8 से 10 हत्थे होते हैं. एक घौद का वजन 12 से 15 किलोग्राम तक होता है. हर घौद में 120 से 150 केले होते हैं. डंठल समेत एक केले की लंबाई 10 से 15 सेंटीमीटर होती है. इस के फल की नोक काफी पतली होती है. पके हुए चीनिया केले के छिलके का रंग चमकीला पीला होता है. इस के फलों की भंडारण कूवत बाकी किस्म के केलों से बेहतर होती है. पके हुए फलों को कमरे के सामान्य तापमान पर 3-4 दिनों  के लिए भंडारित किया जा सकता है. एक फसल चक्र 16-17 महीने का होता है. प्रति हेक्टेयर 40 से 45 टन चीनिया केले की उपज मिल जाती है.

चीनिया केले का गूदा मुलायम, सफेद, सुगंधित और खट्टेमीठे स्वाद का अनोखा मिश्रण होता है. भंडारण की अवस्था में पके केले से सुगंध निकलती रहती है चीनिया केले के पौधों पर पत्तों के रोग और धारीदार विषाणु रोग के प्रकोप का खतरा ज्यादा होता है, लेकिन इस के पौधों पर पनामा रोग का असर नहीं के बराबर होता है. बहुवर्षीय खेती परंपरा के तहत आज भी वैशाली जिले के किसानों के बीच चीनिया केला काफी मशहूर है. बिहार के अलावा चीनिया केले की किस्म बंगाल में अमृतपानी और चीनी चंपा व दक्षिण भारत में पूवन और पंचानकोदैन और केरल में कुन्नन नाम से जानी जाती है. चीनिया के अलावा मालभोग, मिठाई, राजा, कैवेंडिस, कैवेंडिंस व इसम आदि केले की खास किस्में हैं. वहीं हरे या कच्चे केले को सब्जी के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है. सब्जी के रूप में केले की अबू, अवाक व टंडुक आदि किस्मों को पसंद किया जाता है.