सरिता विशेष

हाल ही में एसोचैम द्वारा किये गए  एक सर्वे में पाया गया कि ४० प्रतिशत कामकाजी माएं अपने बच्चों की परवरिश के लिए नौकरी छोड़न  चाहती  हैं.   बच्चों के अलावा लैंगिक पक्षपात, कार्यस्थल में शोषण, काम का असुविधाजनक समय, कम वेतन, पारिवारिक मुद्दे आदि कुछ अन्य वजह हैं, जो उन्हें नौकरी छोड़ने की बात सोचने पर विवश करते हैं. ऐसा नही कि जॉब करने वाली सभी महिलाएं परेशान हैं, बहुत सी महिलाएं अपने काम और कार्यस्थल के माहौल से खुश हैं, मगर कुछ ऐसी भी हैं जो दोहरा शोषण सह रही हैं.

एक तरफ कम वेतन, सीनियर्स की डांट और कार्य की अधिकता के साथ ऑफिस और रास्ते में असुरक्षा का खौफ , तो दूसरी तरफ घर के काम और बच्चों की जिम्मेदारी संभालते हुए ऑफिस में तनावपूर्ण माहौल में काम कर पाना आसान नही होता. आज के समय में जबकि महिलाएं ऊँचे से ऊँचे पदों पर पहुंचकर अपने हुनर और योग्यता का लोहा मनवा रही हैं, तो जरुरी है कि कहीं न कहीं उन्हें घर और ऑफिस  दोनों ही जगह  उचित माहौल प्रोत्साहन और सहयोग भी मिले. वो भी सुरक्षा के साथ ऑफिस में योग्यतानुसार ऊँचा पद व वेतन पाने की हकदार हैं.  जेनीफर लोपेज व दीपिका पादुकोण ने भी पुरुष व महिलाओं के वेतन में अंतर के मुद्दे को उठाया था.

यही नही ऑफिस या आसपास क्रेच की सुविधा भी इस दिशा में सराहनीय कदम होगा, जहाँ वे अपने छोटे बच्चों को रखकर तनाव रहित हो कर काम केर सकती हैं. तो वहीं घरवालों का सहयोग भी अनिवार्य है. ये वही देश है जहां  हर १० में से ६ पुरुष अपनी पत्नी के साथ हिंसक व्यवहार करते हैं. महानगरों की पढ़ी लिखी कामकाजी, हाई सोसाइटी वाली जिन महिलाओं को आमतौर पर सशक्त माना जाता है, वे भी घरेलू मामलों में उतनी ही पीड़ित और अकेली हैं घर की साड़ी जिम्मेदारों निभाने के बाद ऑफिस सम्भालना आसान नही.