सरिता विशेष

अकसर देखी होंगी आप ने ऐसी दुकानें जिन के मालिक मुसकराते हुए ग्राहकों का स्वागत करते हैं या सेल्समैन जो बड़े प्यार से हंसतेमुसकराते ग्राहकों को उन की जरूरत की चीजें दिखा रहे होते हैं. ऐसी दुकानों में हमेशा ही ग्राहकों का हुजूम लगा रहता है. कहा भी गया है, जिन के होंठों पर मुसकान नहीं उन्हें दुकान नहीं खोलनी चाहिए. दुकानदारी का यह उसूल जिंदगी की हकीकत है. जीवन में हंसतेमुसकराते आप दूसरों से हर काम करवा सकते हैं. मुंह बना कर रहेंगे तो दोस्त भी पास आने से कतराने लगेंगे. जिंदगी वैसे ही काफी दुरूह और गंभीर है. हर मोड़ पर जिंदगी ऐसे सवाल खड़े करती है कि जवाब खोजतेखोजते दिमाग का फलूदा बन जाता है. हर कोई परेशान है, तो जाहिर है, सब को जरूरत है ऐसे की जो उन्हें हंसा सके, जी हलका कर सके.

क्रोध, चिंता, डर आदि तो इंसान के साथ तब से हैं जब से वह पैदा हुआ मगर हास्य का जीवन में प्रवेश यकीनन भाषा के परिपक्व होने के बाद ही हुआ. एक इंसान ही है, जिसे कुदरत ने हंसने की शक्ति दी है. मगर यह देख कर तकलीफ होती है कि जानेअनजाने हम हंसना भूलते जा रहे हैं. हास्य हमें समस्याओं में घुलते रहने से दूर करता है. यह इंसान की गहरी, दबी भावनाओं को बाहर आने को प्रेरित करता है. कुदरत ने सिर्फ इंसानों को हंसने की क्षमता दी है. इंसान के बच्चे जन्म के बाद पहले सप्ताह में ही मुसकराना शुरू कर देते हैं, और 1 महीना होतेहोते यह मुसकराहट हंसी में तबदील हो जाती है.

आइए देखें कि हमारी जिंदगी में हास्य कमजोर क्यों होता जा रहा है. लोग एकदूसरे से इतने अजनबी और दूर क्यों हो गए हैं :

अकेलापन : सब से पहली वजह है इंसान का अकेला हो जाना. आज संयुक्त परिवार की प्रथा समाप्त हो चुकी है और लोग एकल परिवारों में रह रहे हैं. घर में 2-3 सदस्य होते हैं. ऐसे में मुश्किल से थोड़ी देर उन की आपस में बातचीत होती है वरना लोग तनहा ही रहते हैं. हंसने के लिए भरापूरा परिवार चाहिए जैसा कि संयुक्त परिवारों के दौर में होता था. घर के सभी लोग खाने की मेज पर जुटते थे और घंटों छोटीबड़ी दिनभर की घटनाओं पर हंसीमजाक हुआ करता था. इंसान आज हंसने के लिए भी अपने मोबाइल और लैपटौप पर निर्भर हो गया लगता है. वाट्सऐप पर सैकड़ों हंसनेहंसाने के मैसेज आते रहते हैं. व्यक्ति उन को पढ़ता है और आगे बढ़ जाता है या फिर फौरवर्ड कर काम में लग जाता है. इस के विपरीत पहले बिना बात के भी बात बना कर लोग खुल कर हंसतेमुसकराते थे.

आज आलम यह है कि औफिस, स्कूल या कालेज जाने वाले तो फिर भी दोस्तों के बीच हंस लेते हैं मगर मैट्रो सिटीज में ऊंचीऊंची बिल्ंिडगों में तनहा रहने वाले लोग, जो पड़ोसियों से भी काफी कट चुके हैं, मिल के हंसने के लिए तरसते हैं. उन के लिए मैसेज हास्य का बेहतर स्रोत है क्योंकि इसे आप अपने पास रखते हैं और किसी के साथ शेयर कर कभी भी पढ़ कर हास्य का आनंद ले सकते हैं, मगर मोबाइल, लैपटौप जैसी चीजों ने हंसी को टैक्निकल बना दिया है. जो बात कहने, अपने हावभावों के साथ प्रदर्शित करने में है वह अपनेआप जोक पढ़ने में नहीं है.

जिंदगी में बढ़ता तनाव : आज हमारी जिंदगी में तनाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है. हर कोई परेशान है. बड़े से ले कर बच्चे, कोई भी तनावमुक्त नहीं. बढ़ती जनसंख्या और तकनीकी विकास ने प्रतियोगिता के स्तर को बहुत बढ़ा दिया है. पढ़ाई हो या जौब, बेहतर काम करने वालों को ही मौका मिलता है और जो कमजोर हैं उन्हें पिछड़ना पड़ता है. ऐसे में बेहतर बनने की कोशिश में लोग स्वयं से ही दूर होते जा रहे हैं और हंसना भूल रहे हैं. हंसी के बदले तनाव उन का साथी बन रहा है.

हम ज्यादा टची हो गए हैं : अकेले रहतेरहते और इन तनावों को सहतेसहते हालत यह हो गई है कि हम छोटीछोटी बातों का बुरा मान जाते हैं, भावनात्मक रूप से जल्दी टूट जाते हैं और हंसनेहंसाने से ज्यादा वास्ता नहीं रखते.

हास्य को बनाएं जीवन का हिस्सा :  मुसकराहट हंसी का पहला कदम है. आप बिना किसी खास वजह के भी मुसकराना शुरू करें. धीरेधीरे यह आप की आदत बन जाएगी और आप छोटीबड़ी बातों पर खिलखिलाना शुरू कर देंगे.

सकारात्मक सोच रखें : यह मत देखिए कि आप के पास क्या नहीं है, बल्कि यह देखें कि कुदरत ने आप को क्या दिया है. जब आप इस दिशा में सोचने लगेंगे तो खुद ही उस नकारात्मक सोच से दूर हो जाएंगे जो आप की हंसी की दुश्मन है.

हंसी की तरफ आकर्षित हों

हंसने के लिए बहाने तलाशें, कहीं लोगों को हंसते हुए देखें तो उधर जाने और उन की हंसी में शामिल होने से स्वयं को रोकें नहीं.

ऐसे लोगों के साथ ज्यादा समय बिताएं जो हंसमुख हैं या बातों को हलकेफुलके रूप में लेते हैं. ऐसे ग्रुप में रह कर आप भी वैसे ही बनेंगे.

बातचीत में ह्यूमर पैदा करें. लोगों से इस तरह की बातें करें जिन में आप को और उन को हंसने का मौका मिले.

हंसने के लिए सब से ज्यादा जरूरी है कि आप स्वयं को बहुत सीरियसली न लें. जिंदगी चार दिनों की है, क्या मिला क्या नहीं मिला, इस हिसाबकिताब में तो जिंदगी ही गुजर जाएगी. बेहतर है कि जो मिला और जो अच्छा दिख रहा है, उसे जी भर कर एंजौय करें और मुसकराएं.

हंसने के मौके खोजें. खुद पर हंसें. उन क्षणों को शेयर करें जब आप को स्वयं पर हंसी आई थी. बुरे या कठिन समय में भी हंसी की वजह ढूंढ़ें.