सीबीएसई की 12वीं कक्षा के परीक्षा परिणाम घोषित होने से पहले छात्रों के साथसाथ मातापिता की धड़कनें भी तेज गति से चल रही थीं, मानो परिणाम छात्रों का नहीं मातापिता का आ रहा हो. आखिरकार वह क्षण भी आ गया जब परिणाम घोषित हो गए. कुछ छात्रों व अभिभावकों के चेहरे पर जहां खुशी की लहर दौड़ गई वहीं कुछ छात्र मनमुताबिक परिणाम न आने पर निराशा में डूब गए और 2 छात्राओं ने तो खराब रिजल्ट आने पर जान तक दे दी.

दरअसल, आज कंपीटिशन के तेजी से बढ़ते दौर में अभिभावकों ने बच्चों द्वारा अच्छे अंक लाने को अपना प्रैस्टिज इश्यू बना लिया है जिस के चलते कई बार बच्चे डिप्रैशन तक में चले जाते हैं और आत्महत्या जैसा खतरनाक कदम भी उठा लेते हैं.

अभिभावक यह चाहते हैं कि उन का बच्चा हर कंपीटिशन में खरा उतरे. इस के लिए वे अपने बच्चों पर कई तरह के जायज और नाजायज प्रैशर बनाए रखते हैं. मांबाप अकसर यह कहते सुने जाते हैं कि फलाने का बेटा कितना पढ़ता है, हर परीक्षा में 90 प्रतिशत से ऊपर अंक लाता है. कोई मम्मी अपने बेटे से कहती है कि देखो, पड़ोस वाली आंटी का बेटा इतना अच्छा गाता है कि टीवी के रिऐलिटी शो में हिस्सा ले रहा है, तुम कुछ करते ही नहीं हो. कोई पिता अपने बेटे से यह कहते सुना जाता है कि किसी भी हाल में इस साल तुम्हें आईआईटी के टैस्ट में पास होना ही है वरना औफिस में दोस्तों के बीच मेरी नाक कट जाएगी.

मगध विश्वविद्यालय के प्रोफैसर अरुण कुमार प्रसाद कहते हैं कि आज की भागमभाग जिंदगी में अभिभावक के पास बच्चों के लिए वक्त नहीं है. बच्चा कब स्कूल जाता है, कब आता है, स्कूल में क्या पढ़ता है, पढ़ाई में कैसा है, उस की दिलचस्पी किस चीज में है, वह क्या बनना चाहता है, किस सब्जैक्ट को पढ़ना उसे भाता है, इन सब बातों को जानने और समझने की फुरसत मातापिता के पास नहीं है. वे केवल बच्चों की मार्क्सशीट पर अच्छे अंक देखना चाहते हैं. इस के लिए वे अपने बच्चों पर हर तरह का प्रैशर बनाने से नहीं चूकते. हालांकि इस का बच्चों पर उलटा और काफी बुरा असर पड़ता है.

बच्चों को बेहतर पढ़ाई का माहौल मुहैया कराने की चिंता और सोच ज्यादातर पैरेंट्स के पास नहीं है. बच्चे कैसे बेहतर पढ़ाई करें या कैसे अपनी हौबी को डैवलप करें, यह कोई भी अभिभावक अपने बच्चों को नहीं बताता. बच्चे को सही राह दिखाना अभिभावक का ही काम है. अगर बच्चा टैलैंटेड है और उसे सही राह दिखाई जाए तो उसे कामयाब होने से कोई नहीं रोक सकता. बच्चों का एनजीओ चलाने वाले डा. दिवाकर तेजस्वी का मानना है कि आज कंपीटिशन के दौर में बच्चों में कंपीटिशन और खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने का भाव जगा कर ही उन की मानसिक और शारीरिक क्षमता को विकसित किया जा सकता है, लेकिन इस के लिए अभिभावक को ऊटपटांग और अव्यावहारिक तरीके नहीं अपनाने चाहिए.

पटना के डीएवी स्कूल में 12वीं कक्षा में पढ़ने वाला छात्र मयंक कहता है कि वह बचपन से पढ़ाई में अच्छा था और उस के पैरेंट्स ने अच्छे अंक लाने और हौबी को निखारने के लिए कभी कोई दबाव नहीं बनाया. उन लोगों ने अच्छे स्कूल में दाखिला करा दिया और घर पर पढ़ाई का बेहतर माहौल दिया, जिस से उस की पढ़ाईलिखाई मजबूत होती गई. न्यू ऐरा पब्लिक स्कूल की पिं्रसिपल नीना कुमार कहती हैं कि कंपीटिशन से बच्चों में प्रथम आने की भावना जागती है. उन्होंने कहा कि बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान देने के साथसाथ माता और पिता को चाहिए कि बच्चों के आसपास के माहौल और उन के स्वास्थ्य पर भरपूर ध्यान दें. स्वस्थ बच्चा ही पढ़ाई के साथ हर क्षेत्र में आगे बढ़ सकता है.

बच्चे ही देश का भविष्य हैं उन के वर्तमान को सुधारनाबनाना जरूरी है. यह काम पैरेंट्स और टीचर्स के हाथों में है. हर मांबाप दबाव के बजाय बच्चों को प्यार, दुलार और सहयोग का वातावरण मुहैया कराएं तो वे निश्चित रूप से जीवन के हर क्षेत्र में कामयाबी हासिल करेंगे और अच्छे इंसान भी बन सकेंगे.