सरिता विशेष

17 वर्षीय सुयश भी दूसरे बच्चों की तरह ही है लेकिन उस के बचत खाते में डेढ़ लाख रुपए जमा हैं, बावजूद इस सच के कि वह न ही कहीं नौकरी करता है और न ही कोई कारोबार करता है. दो टूक कहा जाए तो बगैर कुछ करेधरे कमाता है.

क्या यह मुमकिन है और है तो कैसे? इस बात का खुलासा करते हुए भोपाल के शिवाजी नगर में रहने वाला सुयश खुद बताता है कि हां, यह संभव है और आप को जान कर हैरानी होगी कि दोस्तों के जन्मदिन पर उन्हें ग्रीटिंग कार्ड और गिफ्ट देने के लिए मैं मम्मीपापा से पैसे नहीं लेता बल्कि खुद ग्रीटिंग कार्ड बनाता हूं और मेरे बर्थडे पर जो गिफ्ट आते हैं उन्हें सहेज कर रखता हूं तथा दोस्तों के जन्मदिन पर उन्हें दे देता हूं. बस, यह जरूर ध्यान रखता हूं कि जिस दोस्त ने जो गिफ्ट दिया है वह वापस उस के पास न चला जाए.

सुयश बताता है, ‘‘इस से साल में 5-6 हजार रुपए की बचत हो जाती है जो दिखती नहीं लेकिन हो जाती है. इस के अलावा मैं 7 साल की उम्र से अपने बर्थडे पर मिले पैसों, जो अकसर मम्मीपापा और दूसरे निकट संबंधी देते हैं, को बैंक में जमा करवा देता हूं, साल भर कोई न कोई मेहमान घर में आते रहते हैं. वे भी जो पैसे दे जाते हैं उन्हें मैं अपने बचत खाते में जमा कर देता हूं.’’ हंसते हुए वह बताता है कि इस तरह मैं लखपति हो गया. सुयश अब बचत खाते में जमा पैसों में से कुछ फिक्स डिपौजिट करना चाहता है, क्योंकि उसे मालूम है कि एफडी पर ब्याज ज्यादा मिलता है. साफ है कि सुयश अपने हमउम्र बच्चों और दोस्तों की तरह फुजूलखर्च नहीं करता, क्योंकि वह पैसों की अहमियत समझता है.

सभी कमा सकते हैं यश

जानपहचान व रिश्तेदारी में अब सुयश बतौर मिसाल पेश किया जाने लगा है. उस से सबक सीखने की जरूरत है कि कैसे आप भी घर की जिम्मेदारियों में खासतौर से आर्थिक स्थिति सुधारने में मम्मीपापा का हाथ बंटा सकते हैं. हर मांबाप की यह ख्वाहिश रहती है कि उन का बच्चा छोटी उम्र से ही पैसों के मामले में संभल कर चले तभी जिंदगी में कुछ कर पाएगा. इस सोच के पीछे दरअसल, पिछली पीढ़ी का संघर्ष और अभाव ज्यादा काम कर रहे होते हैं, जिन्हें अनुज की बातों से समझा जा सकता है. 16 वर्षीय अनुज दिल्ली पब्लिक स्कूल, भोपाल का छात्र है. उस के मम्मीपापा दोनों नौकरी करते हैं लिहाजा, उसे कभी पैसों की कमी महसूस नहीं हुई और जेबखर्च भी मांग और जरूरत से ज्यादा ही मिलता है.

अनुज बताता है कि अकसर वह पापा के मुंह से उन के कालेज के वक्त की बातें सुनता है कि वे जबलपुर के एग्रीकल्चर कालेज के होस्टल में रह कर पढ़ाई करते थे. तब उन्हें महीने का खर्च, कालेज की फीस व अन्य खर्च के लिए पैसे मनीऔर्डर से भेजे जाते थे. कभीकभी महीने की 5 तारीख तक दादाजी का मनीऔर्डर नहीं पहुंच पाता था तो पापाजी को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता था, मसलन मैस के पैसे 5 तारीख तक जमा न करने पर उन्हें मनीऔर्डर आने तक खाना अपने रूम में हीटर पर बनाना पड़ता था. यही हालत उन के कई दोस्तों की भी हो जाती थी, लिहाजा किसी से उधार पैसे भी नहीं मिलते थे.  अनुज जब भी कैंटीन में खाने के लिए जाता है तो उसे पापा की ये बातें याद आ जाती हैं. वह बताता है कि जिस दिन मम्मी को औफिस जाने की जल्दी होती है उस दिन वे लंच नहीं बना पातीं इसलिए 50-100 रुपए खाना खाने के लिए दे देती हैं.

अनुज को यह देख हैरानी होती है कि कई सहपाठी घर से लाए लंचबौक्स को हाथ भी नहीं लगाते और कैंटीन में पावभाजी, नूडल्स, डोसा वगैरा खा रहे होते हैं. अनुज की नजरों में यह फुजूलखर्ची और उस की यह सोच गलत भी नहीं है. रोजरोज कैंटीन या होटल का खाना वैसे भी सेहत के लिए अच्छा नहीं होता जिसे लगातार खाने से पेट की तकलीफें बढ़ जाती हैं, नतीजतन, डाक्टर व दवाओं का खर्च भी बढ़ता है. पर यह वास्तविकता सभी बच्चे नहीं समझते हैं, जिन का पसंदीदा नारा यह होता है कि लो बाप से कैश और करो ऐश यानी इन बच्चों को न तो पैसों की परवा होती है और न ही वे उन की अहमियत समझते हैं. मांग से कम जेबखर्च मिले तो वे मांबाप को कंजूस कहने और कोसने से भी पीछे नहीं रहते.

अगर इन में सुयश जैसी अकल और अनुज जैसी समझ हो तो निसंदेह ये फुजूलखर्ची से बचें और घर की आर्थिक जिम्मेदारी में अपना रोल निभाएं. भोपाल के एक नामी स्कूल की शिक्षिका साधना श्रीवास्तव बताती हैं कि अकसर ऐसे बच्चे जो पैसों की अहमियत नहीं समझते वे मांबाप के लिए सिरदर्दी ही खड़ी करते हैं. इसलिए उन्हें समय रहते कंट्रोल करना जरूरी है.

कहां गया पिगी बैंक

साधना जैसी टीचर या कोई भी मांबाप बच्चों से चाहते हैं कि वे पैसों और खर्च के मामले में जिम्मेदार और किफायती बन पाएं तभी एक स्मार्ट पर्सन कहलाएंगे. हाईस्कूल तक आतेआते जरूरतों का आकार बदल जाता है और बच्चों को यह भी समझ आने लगता है कि अब उन्हें पिगी बैंक या गुलक की जरूरत नहीं, क्योंकि अब हर चीज के लिए पैसे देना तो मम्मीपापा की जिम्मेदारी है इसलिए वे क्यों पैसा इकट्ठा करें. इस पर भी दिक्कत यह कि साल भर में 5-10 हजार रुपए जमा भी कर लो तो उसे उन की जरूरत पर ही खर्च करवा दिया जाता है. मसलन, बर्थडे पर ड्रैस दिलवा दी जाती है या फिर पसंदीदा आइटम खरीदने की छूट मिल जाती है. इस तरह के बच्चे यह मानने लगते हैं कि यह सब दिलाना तो मम्मीपापा का काम है फिर हम क्यों अपनी जरूरतों में कटौती करें या शौक पूरे न करें.

जाहिर है कि ये बच्चे भूल जाते हैं कि जिसे वे अपनी कमाई समझ रहे हैं वह भी मम्मीपापा का दिया हुआ ही है इसलिए अगर उन के कुछ पैसे बचते हैं तो आखिरकार उन्हें आना तो घर के ही काम है जिस से मांबाप का बोझ थोड़ा कम हो सकेगा. अकसर बड़ेबूढ़ों के मुंह से यह बात सुनी जाती है कि असल कमाई तो बचत होती है यानी जो आप ने अपने खर्च में कटौती कर बचा लिया वही कमाई है. यदि किशोर इस बात को समझ जाएं तो उन का भविष्य सुरक्षित रहेगा.

जरूरत क्यों

नई पीढ़ी तभी स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर बनेगी जब वह पैसों की अहमियत समझने लगेगी. अभी तो खेलने, खाने और मौजमस्ती की उम्र है तो अभी से क्यों इस पचड़े में पड़ें, जैसी सोच लापरवाही को ही दर्शाती है. किसी ढाबे, होटल या गैराज वगैरा में देख लें, वहां किशोर उम्र के बच्चे काम करते मिल जाएंगे. यह ठीक है कि घर की जरूरतों ने इन्हें कम उम्र में बाहर जा कर मेहनत करने के लिए मजबूर कर दिया है पर इसी मजबूरी ने इन्हें पैसा कमाने का मौका भी दिया है जिस से वे भी आर्थिक जिम्मेदारियों में हाथ बंटाते हैं. इन किशोरों से बेहतर सबक लिया जा सकता है कि पैसा कमाना कितना जरूरी है. यह ठीक है कि आज आप को इस की जरूरत नहीं है पर कल को पड़ गई तो क्या करेंगे? हालिया एक सर्वे में बताया गया है कि अमेरिका और दूसरे कई यूरोपीय देशों में खासे पैसे वालों के भी बच्चे जो स्कूल गोइंग हैं, खुद कोई काम कर पैसा कमाते हैं चाहे वह काम सिर्फ हफ्ते में 2 दिन किसी होटल में वेटर बनने का हो, अखबार बांटने का हो या फिर पार्टटाइम सिक्योरिटी गार्ड बनने का, ये बच्चे पैसा कमाने में शर्माते या झिझकते नहीं हैं.

यह अंतर अर्थव्यवस्थाओं, संस्कारों या संस्कृति का नहीं बल्कि बच्चों की समझ का है कि हमें अपना आर्थिक भार यथासंभव खुद उठाना आना चाहिए जिस से हम घर खर्च में मम्मीपापा की मदद कर सकें और बाहर जा कर कुछ सीखें भी जो भविष्य और कैरियर में काम आएगा.                   

कुछ टिप्स

सरिता विशेष

बचत कैसे सहायक होती है और क्यों जरूरी है, यह समझने के लिए आप को किसी स्कूल में जाने की जरूरत नहीं बल्कि घर से ही यह पाठ सीखा जा सकता है, इस के लिए आप को मांबाप की आर्थिक स्थिति, बचत, बैंक बैलेंस और वैभव छोड़ इस बात पर फोकस करना होगा कि मैं कैसे मदद कर सकता हूं. अगर बाहर जा कर कोई काम नहीं कर सकते तो खर्च कम और बचत तो कर ही सकते हैं और यह काम बहुत आसान भी है.

– देखें कि आप कहां पैसा खर्च कर रहे हैं और इन में से कितने काम व खर्चे गैरजरूरी हैं.

– कपड़े, जूते जैसे आइटम्स जल्दी न फैंकें.

– फोन में फालतू की स्कीम्स न लें.

– बाहर खानेपीने की लत छोड़ें.

– दिखावे की जिंदगी से परहेज करें.

– मोलभाव करना सीखें.

– तय कर लें कि हर महीने कुछ पैसे बचाने ही हैं, वह भी बगैर मांबाप से लिए.

– कुछ नया सीखने की कोशिश करें, जिस से आमदनी की उम्मीद हो.