सरिता विशेष

औरत की 40-50 साल की आयु यानी जीवन के सफर का अजीब दौर. एक लंबी थकानभरी जिंदगी के बाद विश्राम या फिर एक नई शुरुआत? वह भी उस मोड़ पर, जब औरत कई शारीरिक व मानसिक बदलावों का सामना कर रही हो.

अकसर महिलाएं जीवन के मध्यांतर को ही आखिरी पड़ाव मान कर निष्क्रिय हो जाती हैं. बच्चों की पढ़ाई, शादी व अन्य जिम्मेदारियों से फारिग होतेहोते 40-50 साल की उम्र की दहलीज पार हो जाती है, इस का यह मतलब नहीं कि जिंदगी के सारे माने खत्म हो गए. दरअसल, उम्र का यह मध्यांतर एक नई शुरुआत ले कर आता है. यह जीवन के शुरुआती पहरों में अधूरे बचे कामों, ख्वाहिशों व सपनों को पूरा करने का मौका देता है. अगर अब भी उन सपनों को नई उड़ान न दी तो फिर जिंदगी के आखिरी पल अफसोस व उदासी में ही गुजरेंगे. जीवन में रंग, कला, रचनात्मकता व रुचियों के इतने आयाम हैं कि जिन से हमारी जिंदगी के उदास कैनवास में रंगों की बौछार हो सकती है.

अगर शरीर साथ नहीं देता और बदलते हार्मोन रास्ते की रुकावट बनते हैं तो भी न हार मानें. इस का भी समाधान है. जिस वेग से हार्मोंस एक उम्र में शरीर में प्रवेश करते हैं, उसी वेग से बढ़ती उम्र के साथसाथ कम भी होते जाते हैं और जाते हैं तो लगता है, जैसे शरीर की पूरी ऊर्जा व उत्साह निचोड़ कर जा रहे हैं. पर यह तभी होता है, जब हम उन्हें ऐसा करने देते हैं. क्या हम किसी के वश में आ कर जीवन से हार मान लेंगे? कतई नहीं. मिडलाइफ क्राइसिस यानी मध्यांतर संकट के इस दुश्मन से निबटें.

मुश्किलें तन की

यह मेनोपौज की अवस्था है. स्त्री के स्त्रीत्व के लिए एक विशेष हार्मोन, ऐस्ट्रोजन, जो अब तक प्रचुर मात्रा में था, कम होने लगता है. मासिकधर्म अनियमित होते हुए बंद होने के कगार पर पहुंच जाता है.

हार्मोन की कमी का असर पूरे शरीर पर दिखना शुरू हो जाता है. कहां इस का क्या असर होता है, एक निगाह इस पर भी डालें. ऐस्ट्रोजन की कमी से हार्ट अटैक की आशंका बढ़ जाती है. ऐसी अवस्था में अमूमन कमरदर्द बना रहता है.

सब से बड़ा खतरा फ्रैक्चर का होता है. जरा सी चोट से हड्डी चटक जाती है और जुड़ने की प्रक्रिया भी लंबी व मुश्किल हो जाती है. त्वचा सिकुड़ कर अपनी चमक खोने लगती है. इसी दौरान झुर्रियां पड़ने लगती हैं. नजर कमजोर होने लगती है क्योंकि मोतियाबिंद अब रफ्तार से आंखों में उतरना शुरू हो जाता है.

धीरेधीरे मस्तिष्क को मिलने वाली औक्सीजन की मात्रा कम होने लगती है, जिस के कारण भूलने की प्रक्रिया तेज होने लगती है. समझनेबूझने की क्षमता भी कम होने लगती है. पेट का घेरा बढ़ने लगता है. रात में अनिद्रा की स्थिति आम हो जाती है.

मन की उलझन

सब से ज्यादा समस्या तब आती है जब परिवार वाले आप की मनोस्थिति से अनजान रहते हैं. आप का चिड़चिड़ापन, थकावट, मूड के उखड़े रहने की वजह कोई समझ नहीं पाता है. शिथिल, बोझिल काया और उस पर थका मन, आग में घी का काम करता है.

मन और विचलित हो जाता है. किसी के पास आप के लिए समय नहीं है. लंबा जीवन जिन घरवालों के लिए आप ने होम कर दिया, क्या उन्हें आप की परवा नहीं है? समस्या बढ़ती जाती है, गुत्थी है कि सुलझने का नाम नहीं लेती. पर हिम्मत हमें खुद ही जुटानी होगी और अपने शरीर व मन को बांधना होगा. यह अवस्था सब स्त्रियों के जीवन में आती है.

यह ध्यान रखें कि परिवार में सब को आप की जरूरत है. परवा है. बस, यह बताने के लिए शायद उन के पास वक्त की कमी हो. इस स्थिति को स्वीकार करें. बच्चों को उन की जिंदगी जीने दें. अपने फैमिली डाक्टर से कहें कि वे आप के जीवन में आ रहे बदलावों और उन के असर के बारे में घरवालों को बताएं, ताकि वे आप की मनोस्थिति को समझ सकें  और बेहतर ढंग से पेश आएं.

खानपान पर ध्यान

सब से पहले खानपान पर ध्यान दें. आप जानती हैं कि आप को अब चरबी परेशान करने वाली है, तो अपने आहार में वसा की मात्रा बिलकुल हटा दें. मीठे पर नियंत्रण रखें. प्रोटीन का सेवन अधिक मात्रा में करें. फलों में अनार के दाने रोज लें. मीठे फल जैसे केला, सेब लें, तो अच्छा है. पपीता सेहत के लिए फायदेमंद होता है, उसे नियमित लें. 2 गिलास गुनगुना पानी सुबहशाम लेने से चरबी घटती है और पेट साफ रहता है.

नियमित व्यायाम : तंदुरुस्त रहने के लिए यह बहुत अहम भूमिका अदा करता है. रोज सुबह नियमित रूप से व्यायाम करें. इस उम्र में सुबह सैर से बढि़या कोईर् व्यायाम नहीं है. सैर से पूरे दिन के लिए शरीर मे ऊर्जा भरती है, नई ताजगी मिलती है और दिन की शुरुआत यदि अच्छी हो तो दिन पूरा अच्छा बीतता है. हमउम्र साथियों से कुछ पल हंसबोल कर मन हलका हो जाता है.

सरिता विशेष

सलाह डाक्टर की : इस पड़ाव पर नियमित मैडिकल चैकअप जरूरी है. रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग आदि पर नजर रखें. जिस पल आप को डाक्टरी सलाह, दवाई वगैरा की जरूरत पड़े, तो देर न करें.

डाक्टर कहें तो हार्मोनल थेरैपी लेने में भी कोई हर्ज नहीं है. कैल्शियम आप की हड्डियों के लिए बहुत जरूरी है. 40 की उम्र से ही हड्डियों के प्रति सजग हो जाएं और दूध, दही का भरपूर सेवन करें.

समय का सही इस्तेमाल

इतने सालों की व्यस्तता के बाद अब आप के पास खाली समय है. अब आप वह सब कर सकती हैं, जो करना चाहती थीं. निरर्थक, दिशाहीन जीवन को सार्थक दिशा देने के कई तरीके हो सकते हैं. आप किताबें पढ़ सकती हैं, आसपास के जरूरतमंद बच्चों को पढ़ा सकती हैं, दृष्टिहीन बच्चों के स्कूल में जा कर उन्हें कहानियां पढ़ कर सुना सकती हैं, अनाथाश्रम जा कर बच्चों की देखभाल में मदद कर सकती हैं, कालोनी की साफसफाई, बगीचों का रखरखाव, वृक्षारोपण आदि कर समाज में योगदान दे सकती हैं. संगीत सीखना सिखाना बहुत सुकून देता है.

आप चाहें तो उदास, निरीह, एकाकी जीवन अपना सकती हैं या फिर एक नए सार्थक व उद्देश्यभरे जीवन की नींव रख सकती हैं. इस दोराहे पर आ कर फैसला आप का है.

(स्त्री रोग विशेषज्ञ डा. विमला जैन, डा अर्चना गुप्ता और डा. अनुपमा जोरवाल से हुई बातचीत पर आधारित)