‘बबली और बंटी’ से प्रसिद्ध हुई बबली की जैसी और कहानियां आजकल सुर्खियां बनने लगी हैं. पहले भी औरतों को अपराधों में शामिल किया जाता था पर पहले वे अपनेआप में गैंग की मालिक नहीं बन पाती थीं. अब वे अपराध का कखग सीखपढ़ कर खुद के गैंग बनाने लगी हैं और खुद ही प्लानिंग कर के धावा बोलने लगी हैं. शहद की मक्खी की तरह शहद के छत्ते की तरफ आकर्षित करने वाली इन लड़कियों को हनीट्रैप रैकेट चलाने में पकड़ा जाने लगा है. अब एक बड़ी सामाजिक समस्या उभर रही है कि इन स्वतंत्र, स्मार्ट और सैक्सी अपराधिन औरतों को कैसे पहचाना जाए और किस तरह से निबटा जाए.

औरतों के लिए बने सुरक्षात्मक कानून, जैसे बलात्कार, छेड़खानी, पीछा करना, ब्लैकमेल करना, विवाह बाद प्रताड़ना करना आदि अपराधिन औरतों के कानूनी हथियार बन गए हैं. उन के लिए बिना छुरीचाकू चलाए अब आम ही नहीं, अच्छेभले, होशियार, खास लोगों को भी फंसाना संभव हो रहा है. आज शिकार ढूंढ़ने के लिए इंटरनैट मौजूद है जिस पर फेसबुक अकाउंट बनाने के साथ असलीनकली फोटो दिखा कर एकसाथ दसियों को फरेब में जकड़ा जा सकता है. यदि कोई मोटी आसामी मिल जाए तो उसे धमकियां दे कर आसानी से लूटा जा सकता है. हाल में हौंगकौंग में पैदा हुई एक युवती को राजस्थान के छोटे शहर कोटा में पकड़ा गया. उस ने एक रईस युवक से विवाह कर लिया था पर फिर उसे ब्लैकमेल कर रही थी.

औरतों का अपराधीकरण देश के लिए काफी खतरनाक होगा क्योंकि हमारे यहां जहां एक तरफ उन्हें पूजने का स्वांग रचा जाता है वहीं दूसरी ओर उन्हें पैर की जूती के नीचे रखा भी जाता है. ऐसे में सक्षम, पुरुषों से तेज औरत के अस्तित्व, सोच और व्यवहार पर खतरा मंडरा रहा है. कोई भी समाज आज तक अपराधों को समाप्त नहीं कर पाया है और चाहे जेल हो या मृत्युदंड, पुरुष अपराध करते ही हैं, औरतें उन का पूरा साथ देती हैं चाहे वे सामने न आती हों. अब, वे सरगना बन रही हैं क्योंकि बराबरी के अवसरों, शिक्षा, घरों की चुनौतियों और जिंदादिली से रह पाने की लालसा अब हर दिन बढ़ रही है. अब उन की सोच है कि अगर बातों, जिस्म और मुसकानों से रिवौल्वरों का काम लिया जा सकता है तो वे क्यों न लें.

यह समस्या ऐसी है जिस का हल आसान नहीं है क्योंकि हमेशा डर रहेगा कि अति करने पर कहीं बेगुनाह, बेजबान, कमजोर औरतें पिस न जाएं. कठिनाई यह है कि नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक, विकास के मोहपाश में पड़ी सरकार को घरघर की इस समस्या पर दिमाग लगाने की न फुरसत है और न ही वह जरूरत महसूस करती है.