सरित प्रवाह \ संपादकीय

ईयू से ब्रिटेन का अलगाव

16 June 2017

पति पत्नी के तलाक के फैसले के बाद अदालतों से तलाक का प्रमाणपत्र लेना एक पहाड़ चढ़ने जैसा काम है खासतौर पर तब जब दोनों के नाम संपत्तियां हों और दोनों की कमाई से बहुतकुछ खरीदा गया हो. आपस में न बन पाने पर या एक का किसी और से अफेयर होने पर या फिर स्वतंत्रता की चाह में तलाक मांग लेना तो आसान है पर निर्णय लेने और बच्चों को संभालने के हक तय करने में वर्षों लग जाते हैं.

बड़ी मेहनत से बने यूरोप को एक करने वाले यूरोपीय साझा मार्केट और फिर यूरोपीय यूनियन यानी ईयू पर 28-29 देशों के नेताओं ने 30 साल पहले बहुत मेहनत की थी जिस पर ब्रिटेन के सिरफिरों ने ब्रेक्सिट का जनमत करा कर पानी फेर दिया. अब यूरोप के 27 देश ब्रिटेन के सामने बड़ी कड़ी शर्तें रख रहे हैं और यह पक्का है कि ब्रिटेन को इस तलाक की महंगी कीमत देनी पड़ेगी जो मूर्ख भावना में बह कर वोट देने वाली उस की जनता की समझ में नहीं आई.

यह ठीक है कि यूरोपीय यूनियन की राजधानी ब्रूसैल्स साझी नीतियों को लागू करने में कमजोर देशों को काफी सहूलियतें दे रहा था. इस से संपन्न देशों को लग रहा था कि वे इस की कीमत चुका रहे हैं. असल में यूरोपीय यूनियन के देशों को बिना बाधा का बड़ा बाजार, बिना सीमाबंधनों के मिला हुआ है. अलग होने के चलते ब्रिटेन को अब पकापकाया बाजार खोना पड़ेगा और बाकी उत्पादक देशों को लाभ होगा.

ब्रिटेन के निवासी अब यूरोप में काम नहीं कर पाएंगे. ब्रिटेन के विश्वविद्यालय अब खाली होने लगे हैं क्योंकि यूरोप के लोग सिर्फ अंगरेजी जानने के लालच में वहां प्रवेश नहीं ले रहे. अगर यूरोप के लोग ब्रिटेन में नौकरी करने नहीं आ रहे तो ब्रिटेन के लोगों को, अपने से कई गुना बड़े, यूरोप में नौकरियों के अवसर खोने पड़ गए हैं.

यूरोपीय यूनियन अलगाव के लिए जिम्मेदार ब्रिटेन को एक बड़ा मोटा बिल भेज रहा है. ब्रिटेन के कई शहरों में बने यूरोपीय यूनियन की संस्थाओं के दफ्तर खाली हो जाएंगे और वहां संपत्ति के दाम गिर जाएंगे. यूरोप के लोग अब ब्रिटेन में घर भी नहीं खरीदेंगे. चूंकि यूरोपीय खरीदार ज्यादा हैं, इसलिए लेनदेन में नुकसान ब्रिटेन का ज्यादा होगा.

यह तलाक आसान नहीं. भावना में बह कर ब्रिटेन की जनता ने अपने जूते का सोल खुद ही निकाल फेंका है कि उस का ऊपरी चमक वाला चमड़ा तो उस के पास रहेगा. असलियत यह है कि बिना सोल के जूता बेकार है. ब्रिटेन चप्पल फटकारता हुआ घूमेगा.

चीन यह बात समझ चुका है और वह पूरे यूरोप के साथ जुड़ने के लिए अथक कोशिश कर रहा है. भारत की मूर्खता है कि धर्म के नाम पर वह पाकिस्तान व बंगलादेश को तो भावनात्मक दुश्मन समझता ही है, भूटान और म्यांमार से भी उस के संबंध उसी तर्ज पर खराब हैं जैसे ब्रिटेन के खब्तियों के रहे जो अलगाव को सुनहरा कदम मान रहे हैं. जब विश्व एक होना चाहिए, तो धर्म, राष्ट्रीयता, भाषा, संस्कृति, रेस, जाति का अलाप बंद करो, वरना नुकसान ही होगा.

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