देशभर में शौचालयों का जम कर निर्माण हो रहा है और खुले में शौच को बंद कराने में सरकार जुटी है, पर सरकार शौचालयों के लिए जरूरी सीवर लाइनों और चालू पानी के पाइपों की ओर कोई ध्यान नहीं दे रही. यह साफ है कि नीति निर्धारक सोच रहे हैं कि शौचालयों को साफ करने के लिए दलित तो हैं ही.

तमिलनाडु में रामेश्वरम में एक स्कूल में शौचालय तो बनवा लिया गया, पर उसे साफ करने के लिए कोई नहीं मिला, तो दलित छात्रों को ही सैप्टिक टैंक में उतरने को मजबूर किया गया. वहां पैदा हुई विषैली मिथेन गैस से वे छात्र बीमार हो गए. यह सारे देश में हो रहा है. हर रोज नाले साफ करते हुए दलितों की मौत की खबरें छपती हैं.

असल में शौचालयों ने पिछड़ों व दलितों के बीच एक नई खाई पैदा कर दी है. भाजपा सरकार ने घरों में शौचालय बनाने पर मजबूर तो कर दिया, पर उन को साफ करने के लिए उसी घर के लोग तैयार नहीं हैं. जहां सैप्टिक टैंक बने हैं, वहां तो कठिनाई है ही, पर जहां केवल ड्राई लैट्रिन हैं, वहां मुसीबत और ज्यादा है. खुले में शौच का निबटान प्रकृति करती थी, पर घर, दफ्तर या स्कूल में बना शौचालय यदि सीवर से नहीं जुड़ा, तो उसे साफ कौन करे?

सारे देश में दलितों को इस काम में लगाया जा रहा है और इस से दलितपिछड़ा भेदभाव हर रोज बढ़ रहा है. दलित अब वह कोई काम करने को खुद ब खुद तैयार नहीं, जो पहले ऊंची सवर्ण जातियां नहीं करती थीं. पिछड़े 50 साल पहले ऐसे काम दलितों से कराते नहीं थे, क्योंकि उन की हैसियत ही नहीं थी. अब ऊंचे सवर्ण तो पाइप से आए पानी और गंद ले जाने वाले सीवर का सुख भोग रहे हैं, पर पिछड़ों को सवर्णों की तरह दलितों का मैला साफ करने की सेवा चाहिए. क्योंकि खेती, नौकरियों और छोटे धंधों से उन की आमदनी बढ़ गई है.

आज का दलित यह करने को तैयार नहीं है तो उसे अब मजबूर किया जा रहा है. हिंदू समाज में यह दोफाड़ तो हमेशा ही था, पर अब शौचालयों के कारण और अधिक सुर्ख होने लगा है. और जब तक लाखों गांवों के करोड़ों घरों तक अच्छेबड़े सीवर और बहते पानी के पाइपों का इंतजाम नहीं हो जाता, यह होता रहेगा. गांवगांव में दलितपिछड़ा झगड़ा बढ़ता रहेगा.

जैसे आज का पिछड़ा झाड़ू उठाने तक को तैयार नहीं है, वहीं आज का दलित मरे जानवर और ऊंचों के शौच को उठाने को तैयार नहीं है. राजनीति में जो नई करवट आई है, वह शौचालयों जैसी छोटी चीज से आ रही है और फिलहाल न ऊंचोंपिछड़ों के नेता इस का दूरगामी परिणाम देख पा रहे हैं, न दलितों के नेता इस की गहराई समझ पा रहे हैं.

शौच प्रकृति की देन है, पर सफाई करना तो हरेक को खुद सीखना होगा. पर यह पाठ पढ़ाए कौन?