सरिता विशेष

देश सेवा और सुरक्षा में लगे एक सैनिक के फेसबुक पर आए वीडियो, जिस में उस ने अपने खानेपीने और रहनसहन की पोल खोल डाली है, से हड़कंप मच गया है. अभी कुछ दिन पहले सैनिकों का नाम ले कर देशसेवा की दुहाई देने वाली सरकार को सांप सूंघ गया है कि वह अपने उन जवानों के साथ कैसा व्यवहार करती है, जिन के नाम पर वह नोटबंदी की कतारों में खड़े लोगों को दुत्कार रही थी. देश की सेना के साथ दुर्व्यवहार की शिकायतें अकसर आती रहती हैं और बहुत जवान खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर लेते हैं, क्योंकि उन के अफसर उन्हें सही सुविधाएं नहीं देते. जब भी भरती होती है, भरती केंद्रों पर हजारों की भीड़ उमड़ जाती है, क्योंकि सेना की नौकरी आज भी सुरक्षित व कमाऊ मानी जाती है. सेना में अनुशासन और कड़ी मेहनत होती है पर जवान उसे सहने को तैयार हैं पर इस का मतलब यह नहीं कि उन के साथ मनमाना व्यवहार किया जाए.

हमारे यहां युवाओं को खासतौर पर गांवों के युवाओं को हर जगह हांका जाता है. उसी का नतीजा है कि या वे आधीअधूरी पढ़ाई कर पाते हैं या फिर बेकाबू और उद्दंड बन जाते हैं. सेना में जाने पर भी उन में वह सोच और बैलेंस नहीं पैदा होता जो युवाओं में होना चाहिए. उन के जोश और कुछ करने की इच्छा को दफन कर दिया जाता है. सेना में सारा खेल युवाओं का होता है. उन्हीं के बल पर सेनाएं चौकन्नी रहती हैं. उबाऊ दिन और डरावनी रातों में यदि गुस्सा रहे तो सैनिकों का मानसिक बैलेंस बिगड़ ही जाएगा. उन्हें सुविधाएं न दो पर जीने का साधन तो देना ही होगा. हमारे यहां का निकम्मापन सेना में भी घुसा पड़ा है जो इस बीएसएफ के जवान ने फेसबुक पर  पोस्ट किया गया है. ऐसी नौबत आना ही गलत है और चाहे सेना हो, सरकारी या प्राइवेट नौकरियां हों, जवानों को सही माहौल मिले यह जरूरी है.

देश की तरक्की के लिए जरूरी है कि युवावर्ग शांत रहे और अपनी शक्ति गुस्सा प्रकट करने में नहीं, क्रिएटिविटी दिखाने में लगाए. यदि लोग युवाओं को अनुशासन के नाम पर दबाएंगे तो देश में कुछ नया नहीं होगा, कुछ प्रगति नहीं होगी.