सरकार ने प्रौविडैंट फंड का जो कानून बना रखा है वह देश में रोजगारों की अच्छी जानकारी देता है. हाल में जारी हुए आंकड़ों से स्पष्ट हुआ है कि सितंबर 2017 से मार्च 2018 के बीच प्रौविडैंट फंड का लाभ उठाने वालों की संख्या 39.35 लाख से घट कर 34.40 लाख रही यानी 5 लाख लोगों की नौकरी चली गई.

यह जीएसटी और नोटबंदी का बुरा असर है. छोटे और मझोले व्यापारों पर इन दोनों सरकारी प्रहारों की भारी मार पड़ी है और सरकार है कि बजाय खुद को सुधारने के, लगातार जीएसटी और नोटबंदी के गुणगान कर रही है.

व्यापारियों ने जबरन वसूले जा रहे टैक्स देने तो शुरू कर दिए हैं पर इस का मतलब यह नहीं कि उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया है. अगर व्यापारी खुश होते तो इसे हाथोंहाथ लेते. इस ने तो व्यापारियों और उद्योगपतियों को चार्टर्ड अकाउंटैंटों का गुलाम बना दिया है. यह औनलाइन फाइलिंग, कहने को चाहे सरल लगे कि दफ्तर नहीं छोड़ना पड़ता, लेकिन आप इस तरह के सौफ्टवेयर के इतने गुलाम हो जाते हैं कि आप की अपनी सूझबूझ और सोच कुंठित होने लगती है.

नई नौकरियां न मिलने की बात तो एकतरफ है, सवाल यह उठता है कि 125 करोड़ जनता में से सिर्फ 39 लाख लोग ही प्रौविडैंट फंड के दायरे में क्यों आते हैं? क्या बाकी के लिए रोजगार सिर्फ खेती करने या पकौड़े बेचने में ही हैं? सवाल यह भी उठता है कि सरकार ने आखिर क्यों ऐसा कानून बना रखा है जो सिर्फ 39 लाख रोजी पाए लोगों पर लागू होता है?

सरकारों ने असल में ऐसा तंत्र बना रखा है कि सुधार और सुरक्षा के नाम पर एक खास वर्ग को ही काम मिल सके. देश के अधिकांश कामगार खेतों, दुकानों, सड़कों पर काम करते हैं. वे इतना कम वेतन पाते हैं कि उन्हें एंप्लौयड कहना ही गलत होगा. उन की आर्थिक हालत बेरोजगारों सी रहती है.

सरकार के ये आंकड़े सरकार की ही पोल खोलते हैं कि करोड़ों नौकरियां निकलेंगी. यहां तो नौकरियों का ही टोटा हो रहा है.