बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए देश में टोटके अपनाए जा रहे हैं. गुड़गांव में हाल ही में कुछ इलाकों में तो कार मुक्त दिन मनाया गया और कोई भी गाड़ी लाने की अनुमति नहीं दी गई. लोग या तो पैदल चल कर आए या बसों में आए. दिल्ली भी ऐसा प्रयोग कर रही है. कई शहरों में 2 घंटों का ब्लैकआउट रखा जाता है ताकि बिजली खर्च कम करने की आदत पडे़. इन्हें टोटके इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि यह समस्या का हल नहीं. हमारे देश में बढ़ते प्रदूषण का कारण हमारा गंदगी प्रेम है. हम दुनिया के निसंदेह सब से गंदे देश में रहते हैं और ढोल पीटते रहते हैं कि यहीं ज्ञान का उदय हुआ, यहीं जगद्गुरु हैं, यहीं महान देवीदेवता हुए. यथार्थ यह है कि यहां गंदगी फैलाना ही धर्म है और गंदगी हटाना अधर्म, और प्रदूषण इसीलिए होता है.

देश का कोई कोना देख लें, राष्ट्रपति भवन के 500 मीटर का दायरा देख लें, रेसकोर्स रोड, जहां प्रधानमंत्री का घर है, देख लें. बेतरतीब पौधे, पत्तों के ढेर, आधी उगी घास, टेढ़ी सड़क, सड़क पर कूड़ा, टूटे कूड़ेदान, न जलती स्ट्रीट व ट्रैफिक लाइटें आप को 1 मील के सरकारी दायरे में दिख जाएंगी, उस दायरे में जहां चप्पेचप्पे पर सरकारी नजर है. सस्पैंडड पार्टीकल्स की चिंता और कार्बन डाईऔक्साइड या कार्बन मोनोऔक्साइड का रोना वह देश रोए जो अपने खाए केले के छिलके, पान की थूक, पेशाब, पालतू कुत्तों का पाखाना साफ करना सीख गया हो. तो कार टोटका क्या होगा? इसे लोग एक मुख्यमंत्री की विजिट की तरह समझेंगे जिस के आने पर आताजाता ट्रैफिक रुक जाता है. एक दिन कुछ पैदल चल लिए, चलिए भगवान की यही इच्छा है.

सफाई तो हमारे दिमाग में कहीं नहीं है, दूरदूर तक नहीं है क्योंकि उस की इकलौती जिम्मेदारी हम ने जन्मजात दलितों को दे रखी है. नई झाड़ुओं से स्वच्छता दिवस मना कर टोटका कर लेना आसान है पर देश में कोनेकोने में फैली गंद को निपटाना कोई नहीं चाहता क्योंकि यह काम ही गंदा है. कारों को दोष दें पर उस से ज्यादा वह मानसिकता जिम्मेदार है जिस में हम गंद में रह कर भी खुश हैं. बदबूदार नाले के पास मकान बना सकते हैं, गंदे पानी से धुली सब्जी कच्ची चबा सकते हैं.

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