सैक्स का सुख अनैतिक है, यह न जाने क्यों आज की आधुनिक जनता ने भी अपना रखा है. ठीक है हम जानवरों की तरह हर जगह खुले में सैक्स कर के जनसंख्या वृद्धि कर प्राकृतिक काम नहीं कर सकते पर सैक्स से जुड़े हर काम को करना और फिर उस पर नाकभौं सिकोड़ना न केवल चारित्रिक दोगलापन है बल्कि भ्रम पैदा करने वाला है.

आज युवाओं का विवाह 14-15 वर्ष की आयु में न हो कर 30-35 में होने लगा है. सैक्स के सब से सक्रिय सालों में कुछ न हो, यह समाजिक मांग गलत है. सैक्स की आजादी समाज ने देनी है पर समाज आज भी उस युग में जीना चाहता है जब 10साल की लड़की की शादी 12 साल के लड़के से कर दी जाती थी और 15 साल की आयु में वह मां बन जाती थी.

आज युवाओं को सैक्स के प्रति अपना रवैया बदलने की छूट देनी होगी, क्योंकि यह प्राकृतिक आवश्यकता है. सैक्स गंदा है, यह भावना बदलनी होगी. यह संपूर्णता देता है, सुख देता है, साथी को लंबे समय तक बांधे रखता है, यह समझना होगा. सैक्स का प्राकृतिक परिणाम बच्चा अब लोगों के हाथ में है.

सैक्स पर वर्जना ही बहुत हद तक युवतियों के साथ छेड़छाड़ का कारण है, जोकि सामने दिखती है और जिस के लिए उस का शरीर बिलबिलाता है, उसे पाने के लिए पुरुष मन बहुत कुछ करने लगा है. इसी भीड़भाड़ में युवती को दबोच लेना शामिल है और अकेले में बलात्कार कर लेना.

यह ठीक है कि पश्चिमी देशों में जहां उन्मुक्त सहमति का सैक्स आम है, वहां भी बलात्कार है पर वहां फिर भी युवतियां हर समय भयभीत नहीं रहतीं और उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जैसे मामले कम ही होते हैं, क्योंकि एक महिला साथी साथ हो तो दूसरी की ओर मन आसानी से आकर्षित नहीं होता. पैसे वाला सड़क पर पड़े 5 रुपए के नोट को नहीं उठाता, दूसरों की जेब नहीं काटता.

सैक्स को वर्जित फल न मान कर सामान्य प्रेम का शारीरिक प्रदर्शन माना जाए तो बहुत सी सामाजिक समस्याएं दूर हो जाएं. सैक्स प्रेम का स्वरूप है जबरदस्ती का नहीं, यदि यह युवाओं को समझा सकें तो बलात्कार कम हो सकते हैं, क्योंकि कुछ भी हो बलात्कार वहशीपन है और करने वाले के अहम को पूरा कर सकता है. सहज स्त्री सुख नहीं दे सकता.