सरिता विशेष

देश की समस्याएं हर रोज और ज्यादा उलझती लग रही हैं और ऐसा लगता नहीं कि देश की व्यवस्था जिन राजनीतिबाजों और नौकरशाहों के हाथों में है वे इन्हें सुलझाना जानते हैं या चाहते हैं. देश अगर सोचे कि सर्वोच्च न्यायालय, सीएजी (महालेखा परीक्षक), चुनाव आयुक्त, स्वतंत्र प्रैस जैसी संस्थाएं कुछ कर सकती हैं तो वह गलत है. ये संस्थाएं सरकार के कामकाज पर नजर रखने के लिए हैं, समस्याओं को हल करने में सरकार को सहयोग देने के लिए नहीं.

देश की अधिकांश समस्याओं के बारे में आम जनता की बढ़ती उदासीनता इन समस्याओं के विकराल रूप लेने की जड़ है. आम जनता अब तमाशबीन बनती जा रही है. वह समस्याओं के बारे में केवल उतना जानतीसमझती है जितना उसे सीधेसीधे महसूस होता है. आज प्याज के दाम बढ़ गए हैं, सड़कें टूट गई हैं, पार्किंग की जगह नहीं मिल रही है जैसी समस्याओं के बारे में जनता भुक्तभोगी तो होती है पर उस पर किया क्या जाए, यह न वह समझती है न समझने में रुचि रखती है.

नेता और अफसर, जो इस जनता, जो खुद अर्धशिक्षित, अर्धसूचित होती है, में से निकलते हैं या इस से वास्ता पड़ता है, उन अंधों की तरह होते हैं जो जानवरों की भीड़ में हाथी, घोड़े, जेबरा, सांप को पहचानने की कोशिश कर रहे लगते हैं.न उन्हें कोई बताने वाला है, न कोई रोकने वाला.

अति शक्तिशाली माना जाने वाला मीडिया केवल इन विकराल समस्याओं के अंश भर को छूता है. मीडिया को लगने लगा है कि जनता की खुद की इन समस्याओं में कोई रुचि नहीं है. आज मीडिया के रूप में जो दिख रहे हैं वे सैंसेशनलिज्म या तमाशबीनी को ही जनता की रुचि समझते हैं और नतीजा यह है कि वे इन समस्याओं को सतही तौर पर लेते हैं.

आम जनता जब तक भेड़ों की तरह हांके जाने में संतुष्ट रहे या भेडि़यों को गड़रिए के रूप में देख कर खुद को सुरक्षित समझेगी, वह निश्चित ही लुटेगी और परेशान होगी. देश के नीति निर्धारकों को अगर सही निर्णय लेने को बाध्य करना है तो जनता में कुछ को तो कम से कम समस्याओं की गहराई में जाने, समझने, पढ़ने, लिखने और उस पर बहस करने की आदत डालनी ही होगी.

जनता को समस्याओं की आंधी के सामने रेत में मुंह नहीं छिपाना चाहिए, उस का डट कर मुकाबला करने की योग्यता अपनानी होगी. अन्ना हजारे या दिसंबर रेप कांड में जिस तरह लोग घर से बाहर निकले, ऐसा हर रोज करना होगा. दिल्ली के जंतरमंतर पर जमा होने का फर्ज केवल कुछ ही अदा करें, यह नहीं चलेगा. जनता को हर समस्या को, जितनी गहराई में संभव हो, जानने का प्रयास करना होगा, केवल ट्विटर या फेसबुक पर लिख कर छोड़ना बंद करना होगा. जनता को अपनी राय, अपने सुझाव, सही व सुलझी भाषा में देना सीखना होगा वरना इस देश का पाकिस्तान, नेपाल या सोमालिया बनना निश्चित है.

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