अगले चुनावों के लिए पार्टियों ने तरहतरह के वादे करने शुरू कर दिए हैं. ऐसे वादे जो कभी पूरे नहीं हो सकते. दिल्ली की सड़कें पोस्टरों से पटी पड़ी हैं जिन में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष विजय गोयल वादा कर रहे हैं कि उन की पार्टी जीतेगी तो बिजली के दाम 30 प्रतिशत कम हो जाएंगे. कहीं लैपटौप दिए जा रहे हैं, कहीं टीवी. केंद्र सरकार खाद्य सुरक्षा कानून बना कर सस्ता गेहूं और चावल देने का वादा कर रही है.

क्या ये वादे जनता को चाहिए? नहीं. जनता को फिलहाल वह सरकार चाहिए जो चाहे कुछ न दे पर अपने न्यूनतम काम करे. राज्य यानी सरकार के 4 मुख्य काम हैं. देश की सुरक्षा, मुद्रा, कानून व्यवस्था व आदर्श कर संकलन. अफसोस यह है कि पार्टियां इन 4 मुख्य बातों पर कोई वादा नहीं करतीं और केंद्र व राज्य सरकारों ने दूसरे इतने काम पकड़ लिए कि ये 4 काम एकदम गौण हो गए हैं. देश की सुरक्षा का हाल यह है कि हम से कहीं छोटा उत्तरी कोरिया हम से ज्यादा बड़ी फौज रखता है, परमाणु बम बना रहा है, खुद के लड़ाकू हवाई जहाज बना लेता है. 

मुद्रा का प्रबंध हमारी सरकार नहीं कर सकती. भारतीय मुद्रा का लगातार अवमूल्यन हो रहा है और शायद यह सरकार के बस में नहीं हो पर वर्षों से सरकार आवश्यकता के अनुसार नोट व सिक्के तक नहीं उपलब्ध करा पाई है. सारा देश असलीनकली नहीं, कटेफटे नोटों या नोटों के अभाव से जूझता है.

कर इकट्ठा करना हमारे देश की सरकारों का शगल है पर वह इसलिए कि इस में मनचाहे व्यक्ति को छूट दी जा सकती है. कर एकत्र करने में बेहद धांधली और रिश्वतखोरी होती है. सेल्स टैक्स और उत्पादन कर, इन्कम टैक्स विभाग अपनी रेडों की वजह से ज्यादा जाने जाते हैं बजाय सही ढंग से कर एकत्र करने के. हर तरह के टैक्स पर आलतूफालतू नियम हैं और हर रोज जरूरत (सरकार या अफसर की) के अनुसार बदल लिए जाते हैं.

कानून व्यवस्था का तो बहुत बुरा हाल है. देश का एक हिस्सा माओवादियों के कब्जे में है और जो नहीं वह या तो माफिया के कब्जे में है या पुलिसिया गुंडों के. आम जनता तो शिकार है, उसे सुरक्षा नहीं मिलती इस व्यवस्था से, उसे लूटा जाता है. इस चंगुल में एक बार फंसे नहीं कि 20 साल बरबाद होने आम बात है. सुप्रीम कोर्ट के 30-32 जजों के पास हजारों केस विचाराधीन हैं. पूरे देश की अदालतों में 3 करोड़ केस चल रहे हैं. लाखों लोग जेलों में बंद हैं जिन पर अपराध साबित नहीं हुआ है. कानून व्यवस्था एक लंबी अंधेरी गुफा है.

कोई दल इन चारों मुख्य उत्तरदायित्वों की बात नहीं करता क्योंकि उन्हें ठीक करना पेचीदा काम है. सड़कें, स्कूल व अस्पतालों को बनाना आसान है. ठेका दिया, रिश्वत ली, काम पूरा हुआ, फीता काटा और बस. जनता को असल में इन 4 बातों में मुख्य सुधार चाहिए जो हो जाए तो न सस्ता गेहूं व चावल चाहिए होगा, न मुफ्त टीवी व लैपटौप.