सरिता विशेष

महंगे प्राइवेट स्कूलों को अब न केवल अमीर उद्योगपति चला रहे हैं, वे उन्हें एक आम होटल, रेस्तरां की तरह चला रहे हैं जहां जब तक पैसा मिला ग्राहक राजा है, जैसे ही पैसे नहीं मिले उसे भिखारी की तरह दुत्कार कर निकाल दिया. दिल्ली के निकट बहुत महंगे प्रैजीडियम स्कूल ने ऐसा ही एक कदम उठाया है. स्कूल ने पेरैंट्स से कहा है कि दी गई तारीख तक यदि सारे पैसे नहीं चुकाए गए तो बच्चों को बस में नहीं चढ़ने दिया जाएगा और न ही स्कूल में घुसने.

यह धमकी बच्चों के मन पर क्या प्रभाव डाल सकती है यह सोचे बिना स्कूल को अपनी लाभहानि की चिंता है. बाकी बच्चों में फीस न देने वाले बच्चों के प्रति किस तरह का असर पड़ता है यह बताने की जरूरत नहीं. प्रैजीडियम स्कूल बहुत महंगा है पर गलीगली में खुल गए पब्लिक स्कूलों, इंटरनैशनल स्कूलों, ऐकैडमियों के से नाम वाले स्कूल भी शिक्षा के प्रति एक बड़ा मखौल रच रहे हैं.

मातापिता अपने बच्चों को अच्छा स्कूल दिलाने के नाम पर अकसर हैसियत से ज्यादा फीस देने का प्लान कर लेते हैं पर कहीं भी कभी भी कोई अड़चन आने के बाद जब वे फीस पूरी नहीं दे पाते तो स्कूल उन से सूदखोरों की तरह  व्यवहार करने लगता है.

वयस्कों को बहुतों का देना होता है. कभी देर होती है, कभी नहीं, पर बच्चों को पैसे की कमी की वजह से अपमानित करा जाए यह स्वीकार्य नहीं. स्कूलों को इस देश में धंधों की तरह नहीं चलाया जा सकता. हर स्कूल एक चैरिटेबल ट्रस्ट की तरह नहीं चलाया जाता है और उस के लाभ कमाने पर पाबंदियां हैं. फिर भी अधिकांश स्कूल व्यवसायों की तरह चल रहे हैं और जरा सा नुकसान होते ही ग्राहकों यानी बच्चों के मातापिताओं के साथ गैरों की तरह व्यवहार करने लगते हैं.

यह स्कूलों का काम है कि वे अपने हिसाब से बच्चों को प्रवेश दें पर बाद में केवल फीस देर से देने पर किसी बच्चे का अपमान हो यह नहीं सहा जाना चाहिए. शिक्षा केवल व्यवसाय बन जाए यह किसी तरह से मंजूर नहीं होना चाहिए. अगर स्कूलों के खर्च पूरे नहीं हो पा रहे तो उन्हें भव्य भवनों, स्विमिंग पूलों, एअरकंडीशनरों, विदेश यात्राओं का लौलीपोप देना बंद कर देना चाहिए. समाज में वैसे भी पहले दिन से अमीर और गरीब का पाठ बच्चों को जबरन गले से उतार कर पढ़ाया जाए यह एकदम गलत है.

फीस न दे पाने पर बच्चों और उन के मातापिताओं को किस तरह की मानसिक यातना होती है इस का अंदाजा लगाना कठिन नहीं है. बच्चों को आज बहुत कुछ देखना पड़ रहा है. स्कूल में अपने साथियों के सामने भी वे अपमानित हों, यह तो कतई नहीं होना चाहिए.