अफसोस की बात है कि देश की गैरभाजपा पार्टियों ने जनता की तकलीफों पर आंख मूंद ली है और वे बस इस ताक में बैठी हैं कि भाजपा का घड़ा अपनेआप फूटे और उन्हें बैठेबिठाए राजपाट मिल जाए. भारतीय जनता पार्टी ने पूरी तरह सत्ता में आने के लिए 70 साल बड़ी मेहनत की थी. उस ने सैकड़ों तरह के काम किए. गौरक्षा का नाम ले कर 1960-70 में हल्ला मचाया. पंजाब में हिंदी को थोपने की कोशिश की. गलीगली में मंदिर बनवाए. तीर्थों को टूरिज्म का हिस्सा बनवाया. अछूतों, दलितों, पिछड़ों को अपने छोटे देवता दिए, आदिवासियों के इलाके में स्कूल भी खोले, उन के अपने देवीदेवताओं के मंदिर बनवा डाले.

भाजपा ने जहां गलीगली में अपने एजेंट बना डाले. आजादी की लड़ाई में तैयार हुए आजादी के सिपाहियों को कांग्रेस ने 100-200 की पैंशन दे कर भुला दिया. कम्यूनिस्टों ने मजदूरों की फौज तैयार की, पर जिस देश में कारखाने ही मुट्ठीभर हों, वहां मजदूरों की गिनती कहां होगी. उन्होंने कारखाने ही बंद करवा दिए और उन का वोट जमा करने वाला धीरेधीरे छिटक गया. पिछड़ी जातियों ने आरक्षण की मांग ले कर भीड़ जमा की, पर जैसे ही पिछड़ी जातियों को विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग से जगह दी, उन की फूंक खिसक सी गई और उन्होंने अपना झंडा उठाने वालों को निकम्मा बना डाला. आज इन सब दलों में जो काम कर रहे हैं, वे सब बस रुपए की चाशनी चाहते हैं. वे किसी मकसद के लिए काम नहीं कर रहे हैं और इसीलिए भारतीय जनता पर्टी के खिलाफ मोरचा खोलने में पिछड़ रहे हैं.

भारतीय जनता पार्टी के सुब्रह्मण्यम स्वामी सही कहते हैं कि सत्ता में आ जाने के बाद सड़कें, बांध, स्कूल, पुल, कारखाने, अस्पताल बना देने से वोट नहीं मिलते. उन्हें पक्का भरोसा है कि भाजपा को कोई हिला नहीं सकता, क्योंकि भाजपा का धार्मिक एजेंडा अनूठा है. विरोधी दलों के पास इस की काट है कि इसी धर्म के सहारे गरीबों को गरीब रखा जा रहा है, इसी से जाति की खाइयां खुदी हैं, इसी से घरघर में क्लेश पैदा होता है, जब अलग जातियों के लड़केलड़कियों में प्यार हो जाए और वे शादी करना चाहें. ममता बनर्जी, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल, प्रकाश करात, नवीन पटनायक, करुणानिधि के बेटे स्टालिन, अन्ना द्रमुक में जयललिता के बाद आई शशिकला की नजरें सिर्फ कुरसी पर हैं, पर वे कुरसी के लिए न अपना अलग डिजाइन बना रहे हैं, न लकड़ी, जबकि भाजपा 70 साल से यही कर रही थी. नोटबंदी ने सुनहरा मौका दिया, जब गरीबों को 50 दिन तक कतारों में खड़ा कर दिया गया था. अफसोस, उन्होंने इसे सतलुज, यमुना, गंगा, नर्मदा, कावेरी में बहा दिया.