पाकिस्तान में नई सरकार बन गई है और 2 बार पहले प्रधानमंत्री रह चुके नवाज शरीफ ने अपनी शेर वाली पार्टी पाकिस्तान मुसलिम लीग को

जिता कर पहली बार शांतिपूर्वक सत्ता हस्तांतरण कर लिया है. पर पाकिस्तान में कुछ बदला है, उस के आसार नहीं दिख रहे हैं. 63 वर्षीय नवाज शरीफ अभी भी मुख्यत: केवल पंजाब के नेता हैं जबकि पाकिस्तान की समस्याएं सिंध, बलूचिस्तान आदि में हैं जहां नवाज शरीफ की नहीं चलती.

पाकिस्तान में बड़ा शक्ति केंद्र सेना है और सेना ने नागरिक सत्ता के आगे घुटने टेकने का कोई वादा नहीं किया है. सेना अपने द्वंद्वों में फंसी है क्योंकि तालिबान उस पर हावी हो रहे हैं और अमेरिका व चीन को उस की अब जरूरत नहीं है. पाकिस्तानी सेना की ब्लैकमेल की ताकत कम हो गई है पर वह कभी भी इस्लामाबाद में टैंक भेज कर चुनावों के परिणामों को मटियामेट कर सकती है.

दूसरे देशों की तरह पाकिस्तान की युवा जनता अब अपना जोर दिखाने लगी है. इस बार ज्यादा मतदान हुआ, उस का कारण यही था कि युवाओं ने ज्यादा रुचि ली. ये वही युवा हैं जो 10 साल पहले मसजिदों की सुनते थे. अब ये इंटरनैट, फेसबुक, एसएमएस की भाषा के दीवाने होने लगे हैं और दुनिया के युवाओं के साथ कदम मिलाने को तैयार हैं.

आज कोई भी देश अपनेआप में द्वीप नहीं है. धर्म, जाति, भूगोल के नाम पर आज जनता को बहकाना मुश्किल होता जा रहा है. हर युवा अपने लिए एक मोबाइल, एक कंप्यूटर, कई जोड़े जींस या टीशर्टें चाहता है और वह धार्मिक व पारंपरिक पोशाक पहन कर अपनी सोच पर ताला नहीं लगाना चाहता. धर्म के दुकानदार अब दोगुनी मेहनत कर के उन्हें पुरानी पट्टी पढ़ा रहे हैं पर भेड़ों के झुंडों में से बहुत सी हाथ से निकलने लगी हैं, पाकिस्तान के चुनावों ने यह साबित किया है.

नवाज शरीफ के बाद पाकिस्तान में कोई अंतर आएगा या भारत और पाकिस्तान के संबंध सुधरेंगे, इस की कोई गारंटी नहीं. कैमरों के सामने तो चिकनीचुपड़ी बातें होंगी, पर फैसले निजी मतलब के हिसाब से ही लिए जाएंगे. पाकिस्तानी जनता के लिए कश्मीर अभी भी अफीम की गोली की तरह है जिसे खिला कर मनचाहा काम कराया जा सकता है और सेना इसे कब इस्तेमाल कर ले, कब दूसरा कारगिल हो जाए, कोई गारंटी नहीं.

फिलहाल, सिर्फ इतना संतोष काफी है कि पाकिस्तान एक कदम तो आगे बढ़ेगा. उम्मीद यही करें कि हम भारत में पाकिस्तान को उकसाने वाला कोई काम न करें. नरेंद्र मोदी के पिछले बयानों को सुनें तो लगता है कि वे किसी भी कीमत पर पाकिस्तान से मोरचा खोलना चाहेंगे और अगर ऐसा हुआ तो इन शांतिपूर्वक चुनावों की कब्र खुदते देर न लगेगी.